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himalini-sahitya

जब से तुम आए ज़िन्दगी में, दिल के जज़्बात बन गये आग के अक्षर : मुक्ता

9 दिसम्बर 23
दर्द की जब इंतहा हो जाती
कुछ अक्षर किसी आले में
आंसू बहाते दिखाई पड़ते
◆◆◆
जब से तुम आए
ज़िन्दगी में
दिल के जज़्बात
बन गये आग के अक्षर
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ढूंढता रहा तुम्हें दिल के हर कोने में
पर तुम सूली पर टंगे नज़र आए
शायद खुदक़ुशी कर ली बेबसी में
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अब नहीं आता तुम्हारा नाम जुबां पर
दर्द का सागर बनकर रह गई ज़िन्दगी
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तल्खियां ज़माने ने बहुत की मगर
बेवफ़ा,तुम सदा मुस्कुराते नज़र आए
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कैसे कह दूं
दिल के जज़्बात
दफ़न होने के बाद भी
नासूर बन सालते रहे उम्र-भर
◆◆◆
तुमने इस क़दर
रुसवा किया है
ऐ!ज़िन्दगी
हर डगर पर
अब तो खुद से भी
अजनबी हो गया हूं मैं
◆◆◆
तेरी ज़फ़ा तो दफ़न थी सीने में
चिंगारी बन अब वो सुलगने लगी
◆◆◆
2
अनचाहे रिश्ते
औरत ओढ़ती, बुनती, गुनती है
अनचाहे रिश्ते व संबंध सरोकार
वह सब के मन को भाती
सबकी आकांक्षाओं पर खरी उतरती
सब को रास आती है
परंतु जब वह अपने मन की करती
सबकी आँखों में खटकती
अक्सर उसे दिखा दिया जाता है
घर से बाहर का रास्ता
और विभूषित की जाती
अनगिनत अलंकारों से
फूहड़ हो तुम, बुद्धिहीन हो,अहंनिष्ठ हो
पता नहीं क्या समझती हो स्वयं को?
वह अवमानना व प्रताड़ना
के दंश सहन करती
अपना जीवन ढोती है
सहसा उसका आत्म-सम्मान
फुंकार उठता
और वह मचा देती है तहलक़ा
और सबको दिन में तारे दिखा देती
वह अबला नहीं, सशक्त व समर्थ है
और वह पहचान चुकी है
चिर-संचित शक्तियों को
इसलिए वह हर विषम परिस्थिति
व आपदा का सामना करने में सक्षम है .
3
बावरा मन
राह निहारे
जो अपनों की भीड़ में
नहीं सुरक्षित
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कैसे करूं वंदन
देश जल रहा
धर्म, जाति, मज़हब की
अग्नि धधक रही
सुनाई पड़ रहे चहुंओर
क्रंदन के स्वर
आकुल बावरा मन
●●●
मानव जीवन क्षणभंगुर
नहीं संवेदन और स्पंदन
कैसे यह झूठे बंधन
नहीं समझ पाता मरू-मन
●●●
तन्हाइयों ने बना लिया
आशियां इस दिल में
हर पल संग-संग रहतीं
सिर्फ़ अपनी गाथा कहतीं
किसी पर नहीं विश्वास करतीं
अजब सी है दास्तान ज़िंदगी की
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भीड़ में हर इंसान
स्वयं को अकेला महसूसता
अपनी तलाश में जूझता
इत-उत भटकता
कहीं भी सुक़ून नहीं पाता
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रास नहीं आता
लोगों का हमारा खामोश रहना
वे साज़िशें असंख्य रचा करते हैं
और नीचे गिरता देख
लुत्फ़ उठाते हैं
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नववर्ष
लाया नव उमंग, नव तरंग
भुला दो अतीत के शिक़वे ग़िले
मिट जाएं द्वंद्व
जीवन बन जाए उत्सव
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मत कुरेदो
दिल के जज़्बातों को
जो दफ़न हैं
अरमानों की राख तले
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बड़ी-बड़ी इमारतें
महल-चौबारे
कहां सुक़ून देते
जब मन में
प्रलय के बादल गरजते
4
खुशी
मैंने प्रश्न किया खुशी से
क्यों दूर-दूर रहती हो मुझसे
कहां रहती हो…ज़रा बतलाओ तो
खुशी पहले सकुचाई, फिर बोली…
मैं तो सदैव तुम्हारे अंग-संग रहती
परंतु तुम हरदम सपनों में खोई
उधेड़बुन में मग्न रहती
और मेरी तलाश में
अकारण भटकती रहती
क़रीब होने पर भी मेरा सानिध्य
नहीं अनुभव कर पाती
ज़रा! अपने अंतर्मन में झांको
और महसूस करो
खुशी मन की भावना
सोचने का नज़रिया
देता शाश्वत आनन्दोल्लास
बदल देता जीने का अंदाज़
खत्म हो जाते जिससे रंजो-ग़म
बरसता जीवन में अलौकिक आनंद

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