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जसपा विवाद… देखिए होता है क्या



काठमांडू, वैशाख २४–
जसपा अभी चर्चा में है और कारण है उसका टूटना । कहते हैं कि अभिभावक सबको बांधकर रखता है । किसी भी पार्टी का अध्यक्ष की भूमिका एक अभिभावक की होती है । उसे सबको देखना होता है । वह केवल अपनी मनमानी नहीं कर सकता है । जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव पर खुले रुप से पार्टी के ही लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि यादव पार्टी के भीतर केवल और केवल अपनी मनमानी करते हैं । यह आरोप लगाने वाले में पार्टी के ही अशोक राई के साथ और सात प्रतिनिधिसभा सदस्य हैं । इन सभी ने पार्टी विभाजन किया है और एक अलग पार्टी बनाने के लिए निवेदन भी दिया है । यहाँ कहीं न कहीं पार्टी के अभिभावक की कमी दिखती है । साफ दिखाई देता है कि यादव सभी को बांधकर नहीं रख पाएं । खास बात यह रही कि अध्यक्ष यादव अभी विदेश भ्रमण में हैं और यहाँ एक अलग ही तमशा चल रहा है । इस तमाशा में शामिल होने वाले हैं अशोक राइ ,नवलकिशोर साह सुडी, रञ्जु झा, वीरेन्द्रप्रसाद महतो, प्रदीप यादव, हसिना खान और सुशीला श्रेष्ठ हैं । सभी के सभी अपने आप को कम नहीं समझते हैं । सभी सत्ता और पद में बने रहना चाहते हैं । अध्यक्ष स्वयं तो मंत्री बन गए लेकिन अपनी ही पार्टी के लोगों क िजो अपेक्षाएं थी उन्हें पूरा नहीं कर पाएं तो एैसे में विद्रोह तो होगा ही । क्योंकि यहाँ सभी भूखे हैं पद और पावर के लिए ।
सवाल तो यह भी उठाए जा रहे हैं कि महाधिवेशन करीब है, अध्यक्ष विदेश भ्रमण में हैं तो ऐसे समय में पार्टी विभाजन कहाँ तक उचित है ? इस विभाजन से स्पष्ट होता है कि पार्टी के भीतर एक द्वन्द चल रही थी जिसने न आव देखा न ताव बस समय अनुसार अपने को पलट लिया । उनकी ही पार्टी के लोग आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि यादव सत्ता परिवर्तन के खेल में सहभागी हैं । सत्ता परिवर्तन होने के साथ ही यादव को बुलाया गया था और उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय भी दी गई । अभी वो इस सरकार में उपप्रधानमन्त्री एवं स्वास्थ्यमन्त्री है । यादव पर उनकी ही पार्टी के लोग आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि अपनी कुर्सी नहीं छोड़नी पड़े, महाधिवेशन पर कब्जा के लिए वो मनमाने ढ़ंग से पार्टी सदस्यता तथा प्रतिनिधियों का चयन कर रहे हैं ।
पार्टी विभाजन के औचित्य बारे में राई ने कहा कि– महाधिवेशन को स्वच्छ, निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से आगे बढ़ना चाहिए।’ लेकिन हमारे अंदर वह विश्वास पैदा नहीं हो सका’’, राय ने यह भी कहा कि ’’जब इसे एकता का सम्मेलन कहा जाता है, तो एकता को मजबूत करना वास्तव में आवश्यक है। लेकिन जब असंवैधानिक तरीके से आगे बढ़ने की कोशिश की जाती है तो इसे बर्दाश्त करना आंदोलन और पार्टी के लिए उचित नहीं है, इसलिए नए तरीके से आगे बढ़ने का हमने फैसला किया गया है । पार्टी के ही लोग आरोप लगा रहे हैं कि अध्यक्ष यादव किसी से कोई राय विचार नहीं लेते सभी निर्णय वह स्वयं लेते हेैं ।
जसपा के प्रवक्ता मनीष सुमन ने स्पष्ट तौर पर कहा कि कि ये तो सरासर अन्याय है । यह कदम न्यायसंगत नहीं है । महाधिवेश की तारीख तय हो चुकी है ऐसे में इस तरह का कहम उठाना अच्छी बात नहीं है । मुझे तो पता भी नहीं है कि पार्टी टूटनेके बारे में । अध्यक्ष के आने के बाद ही कोई निर्णायक कदम उठाएं जाएगे ।
एक बात तो तय है कि अभी का सफर उपेन्द्र यादव के लिए भी अब आसान नहीं होगा क्योंकि उनके पास ज्यादा लोग नहीं है । उनके साथ जो लोग हैं उनमें वे स्वयं, प्रवक्ता मनीष सुमन, राजकिशोर यादव, रेखा यादव, प्रकाश अधिकारी तथा दीपक कार्की मात्र हैं ।
नेताओं के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि एक नेता बनने के बाद वो आम जनता की जो इच्छाएं होती है उस ओर उनका ध्यान नहीं जाता है । वो मूल मुद्दे से अलग हो जाते हैंं । जिस आम नागरिक ने आपको नेता बनाया है अगर उसतक आपकी पहुँच नहीं है तो आप सफल नेता नहीं है । अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और कुर्सी के लोभ से बाहर निकल कर जनता के लिए कुछ नहीं करते हैं तो न केवल जनता वरन अपनी ही पार्टी के लोग भी आपसे अलग हो जाएंगे । जनता की समस्या को छोड़कर अपने दो चार आगे पीछे रहने वाले चमचों के पीछे लगकर अगर कोई भी नेता काम करता है तो समझे कि यह उसकी राजनीतिक यात्रा का अंत है । यह केवल एक नेता के साथ नहीं होगा वरन हर के साथ यही स्थिति होगी ।
इस भूल में हरगिज नहीं रहे कि जब कोई नेता जीतता है तो यह जीत उसकी पसंद को लेकर, या जनता उसे बहुत चाहती है इससे उसका चुनाव किया है । यह मान कर चले कि जनता के पास कोई अच्छा विकल्प नहीं है इसलिए आपको चुना है । जिस दिन कोई अच्छा विकल्प उसे मिल जाएगा या आप जनता की अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे तो वह आपको जमीन पर पटक देगी । और ऐसा पटकेगी कि आप संभल भी नहीं पाएंगे ।
अभी ज्याद कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह राजनीति है यहाँ कब क्या हो जाएं कोई नहीं जानता है । उपेन्द्र यादव क्या करते हैं ? पार्टी विभाजन का क्या होगा ? क्या अलग हुए लोगों को यादव मना पाएंगे? या एक नई पार्टी जिसने निवेदन दिया है वह पार्टी का रुप ले सकेगी । यह सभी अभी भविष्य की बातें है । अभी केवल इतना ही कहा जा सकता है कि आगे आगे देखिए होता है क्या ।

 

 



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