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मैं तो हर गंदगी से ऊपर हूं : वसन्त लोहनी

 
वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

गंदगी देखा है मैंने

गंदगी भोगा है मैंने
गंदगी से गुज़रा हूं मैं
खुद ही एक गंदगी बनकर
लेकिन मैं साफ करना चाहता हूं
पहले दूसरों की गंदगी को
एक एक के हिसाब साफ करके

नियति को मैं मानता नहीं हूं
लेकिन वक्त को जरूर
गिल्ली डंडा खेलता रहा मैं वक्त के साथ
वक्त बीतता चला जा रहा था
वक्त के बदौलत
जिस मुकाम पर मैं आ पहुंचा
सपना में कभी देखा नहीं था
ना दूर कल्पना के गगन में
लेकिन वक्त ने ताज पहना दिया

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जो किया मैंने बीती हुई दिनों में
मेरी मजबूरी थी जीने के लिए
ढेर सारी नादानी भी
लेकिन सबसे ज्यादा थी मेरी हसरतें
जिसको मैं सुलाता था हर दिन उसी तरह –
जिस तरह मां सुलाती थी अपने बच्चों को
बहुत प्रेम और उम्मीद से लोरी सुना कर

लेकिन मेरी हसरतें ताज पहनने तक का नहीं था
लेकिन वक्त में पहना दिया, पहन लिया
इसमें मेरी क्या दोष है ?
वक्त के अलावा
अगर त्रिमूर्ति डन को झनक तक लग गया होता
किसी हालत में मुझे मुकाम तक पहुंचने नहीं देते
जो आज मेरी आशीर्वाद में टिके हुए हैं
यह मुकाम तो मैंने देखा ही नहीं था
ताज पहनने की बात तो दूर क्षितिज की

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क्यों खोज रहे हो
गड़े हुए मुर्दा निकालने के लिए
कल जो बीत चुकी है
उसे बीतने दो दफ़नाया हुआ कल में
आज मैं राजनीति के भट्टा से निकला हूं
मेरी हर अपराध पिघल जा चुका है
मैं तो शुद्ध बन चुका हूं; निर्दोष पवित्र
अकबरी सोने की तरह
अब गंदगी क्यों फेंक रहे हो मेरे ऊपर?
मैं तो हर गंदगी से ऊपर हूं

 

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1 thought on “मैं तो हर गंदगी से ऊपर हूं : वसन्त लोहनी”

  1. यह दुनियां बनी भी तो कैसी है! नीचे जमीन के तले जितनी गंदगी पडी है उल की गंदी वदवू वाली हवा उपर ही छायी रहती है! जिन्दकी हमें तेरा एतवार तो श्यद ना रहा वल्कि हैरान तो कर दिया!!

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