Tue. May 5th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

गज़ब है मतदान में लगने वाली स्याही का इतिहास

 
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

अमरीकी इतिहास में चार राष्ट्रपति कम मतदान पाने के बावजूद जीत गए थे,ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार को ‘इलैक्टोरल वोट्स’ में बहुमत पाना जरूरी होता है।प्रत्येक अमरीकी राज्य के उसकी आबादी के हिसाब से ‘इलैक्टोरल वोट’ निर्धारित हैं।और ये सारे के सारे उसी उम्मीदवार को दिए जाते हैं जो राज्य में अधिक मत प्राप्त करता है।जिसे भी 270 इलैक्टोरल वोट मिल जाते है वही राष्ट्रपति बन जाता है।सन 2000 में अल गोर ने जॉर्ज बुश से पांच लाख अधिक मत हासिल किए लेकिन वो इलैक्टोरल वोट्स की गिनती में पीछे रह जाने के कारण राष्ट्रपति नही बन पाए थे।सन 1845 में अमेरिका राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नंवबर महीने के पहले सोमवार के अगले दिन यानी मंगलवार को हुए थे।तब से यही प्रथा बरकार है।19वीं सदी में अमरीका एक कृषि प्रधान देश था और किसानों को मतदान केंद्र तक पहुंचने में काफ़ी समय लगता था।शनिवार को भी वे काम कर रहे होते थे और रविवार को चलकर सोमवार को वोट देने पहुँचना संभव नहीं था।
जबकि बुधवार को मंडियों में अनाज बेचने का दिन होता था और फिर वापस लौटना होता था।
सप्ताहांत में मतदान करवाने की कोशिश पहले ही विफल हो चुकी थी।ऐसे में एक ही दिन बचा था, मंगलवार ,इसलिए मंगलवार के दिन मतदान की परंपरा आज तक चली आ रही है।जॉर्ज डब्ल्यू बुश को सन 2004 के चुनावों में कम मत मिले थे लेकिन फिर भी वे राष्ट्रपति बन गए थे।“अमरीकी चुनावों में दक्षिण के लोगों का बोलबाला होता है। वहां के लोग बहुत बातूनी होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी अकसर दक्षिण से आए लोगों का बोलबाला रहता है।” पाकिस्तान के आम चुनाव में अजीबोगरीब चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए थे,जिनमे मोबाइल फोन चार्जर, सिमकार्ड, गधा गाड़ी, बैंगन, जूते आदि शामिल हैं। कई चुनाव चिन्ह तो ऐसे हैं जो जिसको पाकर कई उम्मीदवार शर्मिंदा तक हो गए थे। पश्तो भाषा में ‘बोतल’ शब्द का इस्तेमाल किसी मूर्ख इंसान के लिए किया जाता है और एक उम्मीदवार को ‘बोतल’ चुनाव चिन्ह मिला था।वही भारत मे नीले रंग की स्याही को भारतीय चुनाव में शामिल करने का श्रेय देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को जाता है।जिन्होंने वोट डाल देने के प्रमाण स्वरूप मतदाता की उंगली पर स्याही लगाने की परंपरा शुरू की थी।एक मतदाता द्वारा एक से ज़्यादा मतदान को रोकने के लिए चुनाव दौरान मतदाताओं के बाएं हाथ की तर्जनी (अंगूठे के साथ वाली अंगुली) पर स्याही लगाई जाती है। अंगुली पर लगी यह स्याही इस बात का प्रमाण है कि अमुक व्यक्ति ने अपना वोट कर दिया है।
यह प्रक्रिया चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 49क में प्रतिरूपण (गलत पहचान) के खिलाफ सुरक्षा के रूप में निर्वाचक की बाईं तर्जनी पर अमिट स्याही लगाने का प्रावधान दिया गया है।मतदान स्याही/ चुनावी स्याही बनाने के लिए सिल्वर नाइट्रेट केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। स्याही को लगाये जाने के बाद इसे कम-से-कम 72 घंटे तक त्वचा से नहीं मिटाया जा सकता।
चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 49क में प्रतिरूपण (गलत पहचान) के खिलाफ सुरक्षा के रूप में निर्वाचक की बाईं तर्जनी पर अमिट स्याही लगाने का प्रावधान है।मतदान स्याही को लेकर कई बार लोगों के मन में यह भी सवाल रहता है कि यह स्याही मिटती क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए क्योंकि मतदान स्याही बनाने के लिए सिल्वर नाइट्रेट केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। स्याही को लगाये जाने के बाद इसे कम-से-कम 72 घंटे तक त्वचा से नहीं मिटाया जा सकता।
सिल्वर नाइट्रेट केमिकल का इस्तेमाल भी किया जाता है क्योंकि यह पानी के संपर्क में आने के बाद काले रंग का हो जाता है और मिटता नहीं है।
जब चुनाव अधिकारी मतदाता की अंगुली पर स्याही लगाते हैं तो सिल्वर नाइट्रेट हमारे शरीर में मौजूद नमक के साथ मिलकर सिल्वर क्लोराइड बनाता है। सिल्वर क्लोराइड पानी में घुलता नहीं है और त्वचा से जुड़ा रहता है। इसे साबुन से नहीं धो सकतें। यह निशान तभी मिटता है जब धीरे-धीरे त्वचा की कोशिकायें पुराने होते जाते हैं और वे उतरने लगते हैं।उच्च गुणवत्ता की मतदान स्याही 40 सेकेंड से भी कम समय में सूख जाती है। इसका असर इतनी तेजी से होता है कि अंगुली पर लगने के एक सेकेंड के अंदर ही यह अपना निशान छोड़ देती है। यही वजह है इस स्याही को जल्दी से मिटाया नहीं जा सकता।सन 1962 के चुनाव से  इस स्याही का इस्तेमाल किया जा रहा है।आजादी के बाद से अभी तक मतदान के विभिन्न तरीके अपनाये गए। गांव स्तर से लेकर राज्य और केन्द्र स्तर तक अपना जनप्रतिनिधी चुनने के लिए जो तरीके अपनाये गए उनमें हाथ उठाकर अपना जनप्रतितिधी चुनने से लेकर ईवीएम वोटिंग मशीन तक का उपयोग मतदाताओं के लिए वरदान बना। एक समय ऐसा भी था,जब गांव में लोग अपना प्रधान व ग्राम सदस्यों का चुनाव हाथ उठाकर करते थे। तब न बैलट पेपर का झंझट था ,न वोटिंग मशीन की जरूरत थी, बस हाथ उठाओं और हो गया वोट । ग्राम सभाओं के ग्राम प्रधान व ग्राम सभा सदस्यो के चुनाव सन 1962 तक हाथ उठाकर ही कराये जाते थे। लेकिन जब हाथ उठाकर वोट देने के कारण लोगो के बीच आपसी रंजिश बढने लगी तो हाथ उठाकर वोट देने की सरल व सुगम परम्परा को बन्द करना पडा। हालांकि आजादी के पहले तक तो हाथ उठाकर वोट डालने की परम्परा सामान्य थी। (लेखक राजनीतिक चिंतक वरिष्ठ पत्रकार है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड
मो0 9997809955

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *