जिन्दगी, जिसे मैंने फिर से पाया
मजफो नेपाल
जिन्दगी हमें अपने कई रूप दिखाती है । गीता में कहा है कि आप कर्म करें फल की इच्छा न करें, होगा वही जोर् इश्वर ने तय कर रखा है । छोटी सी उम्र में बहुत कुछ देखा और झेला मैंने । कल किसी ने नहीं देखा है, आज में हम जीते हैं और भविष्य की कल्पना करते हैं किन्तु गुजरा हुआ कल कई मायने और सीख दे जाता है हमें । कुछ पल तो ऐसे भी सामने आ जाते हैं जब जिन्दगी की क्षणभंगुरता हमें अहसास करा जाती है कि मृत्यु के अलावा सच कुछ भी नहीं है । मैं यह कहने की गलती नहीं करूँगा कि मैंने मौत को हराया परन्तु मैं यह अवश्य कहूँगा कि मैंने मौत से अपनी जिन्दगी का दामन छीन लिया । यह वह पल था जब जिन्दगी मेरी पकडÞ से छूटती जा रही थी । किन्तु शायद अपनों की शुभेच्छा, चिकित्सक की कोशिशर्,र् इश्वर कर्ीर् इच्छा और मेरे आत्मबल ने मुझे एक बार फिर अवसर दिया कि मैं अपनों के बीच वापस आ सकूँ ।
यह वह समय था, जब मैं पूरी तरह राजनीति में क्रियाशील था । मैंने राजनीति के विभिन्न घटनाक्रम और उसके उतार चढÞाव को प्रत्यक्ष देखा है या यूँ कहिए कि मैं उसमें शामिल था । आज जो गणमान्य सत्ता के गलियारे में अपनी पहचान और कद बनाए हुए हैं कहीं ना कहीं इस जगह तक पहुँचाने में मेरी भूमिका रही है । मधेश आन्दोलन, पहले संविधानसभा का चुनाव और मोरंग क्षेत्र नं. ५ से फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्रयादव जी के राजीनामा देने के बाद २०६५ चैत्र २८ गते मेरा निर्वाचित होना और संविधानसभा में ६६ वैशाख १५ गते सभामुख के कार्यकक्ष में हिन्दी में शपथ लेना, यह सब कुछ एक नई दिशा मेरी जिन्दगी को दे रहा था । मैं अग्रसर था अपने कार्य को सम्पन्न करने की राह में । किन्तु नेपाल की राजनीति में नीतिवश या स्वार्थवश कई उतार चढÞाव आते रहे हैं । उस वक्त भी ऐसा ही कुछ हुआ । समयचक्र और राजनीतिक उतार चढÞाव के कारण सरकार बनाने और गिराने के क्रम में मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल का विभाजन हो गया । इन राजनीतिक षड्यंत्रों के बीच संविधान नहीं बना और ०६९ जेष्ठ १४ गते की मध्यरात्रि में संविधानसभा का दुःखद विघटन हुआ, मुझे लगता है कि नेपाल के इतिहास में जिसे एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा ।
मधेश आन्दोलन द्वारा प्राप्त उपलब्धि से संविधान निर्माण नहीं किया जा सका और इसे असफल बनाने में तत्कालीन बडÞी पार्टर्ीीें एकीकृत नेकपा माओवादी, नेपाली काँग्रेस और नेकपा एमाले की प्रमुख भूमिका रही । इसी क्रम में मेरे स्वास्थ्य ने मुझे धोखा देना शुरु किया । ०६८ पौष १५ गते मुझे साधारण र्सर्दी खाँसी और बुखार हुआ । सामान्य सी लगने वाली इस बीमारी ने मुझे काफी परेशान किया । मैंने विराटनगर के अंचल अस्पताल, प्राइवेट हास्पिटल और काठमांडू के नार्भिक अस्पताल में अपना उपचार करवाया । नार्भिक अस्पताल में ०६८ के माघ और फागुन महीना में मैं वहाँ भर्ती हुआ । डा. मधु घिमिरे के संरक्षण में मेरा उपचार किया गया । शुरु में र्सर्दी खाँसी को चेक करने के बाद उसकी दवा दी गई, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ । फिर क्षयरोग का अन्देशा करके दो दिनों तक उसकी दवा दी गई किन्तु जाँच में जब क्षयरोग नहीं दिखा तो दवा बंद कर दी गई । फिर मधुमेह के लिए इन्सुलीन सुबह १६ पेन्ट और रात में १८ पेन्ट की र्सर्ुइ और उसके साथ ही स्टुराइड -इमसोलोन) दवा दी गई । यह इलाज नौ महीने तक चला किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ । मैं दिन प्रतिदिन कमजोर होता चला गया । ०६९ में इसी अवस्था में मैं अपने घर विराटनगर में एक दिन बेहोश हो गया । इसके बाद परिवारजन की कोशिश और अपनों के सुझाव पर मुझे दिल्ली ले जाया गया । वहाँ अपोलो में नोवेम्बर २६, २०१२ में मुझे भर्ती किया गया । वहाँ के डागनोसिस से पता चला कि मुझे मस्तिष्क सम्बन्धी रोग है । मुझे मधेश आन्दोलन के क्रम में २०६३/६४ के फाल्गुन महीने में विराटनगर के देवकोटा चौक में सर पर गम्भीर चोट लगी थी, सर फूट गया था । जिसमें १२ टाँके लगाए गए थे । मेरा इलाज डा. अमीर अफाफ जील के संरक्षण में लाइफ गार्ड अस्पताल में हुआ था । उस वक्त तो मेरा घाव ठीक हो गया था लेकिन उस चोट की वजह से सर के पिछले भाग में जहाँ कटा था, वहाँ का नस सिकुडÞने की वजह से मेरी हालत बिगडÞती चली गई जिसकी पहचान यहाँ के डाक्टर नहीं कर पाए थे । यह भारत के अस्पताल में जाकर पता चला । अपोलो में मेरा इलाज शुरु हुआ । डा. ललिता शेखर की निगरानी में १५ महीने तक मेरा इलाज चला, मुझे विशेष इलाज के लिए हरियाणा, गुडÞगाँव के मेदान्ता में भी भर्ती कराया गया । ७० साल के चैत्र महीने में मेरी दवा का कोर्स खत्म हुआ । इस इलाज के क्रम में मैं चिकित्सक की सलाह के अनुसार पूरी तरह रेस्ट में रहा । इसकी वजह से मैं शारीरिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में पिछडÞता चला गया । हमारे देश की चिकित्सा ने मुझे और भी बीमार कर दिया । अगर यहाँ की जाँच सही होती तो सम्भवतः मैं इतने गम्भीर रूप से बीमार नहीं पडÞता । मुझे नौ महीने इन्सुलीन दिया गया जबकि भारत की जाँच में मेरा सुगर बिल्कुल सही था । नेपाल के गलत इलाज की वजह से मुझे १५/२० लाख तक रुपए खर्च करने पडÞे । मेरी शारीरिक अवस्था भी पहले जैसी नहीं रही । राजनीति के क्षेत्र पर से भी पकडÞ ढीली हो गई है ।
कभी-कभी लगता है कि व्यक्ति जो सोचता है वह उसे हासिल नहीं होता फिर भी वह आने वाले हर पल के लिए आशान्वित होता है । मैं भी जिन्दगी को फिर से राह पर लाने की कोशिश में हूँ । देश के लिए अपनी मिट्टी के लिए कुछ करना चाहता हूँ । यह सच है कि मैं काफी पीछे चला गया हूँ किन्तु जिसतरह मैंने मौत से लडÞकर जिन्दगी को हासिल किया उम्मीद है कि कल अपनी मंजिल तक का सफर भी अवश्य तय करूँगा ।

