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नई सरकार हालात पुराने – टूटते युवाओं के सपने : कंचना झा

 

कंचना झा, काठमांडू, आषाढ़ २६ । एक २५ वर्षीय युवा, आँखों में अनगिनत सपने लिए कमाने की उम्मीद में काठमांडू आता है। उसे अपने जीवन को संवारना है, अपने सपनों को रंग देना है, क्योंकि उसे विश्वास है कि देश बदल रहा है। उसे लगता है कि नेतृत्व बदल चुका है, सरकार में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है, और यह सरकार उसकी आवाज को समझेगी । लेकिन उसके सारे सपने उस क्षण बिखर जाते हैं, जब वह काठमांडू के व्यस्त त्रिपुरेश्वर क्षेत्र में आत्मदाह का प्रयास करता है। यह केवल एक प्रयास नहीं, बल्कि उसकी गहरी पीड़ा का विस्फोट है—जिसने उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। सवाल उठता है—ऐसा क्या हुआ कि एक युवा इस कदर टूट गया?
एक ऐसी व्यवस्था, जो अपने आप को सर्वशक्तिमान समझने लगी है, जहाँ निर्णय लेने में संवेदनशीलता का अभाव है। आम आदमी की जेब में कितने पैसे हैं, वह किस संघर्ष से गुजर रहा है—इन सवालों से जैसे सरकार का कोई सरोकार नहीं। “सुशासन” और “विकास” के बड़े–बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन क्या यही विकास है, जिसने एक युवक को आत्मदाह के कगार पर ला खड़ा किया?

उसकी “गलती” क्या थी? सिर्फ इतनी कि उसने अपनी बाइक गलत जगह पार्क कर दी। लेकिन इस गलती की कीमत इतनी बड़ी हो सकती है—शायद उसने भी नहीं सोचा होगा। अगर उसकी जेब में पैसे होते, तो शायद वह जुर्माना भर देता, या फिर मौके पर ही किसी तरह मामला “निपटा” लेता और अपने काम में लग जाता। लेकिन जब जेब खाली हो, तो छोटी सी गलती भी भारी पड़ जाती है।
आज जिस घटना की चर्चा पूरे देश में हो रही है, वह मुगु के सोरु गाउँपालिका–१ के २५ वर्षीय गणेश नेपाली से जुड़ी है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें आम आदमी की मजबूरी और तंत्र की कठोरता आमने–सामने खड़ी होती है । काठमांडू जैसे शहर में पार्किंग की समुचित व्यवस्था आज भी एक बड़ी समस्या है। जहाँ व्यवस्था है भी, वहाँ शुल्क इतना अधिक है कि हर किसी के लिए वहन करना आसान नहीं। ऐसे में यह मान लेना कि हर व्यक्ति जानबूझकर नियम तोड़ता है—वास्तविकता से आँख मूँदने जैसा है। लोग जल्दी में होते हैं, काम पर समय से पहुँचना होता है, और कई बार अनजाने में नियमों का उल्लंघन हो जाता है । लेकिन इसके बाद जो होता है, वह और भी चिंताजनक है। कानून लागू करने वाले कुछ लोगों के व्यवहार में कठोरता के साथ–साथ एक अलग प्रकार की “वसूली मानसिकता” झलकती है। बातचीत की शुरुआत ही इस बात से होती है कि आपकी जेब में कितना है। नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी जहाँ जागरूकता और सहयोग से निभाई जानी चाहिए, वहाँ कई बार भय और दबाव का सहारा लिया जाता है । नियम–कानून जरूरी हैं, और उनका पालन भी होना चाहिए। लेकिन क्या हर गलती अपराध है? क्या हर उल्लंघन का जवाब केवल दंड है? या फिर कहीं न कहीं समझाने, सुधारने और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की भी जरूरत है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर गंभीर बहस होनी चाहिए।
सरकार से लोगों की अपेक्षाएँ बहुत थीं। चुनाव के दौरान यह भरोसा दिलाया गया था कि युवाओं को अपने ही देश में अवसर मिलेंगे, उन्हें विदेश नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन वादों और वास्तविकता के बीच की दूरी आज भी स्पष्ट दिखती है। नीतियाँ बनाना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना कहीं अधिक कठिन।
गुरुवार को जब यह घटना सामने आई, तो हर किसी के मन में एक ही सवाल था—अब गणेश का क्या होगा? एक साधारण परिवार से आने वाला यह युवा आज जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा है। जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया गया, तब तक उसका शरीर ५५ प्रतिशत तक जल चुका था। यहाँ केवल उसका शरीर नहीं जला है, बल्कि उसके सपने, उसकी उम्मीदें और उसका विश्वास भी झुलस गया है।
अभी गणेश का इलाज वीर अस्पताल में हो रहा है । डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम उसके जीवन को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्लास्टिक सर्जरी विभाग के संयोजक डा. पियुष दाहाल के नेतृत्व में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम उसकी देखभाल में जुटी है। उसे भारत ले जाने की भी तैयारी की गई थी, लेकिन फिलहाल उसकी स्थिति ऐसी नहीं है कि उसे स्थानांतरित किया जा सके।
आज पूरा समाज उसकी सलामती की प्रार्थना कर रहा है। लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—इस स्थिति की जिम्मेदारी कौन लेगा?
सरकार के पक्ष में बहुत से लोग हैं जो उसके कार्य की तारीफ करते हैं ।सामाजिक संजाल पर तारीफों के पुल बांधते हैं । अपनी रोटी सकेते हैं । वो भी हकीकत से अंजान नहीं है , लेकिन सिर्फ अपनी और अपनी सोचते हैं । सरकार के अच्छे कार्यों की सराहना होनी चाहिए, लेकिन क्या किसी नागरिक का जीवन उससे कम महत्वपूर्ण है ? यदि व्यवस्था ऐसी घटनाओं को जन्म दे रही है, तो उस पर आत्ममंथन आवश्यक है ।
यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—एक ऐसे तंत्र के लिए, जिसे अब संवेदनशील और जवाबदेह बनने की जरूरत है। अगर समय रहते इससे सबक नहीं लिया गया, तो ऐसे हादसे केवल आंकड़े बनकर रह जाएंगे, और आम आदमी का विश्वास धीरे–धीरे समाप्त होता जाएगा । आम जनता इस पर सोचने के लिए बाध्य हो गई है कि सरकार द्वारा उठाए गए सभी कदम इस ओर इशारा करते हैं कि यह सरकार गरीबों की सरकार नहीं है ।

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कंचना झा
कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन, www.himalini.com

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