Sat. Apr 13th, 2024

जनकपुर मेरी दृष्टि में : अजय कुमार झा

Janaki temple



अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक जनवरी 024। गृहस्थ जीवन मे तनाव और खींचातानी स्वाभाविक माना जाता है । षडयंत्र, निंदा, विनाकरण विरोध, अहंकार की लड़ाई, धन के लिए त्राहिमाम की अवस्था आदि सारे दुर्ग‘ण सांसारिक जीवन का प्रमाण है । लेकिन यही सब दुर्ग‘ण यदि संत, मोहंत, साधु और सन्यासियों के जीवन मे भी पाया जाने लगे, तो यह विशेष विचारणीय हो जाता है । भारत के अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में जनकपुर से उपहार को भेजे जाने के मुद्दे ने नया विवाद पैदा कर दिया था । २२ जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन के बाद जब राम की ससुराल जनकपुरधाम से विभिन्न कोसेली भेजने की तैयारी की जा रही थी, तो जानकी मंदिर के महंतों के बीच विवाद हो गया । वास्तव मे हमें ‘महंत’ शब्द के भीतरी अर्थ को जानना चाहिए । ‘महंत’ शुद्ध शब्द नहीं है । शुद्ध शब्द तो ‘मोहंत’ है । जिसका सीधा अर्थ होता है, मोह का अंत हो जाना । अर्थात जिस के अन्तःकारण मे किसी प्रकार के भौतिक इच्छा, आकांक्षा, लोभ और मोह नहीं होता उसे ही मोहंत कहा जाता है । परंतु, क्या आज के महंतों मे इसका लेशमात्र भी गुण है ? अगर नहीं है तो हमें पुनः विचार करने के लिए मजबूर करता है ।

ध्यान रहे ! मंदिर के मुख्य महंत राम तपेश्वर दास और छोटे महंत राम रोशन दास के बीच विवाद हो गया है । मंदिर के अगले उत्तराधिकारी को लेकर दो महंतों के बीच विवाद उठने के बाद से जानकी मंदिर का मामला समय–समय पर सुर्खियों में रहा है । समझा जाता है कि मुख्य महंत रामतपेश्वर अपने शिष्य मनोज दास को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाह रहे हैं जबकि छोटे महंत रामरोशन दास सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की कोशिश कर रहे हैं । मनोज दास ने छोटा महंत रामरोशन दास के कार्य पर आपत्ति जतायी और कोर्ट में केस दायर कर दिया । करीब एक साल पहले मनोज दास ने खुद को वरिष्ठ बताते हुए मंदिर का अगला उत्तराधिकारी खुद को बनाने की मांग को लेकर जिला न्यायालय धनुषा में केस दायर किया था । सायद इन्हें त्याग, अध्यात्म और भौतिक मोह के बीच फरक नहीं दिखाई दे रहा है । ये लोग धर्म को भी कमाई का अखाड़ा बनाने पर तुले हुए हैं । इन्हें न तो विदेह के साक्षी भाव का ज्ञान है ना ही जनक के गुरु परम ज्ञानी अष्टावक्र के सांख्य ज्ञान का ध्यान है । पद और पैसा के लिए लड़नेवाला संत महंत नहीं अंध और मोहान्ध ही कहलाएगा । इनके करतूतों से हमारी आध्यात्मिक पौराणिक विरासत को क्षतिग्रस्त होने का डर है ।

संत सुरकिशोर दास और चतुर्भ‘ज गिरी जी के वाद जनकपुर के प्रतिष्ठा को किसिने महिमा मंडित किया है तो, वो है महारानी वृषभानु कुमारी । जनकपुर अपने आप मे विश्व प्रतिष्ठित है । जानकी मंदिर के ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता के आगे विश्व बौना पर जाता है । राजा जनक और परम ज्ञानी अष्टावक्र के प्रज्ञा को आज भी कोई टक्कर नहीं दे सकता । ब्रहमज्ञानी गार्गी और मैत्रेयी जैसे विदुषी के द्वारा सिंचित यह भूमि साक्षात जगदंबा स्वरूप जगत जननी माता जानकी को अपने गर्भ से प्रकट करने की क्षमता रखने के कारण विश्व मे प्रतिष्ठित है । त्रेतायुग में अवतरित जानकी जी को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है । लक्ष्मी स्वरूपा मां जानकी क्षमा एवं करूणा की साक्षात प्रतिमा हैं । जानकी जी एक आदर्श पुत्री, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू एवं आदर्श माता के रूप में पूजित हैं । जानकी जैसा त्याग, समर्पण तथा वात्सल्य भाव कहीं और दिखलाई नहीं देता । भारतीय देवियों में सती शिरोमणि भगवती श्री सीता जी का स्थान सर्वोत्तम है । जनक सुता होने के कारण इनका नाम जानकी भी प्रचलित है । स्त्री के शील और धैर्य की श्री जानकी जी के चरित्र में पराकाष्ठा है । यही कारण है कि भारतीय साहित्य के अधिकांश पृष्ठ श्री सीता जी के धवल चरित्र के आज भी साक्षी बने हुए हैं । इतिहास, पुराण से लेकर ग्राम्य गीतों तक में श्री सीता जी की समान रूप से प्रतिष्ठा हुई है । रामायण में सीता को ‘सीतासहस्त्रनाम’ नामक हजारों नामों से पुकारा गया है । जानकी, वैदेही, मैथिली, किशोरी, सिया, सर्वेश्वरी, सुभागा, रमा और रामप्रिया कहलाती हैं । जेत्री, जगतप्रिया, मिथिलेशकुमारी, भौमी, भूमिजा, तारिणी, भव्या, हरिणी आदि नामों से भी पुकारा जाता है । ‘अद् भुत रामायण’ ग्रंथ के २५वें अध्याय के अनुसार, रावण के हजार सिर वाले भाई अयोध्या पर हमला कर देता है । जिससे राम हारने लगते हैं । सीता को राम की पराजय स्वीकार्य नहीं थी । वह स्वयं युद्ध के मैदान में काली का रूप धारण कर उतरती है और हजार सिर वाले राक्षस को मार देती हैं । इस भयंकर रूप को देख राम उन्हें शांत करने के लिए हजार नामों से जप करते हैं ।

धर्म, सभ्यता, ज्ञान, संस्कृति और साहित्य के संगम भूमि मिथिला जो न जाने कितने रहस्य को अपने आप में छुपाते हुये सदियों से नेपाल की स्वर्णिम धरती को शोभायमान करती आ रहीं है । मैं गौरवान्वित हूँ कि मैंने उस धरती पर जन्म लिया जहाँ माँ सीता कण–कण में विराजती हैं, जहाँ श्री राम प्रत्येक व्यक्ति के हृदय सिंहाशन पर विराजमान हैं । ज्ञान, ध्यान, त्याग, बलिदान, पराकर्म, प्रेम, धर्म, वचन और जीवन के सूत्रधार भूमि मिथिला को कौन नहीं जानता ? हर कोई इस पावन भूमि के पवित्र मिट्टी मे सन्निहित सीताराम के पद कमल से संस्कारित रजकण का तिलक लगाकर सुफल मनोरथ के भावों से खुद को भावित महसूस करता है । जनकपुर धाम के दस किलोमीटर के दायरे में ऋृषि– मुनियों के आश्रमों के अवशेष यहाँ आज भी मौजूद हैं । जो आज वर्तमान का जनकपुर है वह कभी त्रेता युग की मिथिला नगरी था । स्थानीये लोगों की मानें तो प्रभु श्री राम आज भी यहाँ मौजूद हैं । आज भी अयोध्या और जनकपुर के लोग त्रेता युग के रिश्ते को कायम कर रखा है । आज भी हर बरस यहाँ त्रेता युग के विवाह की वो सारी रस्में निभाई जाती है जो कभी त्रेता में निभाई गई थीं । आज भी अयोध्या से जनकपुर बारात आती है ।

ग्यारहवीं शताब्दी में सिमरौन गढ़ में स्थापित कर्नाट राजवंश के दस्तावेजों में जनकपुर की चर्चा नहीं की गयी है । इससे यह सिद्ध होता है कि इससे पहले जनकपुर को किसी अन्य नाम से जाना जाता था, या तो कर्नाट वंश के शासनकाल के दौरान, जनकपुर जनक वंश के शहर के रूप में प्रसिद्ध हो गया और यहाँ मेले लगने लगे । यह जनक की नगरी मिथिला की प्रसिद्धि ही थी कि रामानंदी संप्रदाय के प्रसार के साथ साधु मिथिला की खोज में जनकपुर आने लगे । इस क्रम में सबसे पहले राम मंदिर के आदि महंत चतुर्भ‘ज सामने आते हैं, जिन्हें विजयुर गढ़ी के सेन वंशीय राजा इंद्रविधाता सेन ने १७१७ में रामजानकी मंदिर के लिए दान पत्र लिखा था । इन्द्रविधाता सेन का दान १७१७ माना जाता है और उचित भी प्रतीत होता है । क्योंकि माणिक सेन ने १७२७ में जानकी मंदिर के आदिसंत सुरकिशोर दास के वंशज (चौथी पीढ़ी) राम दास को दान पत्र दिया था । ये दोनों दस्तावेजÞ इस प्रश्न का समाधान नहीं करते हैं कि चतुर्भ‘ज गिरि और सुरकिशोर दास के बीच पहले कौन आया, लेकिन यह इंगित करता है कि गिरि का राम मंदिर उस समय प्रसिद्ध था । उस समय के सूत्रों के अनुसार, हालाँकि आसपास छोटी–छोटी कृषक बस्तियाँ थीं, जनकपुर एक वन क्षेत्र था जहाँ कुछ साधु रहते थे और यहाँ रामनवमी का मेला लगता था । कुछ स्रोतों से संकेत मिलता है कि वर्तमान राम मंदिर संभवतः चौथी संरचना है । जब इंद्रविधाता सेन ने राम मंदिर (तत्कालीन रामजानकी मंदिर) का दान दिया, तो संभवतः उन्होंने वहां एक सामान्य मठ भी बनवाया । क्योंकि शाहवंशी दस्तावेजों में इस बात का जिक्र है कि १७८२ ई. में राजा रण बहादुर शाह के जरनैल अमरसिन थापा ने राम मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था ।

जनकपुर न केवल हिंदुओं के लिए बल्कि बौद्ध और जैन सहित कुछ अन्य धार्मिक समूहों के लिए भी आस्था का केंद्र है । वाल्मिकी रामायण के अनुसार जनकपुर का प्राचीन नाम बैजन्त था । बैजन्त शब्द की चर्चा देवी भागवत पुराण में भी मिलती है । कुछ समय बाद मीथी राजा बन गए । उन्होंने बैजन्त का नाम बदलकर मिथिलापुरी रख दिया । मिथिलापुरी अपने नाम से मिथिला की राजधानी को दर्शाता है । हिंदुओं के महान ग्रंथ रामायण, महाभारत और पुराण भी इसी नाम से मिथिला को सम्बोधन किया गया है । प्राचीन काल में जनकपुर का आकार बहुत बड़ा था । सीमा पर नजर डालें तो यह क्षेत्र पूर्व में कमला से पश्चिम में ध्र‘वकुंड, जलेश्वर तक और दक्षिण में गिरिजास्थान से लेकर उत्तर में धनुषाधाम तक सीमाबद्ध था । प्राचीन जनकपुर का क्षेत्रफल ३१.२ वर्ग मील था जो वर्तमान में सिमट कर एक छोटे क्षेत्रफल में रह गया प्रतीत होता है ।

धार्मिक दृष्टि से यह नगर इतना पवित्र था कि शिवजी इसकी चारों ओर से रक्षक बनकर रक्षा करते थे । जिसका वर्णन इस प्रकार हैः पूर्व में शिलानाथ और कपिलेश्वरनाथ, दक्षिण में कल्याणेश्वरनाथ और कुपेश्वरनाथ, पश्चिम में जलेश्वरनाथ और भैरवनाथ तथा उत्तर में जलाधिनाथ और क्षीरेश्वरनाथ थे जो आज भी विद्यमान हैं । प्राचीन जनकपुर अत्यंत समृद्ध एवं वैभवशाली नगर था । त्रेता युग में जनकपुर की प्रतिष्ठा काफी ऊंचाई पर पहुंच गई थी । इसकी तुलना इन्द्र की जयन्तपुरी से की गयी । जनक (सिरध्वज) के समय में इसकी गरिमा और भी बढ़ गई थी । जब ब्रह्माजी राम के विवाह के लिए जनकपुर आए, तो उनके द्वारा बनाई गई चीजें कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थीं, यानी ब्रह्मा ने जिस तरह से जनकपुर का निर्माण किया था, उससे भी अधिक सुंदर लग रहे थे । जनकपुर को देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो गये । उन्होंने जनकपुर की सभ्यता की तुलना वैदिक काल के आर्यावर्त की सभ्यता से की । यह स्थान जपतप ज्ञान की भूमि बन गया । उत्तर–वैदिक काल में यह विद्या और कला की विरासत बन गया । जनकपुर का उल्लेख यजुर्बेद में भी मिलता है । याज्ञवल्क्य जैसे प्रसिद्ध दार्शनिक जनक के गुरु थे । इसी प्रकार अष्टबक्र, गार्गी, मैत्रेयी, आरुणि जैसे धुरंधर मुनि भी इसी महल में रहते थे । इन ऋषियों ने जनसभा को सुशोभित किया जहाँ महान विद्वानों की चर्चा से ज्ञान की धाराएँ बहती थीं । देश–विदेश से ज्ञान के इच्छुक लोग जनसभा में आते थे और ज्ञान से संतुष्ट होकर लौटते थे । व्यास पुत्र शुकदेव भी अपना संदेह दूर करने के लिए जनकपुर आए और जनक के उत्तर से संतुष्ट होकर खुशी–खुशी घर लौट आए । जनकपुर की विद्वता विदेह तक ही सीमित न रहकर पांचाल, कुरु तथा कोसल तक पहुँची । मिथिला के कमलाकानन में ही ऋषियों ने न्यायसूत्रों की रचना की थी । इस काल में सीरध्वज राजर्षिजनक के नाम से प्रसिद्ध हुए । उन्होंने सीता को भगवान का उपहार माना और बेटी की तरह पाला । विश्वामित्र जैसे महान ऋषियों ने भी मिथिला के पूर्वी क्षेत्र में अपने सिद्धाश्रम स्थापित किये ।

जैसे–जैसे अयोध्या राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तारीख नजदीक आ रही है वैसे–वैसे भक्तों का उत्साह चरम पर पहुँचता जा रहा है । इस समय अयोध्या की रौनक देखते ही बन रही है । इस बीच भगवान श्रीराम के ससुराल नेपाल से खूब सारे उपहार अयोध्या पहुँचे । भगवान श्रीराम की ससुराल नेपाल के जनकपुर धाम से ‘भार यात्रा’ अयोध्या पहुंची तो उसका जगह–जगह पुष्पों से स्वागत किया गया । भगवान के ससुराल से बड़ी संख्या में उपहार अयोध्या भेजे गये हैं जोकि आज राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को सौंपे गये । इस दौरान चंपत राय ने कहा कि भारत–नेपाल के संबंध त्रेतायुग से हैं । हम आपको बता दें कि मिथिला संस्कृति के अनुसार विवाह के बाद जब बेटी ससुराल जाती है तो उसे सौगात (भार) भेजी जाती है । इसी परंपरा को निभाते हुए जनकपुर से भार यात्रा शुरू हुई थी जोकि बिहार के मिथिला होते हुए अयोध्या पहुंची । भेंट यानी भार को करीब ५०० लोग लेकर पहुंचे हैं ।
मिथिला और अवध के इस कौटुंबिक संबंध ने एक नई संस्कृति का जन्म हुआ जो सीताराम संस्कृति के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुई । आज भी जब श्रद्धालु जनकपुरधाम आते हैं तो मिथिला और अवध के रिश्ते को इस तरह प्रदर्शित करते हैं, “कमला बिमला मिथिलाधाम, अवध सरयू सीताराम ।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने भी यहां आकर याज्ञवल्क्य से वार्तालाप किया था और जगतगुरु के ज्ञान से पूर्ण संतुष्टि प्राप्त की थी । द्वापर में कृष्ण भी यहीं आये थे और जनकपुर के मुरलीसर (पोखरी) में अपने कर्मयोग की ज्योति जलाई थी । इन आगमनों से पता चलता है कि जनकपुर इस काल में भी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र था । दूसरी ओर, विदेह का कुरुदरबार से भी एक अलग रिश्ता था । यहां दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण के लिए कुश्ती और अन्य खेल खेलने का अखाड़ा बनाया गया था । यहाँ अतिथि के रूप में हलधर बलराम भी आये थे । मिथिला राजा सुमित्र के शासनकाल में गौतम बुद्ध भी जनकपुर आये थे । वह उदारवादी और रंगभेद विरोधी थे । चीनी यात्री ह्वेनसांग भी अपनी भारत यात्रा के दौरान जनकपुर आये थे । इस धरती के अवतार परशुराम भी यहीं आये थे । इस प्रकार मिथिला राजनीतिक भूगोल में एक अद्वितीय संप्रभु देश था जिसने केवल आर्यावर्त क्षेत्र में ही प्रसिद्धि प्राप्त की । विद्वानों के अनुसार मिथि वंश के चौवन राजा थे । इनमें सीरध्वज बाईसवें स्थान पर थे । वहाँ वे राजर्षिजनक के नाम से प्रसिद्ध हुए । मीथी राजवंश ने ईसा पूर्व लगभग २,००० वर्ष तक शासन किया । मिथिला का अंतिम राजा कराल था । जनकपुर की जनता उसके विरोध में उठ खड़ी हुई क्योंकि उसने अपने कामुक कृत्य से एक युवती का सतीत्व भंग कर दिया था । इस आन्दोलन ने कराल को राजमहल से खींचकर मार डाला । मिथिला के राजाविहीन हो जाने के बाद मगध, पाल, कन्नौज, तुर्कादि ने बारी–बारी से शासन किया ।

इस प्रकार बैजन्तपुरी÷मिथिलापुरी÷जनकपुर के नाम इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह गये । भले ही यह धरती से लुप्त हो गया है, लेकिन इसकी कला, संस्कृति, भाषा, साहित्य, रीति–रिवाज, मूल्य, मान्यताएं और परंपराएं आज भी जीवित हैं, जो हमें गौरवान्वित करती हैं ।

संत सुरकिशोर दास ने हिंदी भाषा में ‘मिथिला विलास’ लिखकर संत साहित्य की शुरुआत की । इसमें योगदान देने वाले संतों में प्रयाग दास, वैदेही शरण आदि संत शामिल थे । वे मन्दिरों तथा कुटियाओं के निर्माण में सहायता करने लगे । कुछ समय बाद तराई और विहार के उत्तरी क्षेत्र में रहने वाली प्रत्येक जाति ने जनकपुर में अपने–अपने मंदिर और झोपडÞियाँ बनाईं, जिनका उपयोग हम आज भी कर रहे हैं । इसी तरह जनकपुर के निर्माण और विकास में मदद करने वाले अवधकिशोर दास ‘प्रेम निधि’ जन्म से गुजराती थे । उन्होंने जनकपुर की महिमा सुनी थी और यहीं बस गये थे । यहां कई धार्मिक पुस्तकें लिखी गईं जो आज भी इस आश्रम के पुस्तकालय में संरक्षित हैं । इसी प्रकार जनकपुर को आगे बढ़ाने में चतुर्भ‘ज गिरि (राम मंदिर) और रसिक अली (रसिक आश्रम) का भी कम योगदान नहीं है । वे दलित या मुस्लिम गैरीगर भी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने नौलखा जैसे मंदिर (जानकी मंदिर) के निर्माण में ज्ञछ साल बिताए । इसकी शुरुआती लागत “नौ लाख’’ रुपये होने के कारण इसे ‘नौलखा मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है । इस मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) की महारानी बृषभानु कुंवारी ने करवाया था । जो वि.सं । यह १८९४ में पूरी तरह बनकर तैयार हुआ । यह नौलखा (जानकी) मंदिर न केवल एक मंदिर है बल्कि संस्कृतियों का संगम भी है जहां मैथिली, मुगल और बैष्णवी राजपूतानी कलाएं एक ही स्थान पर मिलती हैं । उपकार के स्थान पर कृतज्ञता व्यक्त करना यदि मानव धर्म है तो जानकी मंदिर के मुख्य द्वार के सामने महारानी वृषभानु कुमारी की प्रतिमा स्थापित करना हमारा दायित्व बनता है । जनकपुर में अब भी पौराणिक धरोहरों में विभिन्न मंदिर, झोपडÞियाँ, झीलें आदि मौजूद हैं । इसलिए संतों, कुटी और कुंडों की संख्या को देखते हुए एक कहावत हैः “बावन कुटी, बहत्तर कुंड, फिर संतों का एक समूह ।” पर्यटन की दृष्टि से जनकपुर भी इन धार्मिक विरासतों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है । और इसका संरक्षण के साथ साथ संवर्धन का सम्पूर्ण दायित्व हम जनकपुरबासी के कंधों पर है ।



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