अंग्रेजो का कुत्सित मानसिक व्यवहार -जात व्यवस्था का उपहार नेपाल मे कब से ? एक यथार्थपरक विवेचना : डा.विजय दत्त

डा.विजय दत्त, काठमांडू, 6 अगस्त। एक नामुद चोर था । एकदिन वो एक साधु के पास गया अौर देखा कि साधु के पास का जो चढावा होता है उससे बहुत कम उसकी चोरी से आम्दानी होती है । उसके वाद उसने साधु बन शहर मे गया जहा उसने साधु से एक कदम अौर आगे योजित योजना अनुसार चढावे के रकम को तिरष्कार करने लगा । जिसके कारण भक्तो ने देखा कि ये तो सिद्ध महात्मा है जिसके कारण अौर भी चढावा आने लगा । इससे प्रभावित होकर नक्कली साधु ने ठाना कि यदि नक्कली मे इतनी चढावा तो असली मे कितनी होगी अौर वह नक्कली साधु असली बन गया ।
*सनातन*’ का शाब्दिक अर्थ है जो नित्य है, जिसका न कोई आदि है और न अंत, तथा ‘धर्म’ का अर्थ पूजा-पद्धति मात्र न होकर धारण करने योग्य सत्य, कर्तव्य, अहिंसा, सदाचार और न्याय को जीवन में आचरण में लाना है। यह दर्शन ईश्वर की सर्वव्यापकता में विश्वास करते हुए ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (सभी सुखी हों) और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) की उदात्त भावना पर आधारित है, जहाँ व्यक्ति को कर्म, पुनर्जन्म और आत्म-ज्ञान के माध्यम से मोक्ष जो परम सत्य की प्राप्ति की दिशा में निरंतर अग्रसर होने की स्वतंत्रता और प्रेरणा दी जाती है।
*Sanatana Dharma is the eternal, timeless way of living grounded in universal truth, moral duty, and righteous conduct that transcends individual founders and forms the foundation of Hindu philosophy.*
*विश्व मे सनातन ओंकार परिवार का जनसंख्या पुर्णतः स्पष्ट आंकडा प्राप्त नहि होने के बाबजुद भी सामाजिक प्लेटफार्म से प्राप्त कुल जनसंख्या 1.75 (एक सय पचहत्तर करोड ) के करीब है । ओंकार समाज’ या ओंकार परिवार के अंतर्गत प्रमुख धर्मों एवं दर्शनों को समाहित किया जाता है, जिनकी आध्यात्मिक चेतना और मंत्र-साधना का मूल आधार ‘ओंकार’ (ॐ) है। इसमें हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख परंपराएँ शामिल हैं। यह समाज *कुल वैश्विक आबादी का लगभग 21% से 22% हिस्सा है इसमे
१.हिन्दू धर्म: लगभग 1.20 अरब (120 करोड़)
२.बौद्ध धर्म: लगभग 50 करोड़ (500 मिलियन)
३.सिख धर्म: लगभग 3 करोड़ (30 मिलियन)
४.जैन धर्म: लगभग 50 से 60 लाख (5-6 मिलियन)
वैदिक वर्णव्यवस्था का मूल स्वरूप जन्म-आधारित न होकर व्यक्ति के प्राकृतिक गुण, स्वभाव और कर्म पर आधारित एक व्यावहारिक एवं सामंजस्यपूर्ण सामाजिक संरचना थी। इसका प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के १०वें मण्डल के ‘पुरुष सूक्त’ में मिलता है, जहाँ समाज को एक विराट पुरुष (ईश्वर) के शरीर के रूप में रूपकात्मक ढंग से चित्रित किया गया है जिसमें ज्ञान एवं विचार के प्रतीक ब्राह्मणों को मुख, रक्षा एवं शक्ति के प्रतीक क्षत्रियों को बाहु/भुजाएँ, समृद्धि एवं व्यापार का संचालन करने वाले वैश्यों को उरु/जाँघें और सेवा तथा श्रम का दायित्व निभाने वाले शूद्रों को पद/चरण माना गया। यह वर्गीकरण किसी ऊँच-नीच या जन्मजात विशेषाधिकार की भावना पर आधारित नहीं था, बल्कि समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए *श्रम के प्राकृतिक विभाजन* (Division of Labor) पर टिका था। इस काल में एक ही परिवार के सदस्य अपनी-अपनी योग्यताओं और व्यवसायों के अनुसार अलग-अलग वर्ण के हो सकते थे, तथा शिक्षा, योग्यता और कर्म के बल पर वर्ण-परिवर्तन पूर्णतः संभव और स्वीकृत था। भगवद्गीता भी इसी वैदिक विचार का समर्थन करते हुए स्पष्ट रूप से घोषणा करती है- *चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:*। अर्थात चारों वर्णों की रचना गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की गई है, न कि जन्म से। संक्षेप में, वैदिक वर्णव्यवस्था समाज को परस्पर निर्भर, अनुशासित और सर्वांगीण रूप से समृद्ध बनाए रखने की एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें प्रत्येक कार्य और योगदान को ईश्वर रूपी समाज के लिए समान रूप से आवश्यक एवं सम्मानजनक माना गया था।
*उत्तर-वैदिक काल* (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व) में ऋग्वैदिक काल की लचीली और कर्म-आधारित वर्णव्यवस्था में स्पष्ट रूप से कठोरता आने लगी और यह धीरे-धीरे जन्म-आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था के रूप में ढलने लगी। इस काल में कृषि का मुख्य व्यवसाय बनना, लोहे/श्यामा अयस की खोज और सामाजिक-आर्थिक जटिलताओं के बढ़ने से समाज में श्रम का विभाजन और अधिक गहरा हो गया। ब्राह्मणों का धार्मिक अनुष्ठानों, कर्मकांडों और ज्ञान पर एकाधिकार मजबूत हुआ, जिससे उनकी सामाजिक श्रेष्ठता स्थापित हुई, जबकि क्षत्रियों ने राजनीतिक शक्ति और भूमि पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ किया। वैश्य वर्ग, जो मुख्य रूप से व्यापार, कृषि और पशुपालन में संलग्न था, करदाता बना और समाज के अधिकांश आर्थिक बोझ का वहन करने लगा, वहीं शूद्रों की स्थिति में भारी गिरावट आई और उन्हें केवल ऊपरी तीन वर्णों की सेवा तक सीमित कर दिया गया। इसी काल में यज्ञों की जटिलता बढ़ने और विविध शिल्पों एवं व्यवसायों के वंशानुगत होने के कारण अनेक उप-समूहों और हस्तशिल्प श्रेणियों का उदय हुआ, जिन्होंने आगे चलकर पृथक ‘जातियों’ का रूप धारण किया। अंतर-वर्ण विवाहों/अनुलोम और प्रतिलोम विवाह पर पाबंदियाँ लगनी शुरू हुईं, खान-पान और सामाजिक सहभोज के नियम कठोर हो गए, तथा व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और कर्तव्य उसके गुण-कर्म के बजाय उसके ‘जन्म’ से तय होने लगे। संक्षेप में, उत्तर-वैदिक काल वह संधि-काल था जहाँ *वैदिक काल का समतावादी और लचीला सामाजिक ताना-बाना समाप्त होकर एक कठोर, वंशानुगत और सोपानबद्ध (hierarchical) जाति व्यवस्था की नींव मजबूती से रख दी गई।*
वैदिक काल की गुण-कर्म आधारित ‘वर्ण व्यवस्था’ का उत्तर-वैदिक और उत्तरवर्ती काल की जन्म-आधारित एवं सोपानबद्ध (hierarchical) ‘जाति व्यवस्था’ में रूपांतरण एक जटिल ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम था। इस परिवर्तन की मुख्य शुरुआत उत्तर-वैदिक काल में लोहे की खोज और कृषि के व्यापक प्रसार से हुई, जिसने समाज में अधिशेष उत्पादन (surplus production) और नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया। जैसे-जैसे विभिन्न व्यवसायों (जैसे लोहार, कुम्हार, बुनकर, स्वर्णकार आदि) का विशिष्टीकरण हुआ, ये व्यावसायिक समूह अपने शिल्प और ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए अपनी ही पीढ़ियों में हस्तांतरित करने लगे, जिससे ये श्रेणियाँ धीरे-धीरे वंशानुगत व्यावसायिक ‘जातियों’ में बदलने लगीं। इसके साथ ही, धार्मिक क्षेत्र में जटिल यज्ञों और कर्मकांडों के बढ़ने से ब्राह्मण वर्ग ने ज्ञान और पुरोहिती पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया तथा अपनी सामाजिक श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए वंशानुगत पवित्रता के सिद्धांत को बढ़ावा दिया। समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के अनुसार, अंतर्विवाह (Endogamy – केवल अपनी ही श्रेणी/समूह में विवाह करने का नियम) के सामाजिक और कानूनी प्रवर्तन ने इस वर्गीकरण को पूरी तरह से सील कर दिया। धर्मशास्त्रों, गृह्यसूत्रों और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के संकलन के साथ सामाजिक नियमों, खान-पान के बंधनों और पवित्रता-अपवित्रता (purity and pollution) की अवधारणाओं को धार्मिक एवं शास्त्रीय स्वीकृति दे दी गई। भिन्न-भिन्न वर्णों के बीच हुए अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी शास्त्रों द्वारा नई ‘वर्णसंकर’ जातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया, जिससे जातियों और उप-जातियों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। अंततः, जो व्यवस्था प्रारंभ में योग्यता, स्वभाव और श्रम के लचीले विभाजन पर आधारित थी, वह आर्थिक हितों के संरक्षण, धार्मिक एकाधिकार, वंशानुगत व्यवसायों और कठोर वैवाहिक नियमों के एकत्रीकरण के कारण जन्म से तय होने वाली एक अपरिवर्तनीय और शोषणकारी जाति व्यवस्था में परिणत हो गई।
*ब्रिटिश शासनकाल का बिषवमनकारी जनगणना*-
*ब्रिटिश शासन के दौरान 1901 की जनगणना भारत* में जाति व्यवस्था को प्रशासनिक और कानूनी रूप से संस्थागत (institutionalized) करने तथा भारतीय समाज को विभाजित करने के दृष्टिकोण से एक अत्यंत निर्णायक मोड़ थी। इस जनगणना का मुख्य नेतृत्व जनगणना आयुक्त *हरबर्ट होप रिजले*(Sir Herbert Hope Risley) ने किया था, जो स्वयं एक मानवविज्ञानी (anthropologist) थे और प्रजातीय श्रेष्ठता के सिद्धांतों (Racial Theories) में गहरा विश्वास रखते थे।
1901 की जनगणना का स्वरूप और तरीका
*सामाजिक श्रेष्ठता (Social Precedence) का सोपानक्रम-
1901 की जनगणना से पहले (1872, 1881, 1891) जातियों का आंकड़ा तो एकत्र किया जाता था, लेकिन 1901 में रिजले ने पहली बार पूरी जनगणना को *सामाजिक श्रेष्ठता के सोपानक्रम* (Order of Social Precedence) के आधार पर आयोजित किया। इसके तहत प्रत्येक क्षेत्र में जातियों की एक आधिकारिक सूची बनाई गई और धर्मशास्त्रों तथा उच्च जातियों के मानकों के आधार पर यह तय किया गया कि कौन सी जाति किससे उच्च या निम्न है।
*मानवमिति (Anthropometry) और छद्म-विज्ञान का प्रयोग:*
रिजले ने जातियों के वर्गीकरण के लिए ‘नासिक मापन’ (Nasal Index) और शारीरिक लक्षणों का सहारा लिया। उनका मानना था कि उच्च जातियों का संबंध ‘आर्य प्रजाति’ से है और निम्न जातियों का ‘द्रविड़ या स्थानीय प्रजातियों’ से। इस छद्म-वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने सामाजिक असमानता को एक ‘जैविक और प्रजातीय’ आधार देने की कोशिश की।
*जाति-दावों और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा:*
जनगणना में अपनी जाति की उच्च रैंकिंग पाने के लिए विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच होड़ मच गई। सैकड़ों जातियों ने जनगणना अधिकारियों के समक्ष याचिकाएँ दायर कीं और अपने पारंपरिक नामों को बदलकर ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’ या ‘ब्राह्मण’ सूचक नाम दर्ज कराने की माँग की। अंग्रेजों ने इन दावों का न्यायधीश बनकर फैसला किया, जिससे जातियों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्य में भारी वृद्धि हुई।
*ब्रिटिश नीति और हिन्दू समाज पर इसका बहुत बुरा प्रभाव*-
तरल (Flexible) व्यवस्था को ‘ठोस और अपरिवर्तनीय’ बनाना:
अंग्रेजों से पहले भारतीय समाज में जातियों और सीमाओं के बीच एक प्रकार का लचीलापन था। स्थानीय स्तर पर जातियों की स्थिति बदलती रहती थी। लेकिन 1901 की जनगणना ने कागजों पर हर व्यक्ति की जाति की एक निश्चित पहचान अंकित कर दी, जिससे जातियों की सीमाएँ पूरी तरह से जम (rigid) गईं।
*फूट डालो और राज करो* (Divide and Rule) की नीति-
19वीं सदी के अंत तक भारत में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम का उभार हो रहा था। ब्रिटिश प्रशासन ने महसूस किया कि यदि भारतीय समाज को धार्मिक, जातीय और प्रांतीय पहचानों में उलझाकर रखा जाए, तो एकताबद्ध राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर किया जा सकता है। जातिगत सोपानक्रम को आधिकारिक रूप देकर उन्होंने समाज के भीतर ही संघर्ष की नई दीवारें खड़ी कर दीं।
*दलित और शोषित वर्गों का पृथक्करण*
1901 की जनगणना में अस्पृश्य/दलित समुदायों को अलग से चिह्नित करने की नींव पड़ी, जिसे आगे चलकर 1930 के दशक में ‘अनुसूचित जातियों’ (Scheduled Castes) का कानूनी रूप दिया गया। यद्यपि इससे शोषित वर्गों की संख्यात्मक पहचान हुई, परंतु अंग्रेजों का मुख्य प्रशासनिक उद्देश्य सुधार के बजाय समाज को विभिन्न राजनीतिक गुटों में बांटना था।
1901 की जनगणना ने जातियों की पारंपरिक और स्थानीय पहचान को एक राष्ट्रव्यापी प्रशासनिक ढांचे में बदलकर हिन्दू समाज के आंतरिक भेदों को अधिक गहरा और स्थायी बना दिया।
हरबर्ट होप रिजले द्वारा रचित सबसे प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली पुस्तक “द पीपुल ऑफ इंडिया” (The People of India – 1908) है (इसके अतिरिक्त उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति “द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल” – 1891 भी है)। इस पुस्तक के माध्यम से रिजले ने अपनी प्रजातीय (Racial) अवधारणाओं को प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि भारतीय समाज की रीढ़ उसकी जाति व्यवस्था है, जो *नस्लीय* और सामाजिक भिन्नताओं पर टिकी हुई है। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने रिजले के इन सिद्धांतों और 1901 की जातिगत जनगणना के आंकड़ों का सुनियोजित उपयोग भारत में अपनी हुकूमत को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए किया। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) नीति के तहत, रिजले के वर्गीकरण ने हिन्दू समाज की पारंपरिक, क्षेत्रीय और लचीली जाति व्यवस्था को एक सख्त, राज्य-स्वीकृत और अपरिवर्तनीय सोपानक्रम (Hierarchy) में ढाल दिया। प्रत्येक व्यक्ति की जाति को सरकारी दस्तावेजों और जनगणना में दर्ज करके अंग्रेजों ने सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे जातियों के बीच आपसी सद्भाव के बजाय सामाजिक रैंकिंग पाने की होड़ और प्रतिद्वंद्विता पैदा हो गई। रिजले ने यह छद्म-वैज्ञानिक सिद्धांत फैलाया कि भारत का उच्च वर्ग मूलतः ‘आर्य’ प्रजाति का है जबकि निम्न वर्ग ‘द्रविड़ या अनार्य’ है, जिससे समाज में आंतरिक श्रेष्ठता और हीनता का भाव गहरा गया। ब्रिटिश साम्राज्यवादी विचारकों का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को एक ‘एकजुट राष्ट्र’ (Unified Nation) के रूप में विकसित होने से रोकना था, क्योंकि वे जानते थे कि यदि भारत की विविध जातियाँ अपनी स्थानीय और जातीय पहचानों से ऊपर उठकर एक भारतीय राष्ट्रीय पहचान में संगठित हो गईं, तो ब्रिटिश हुकूमत का पतन निश्चित हो जाएगा। इसलिए, रिजले के जातिगत अध्ययनों ने भारतीय समाज को हजारों टुकड़ों और राजनीतिक हितों में विभाजित कर दिया, जिससे राष्ट्रीय चेतना खंडित हुई और अंग्रेजों को यह बहाना बनाने का अवसर मिला कि एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धी जातियों वाले इस समाज पर शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश शासन का बने रहना अनिवार्य है। इस प्रकार, रिजले का बौद्धिक और प्रशासनिक कार्य हिन्दू समाज के आंतरिक विभाजन को गहरा करके ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की आयु बढ़ाने का एक अत्यंत सुनियोजित और दीर्घकालिक ढांचा साबित हुआ।
*नेपाल मे जात व्यवस्था कब से ?*
नेपाल में जात व्यवस्था की जड़ें प्राचीन काल से जुड़ी हैं, लेकिन इसे औपचारिक और कानूनी रूप से दो प्रमुख ऐतिहासिक चरणों में लागू और सुदृढ़ किया गया। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, ईसा की चौथी से आठवीं शताब्दी के दौरान *लिच्छवि राजवंश के शासनकाल* में भारतीय उपमहाद्वीप से हिंदू धर्म और वर्ण व्यवस्था का प्रभाव नेपाल में प्रवेश कर चुका था, किंतु उस समय यह व्यवस्था सामाजिक रूप से उतनी कठोर नहीं थी। जात व्यवस्था को पहली बार एक व्यवस्थित सामाजिक संहिता के रूप में 14वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1380 ईस्वी) में काठमांडू घाटी के मल्ल राजा *जयस्थिति मल्ल* द्वारा लागू किया गया। उन्होंने भारतीय विद्वानों की सहायता से मनुस्मृति पर आधारित एक सामाजिक ढांचा तैयार किया, जिसके तहत काठमांडू घाटी के नेवार समाज को व्यवसाय और व्यावसायिक कर्तव्यों के आधार पर 64 विभिन्न जातियों और उप-जातियों में विभाजित कर दिया गया। इसके बाद, नेपाल में संपूर्ण राष्ट्र के स्तर पर जात व्यवस्था को पूर्ण कानूनी और औपचारिक दर्जा ब्रिटेन का भ्रमण के वाद 1854 ईस्वी (विक्रम संवत 1910) में तत्कालीन *प्रधानमंत्री जंगबहादुर राणा* द्वारा जारी किए गए ‘मुलुकी ऐन’ (देश का मुख्य कानून) के माध्यम से मिला। इस कानून ने नेपाल के विविध नृजातीय, धार्मिक और भाषाई समूहों को एक ही राज्य-प्रायोजित कठोर हिंदू धार्मिक पदानुक्रम (Hierarchy) में बांध दिया। मुलुकी ऐन के तहत पूरे नेपाली समाज को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा गया था: तागाधारी (जनेऊ धारण करने वाली उच्च जातियां जैसे बाहुन और क्षेत्री), वाली (मदिरापान करने वाले नृजातीय समूह), पानी न चलने वाली छूत-अछूत से मुक्त जातियां, और पानी न चलने वाली तथा ‘अछूत’ मानी जाने वाली जातियां। इस कानून ने न केवल विवाह, भोजन और सामाजिक संपर्कों को जातियों के अनुसार सीमित किया, बल्कि अपराधों के लिए दंड और कर व्यवस्था भी व्यक्ति की जात के आधार पर तय की। हालांकि 1963 ईस्वी (विक्रम संवत 2020) में राजा महेंद्र द्वारा नए मुलुकी ऐन के माध्यम से जात-पात के आधार पर भेदभाव को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया और 2015 के नेपाल के संविधान ने इसे एक दंडनीय अपराध घोषित किया, फिर भी 1854 के कानून द्वारा स्थापित जात व्यवस्था का गहरा प्रभाव नेपाल के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ताने-बाने पर आज भी देखा जाता है।
*निष्कर्ष*
सर हरबर्ट होप रिजले द्वारा रचित सबसे प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली पुस्तक *द पीपुल ऑफ इंडिया* (The People of India – 1908) है (इसके अतिरिक्त उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति “द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल” – 1891 भी है)। इस पुस्तक के माध्यम से रिजले ने अपनी प्रजातीय (Racial) अवधारणाओं को प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि भारतीय समाज की रीढ़ उसकी जाति व्यवस्था है, जो नस्लीय और सामाजिक भिन्नताओं पर टिकी हुई है। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने रिजले के इन सिद्धांतों और 1901 की जातिगत जनगणना के आंकड़ों का सुनियोजित उपयोग भारत में अपनी हुकूमत को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए किया। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) नीति के तहत, रिजले के वर्गीकरण ने हिन्दू समाज की पारंपरिक, क्षेत्रीय और लचीली जाति व्यवस्था को एक सख्त, राज्य-स्वीकृत और अपरिवर्तनीय सोपानक्रम (Hierarchy) में ढाल दिया। प्रत्येक व्यक्ति की जाति को सरकारी दस्तावेजों और जनगणना में दर्ज करके अंग्रेजों ने सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे जातियों के बीच आपसी सद्भाव के बजाय सामाजिक रैंकिंग पाने की होड़ और प्रतिद्वंद्विता पैदा हो गई। रिजले ने यह छद्म-वैज्ञानिक सिद्धांत फैलाया कि भारत का उच्च वर्ग मूलतः “आर्य’ प्रजाति का है जबकि निम्न वर्ग ‘द्रविड़ या अनार्य’ है,ये आंख अौर नाक का आकार से निर्धारण किया । तीसरा जो आंख अौर कान का आकार छोटा था उसे मंगोल समूह मे रख दिया । जिससे समाज में आंतरिक श्रेष्ठता और हीनता का भाव गहरा गया। ब्रिटिश साम्राज्यवादी विचारकों का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को एक ‘एकजुट राष्ट्र’ (Unified Nation) के रूप में विकसित होने से रोकना था, क्योंकि वे जानते थे कि यदि भारत की विविध जातियाँ अपनी स्थानीय और जातीय पहचानों से ऊपर उठकर एक भारतीय राष्ट्रीय पहचान में संगठित हो गईं, तो ब्रिटिश हुकूमत का पतन निश्चित हो जाएगा। इसलिए, रिजले के जातिगत अध्ययनों ने भारतीय समाज को हजारों टुकड़ों और राजनीतिक हितों में विभाजित कर दिया, जिससे राष्ट्रीय चेतना खंडित हुई और अंग्रेजों को यह बहाना बनाने का अवसर मिला कि एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धी जातियों वाले इस समाज पर शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश शासन का बने रहना अनिवार्य है। इस प्रकार, रिजले का बौद्धिक और प्रशासनिक कार्य हिन्दू समाज के आंतरिक विभाजन को गहरा करके ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की आयु बढ़ाने का एक अत्यंत सुनियोजित और दीर्घकालिक ढांचा साबित हुआ। जब 1857 ई मे हुई सिपाही बिद्रोह मे ब्रिटिश सरकार बुरी तरह पराजित हुई उसके वाद ये कुत्सित योजना शुरु कि ।
भारत में कानून के तहत जात-व्यवस्था और अस्पृश्यता को 15 अगस्त 1947 में देश की आजादी के साथ संवैधानिक मान्यता समाप्त कर दी गई तथा 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसे पूर्णतः गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध घोषित किया गया। इसके क्रियान्वयन के लिए 1955 में *अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम* लागू किया गया, जिसे बाद में ‘नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम’ का नाम दिया गया। इस *समाज बिरोधि समस्या समाधान के लिए वैवाहिक परम्परा को गोत्र परम्परा* के आधार पर निर्धारण करना उचित होगा कि ?

विश्लेषक

