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बुद्ध, बज्जिका और मित्र, (पुस्तक समीक्षा)

 

अजयकुमार झा । बज्जिका भाषा के सुदीर्घ और लोकप्रिय लेखक प्रियवर संजय साह कथा, लघुकथा और कविता सहित साहित्य की हर विधा में सफल यात्रा कर रहे हैं। अथक परिश्रम कर “बज्जी” पत्रिका का संपादन करने वाले इस यशस्वी लेखक का यह नया कार्य महाकाव्य “बुद्ध” की रचना उनके विशाल व्यक्तित्व को दर्शाता है। ऊर्जावान युवा साहित्यकार संजय साह ‘मित्र’ नेपाल के मधेस प्रदेश के रौतहट जिला निवासी हैं। एक प्रसिद्ध बज्जिका भाषा के लेखक और उन्नायक भी हैं। उनके प्रयासों की बदौलत नेपाल में बज्जिका भाषा फल-फूल रही है। नेपाल में बज्जिका भाषा को आधिकारिक मान्यता मिल गई है। संजय मित्र जी लगातार बज्जिका भाषा में साहित्य सृजन तथा युवाओं में साहित्य सृजन के प्रति अभिरुचि जगाने में लगे हुए हैं जिससे नेपाली बज्जिका साहित्य के साथ-साथ संपूर्ण बज्जिका साहित्य का भी धीरे-धीरे विकास हो रहा है। इस भागीरथी प्रयास के लिए संजय साह मित्र हृदय से बधाई के पात्र हैं।
मित्र के द्वारा झ्याउरे लय में रचित प्रस्तुत महाकाव्य ‘बुद्ध’ भगवान बुद्ध के सम्पूर्ण जीवन पर आधारित एक वृहत महाकाव्य है। उन्होंने इस महाकाव्य को सात भागों में विभाजित किया। वे सात अंग हैं उत्पत्ति, शिक्षा, विवाह, गृहत्याग, ज्ञानप्राप्ति, भ्रमण और निर्वाण। फिर, कहानी का विस्तार करने के लिए इन सात भागों को कई अध्यायों में विभाजित किया गया है। कुल मिलाकर, महाकाव्य 55 अध्यायों और 240 पृष्ठों तक विस्तृत है। यह महाकाव्य बज्जिका साहित्य और शब्द भंडार के लिए एक बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आया है। पैंतीस हजार शब्दों में सृजित यह महाकाव्य अति सरल तथा सहज भाव में संप्रेषित है। गाने और सुनने वालों को मंत्र मुग्ध करानेवाला यह महाकाव्य भविष्य में तुलसी कृत मानस की तरह लोकग्राह्य और लोकप्रियता को प्राप्त होगा। इस ‘बुद्ध’ महाकाव्य का बज्जिका साहित्यिक जगत में ही नहीं जनकपुर स्थित रौनीयार सेवा समिति आयोजित वेदांत विमर्श अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी में पूनः विमोचित कर सम्मान और स्वागत किया गया।
कोई भी विचार या दर्शन एक काल या समय के लिए उत्पादक होता है। उस काल के अंत में उन विचारों और दर्शनों का महत्व तिथिवाह्य हो जाना स्वाभाविक ही है, लेकिन गौतम बुद्ध के विचार या दर्शन मनुष्य के लिए विशेष विचार हैं जो आज और कल भी महत्वपूर्ण ही रहेंगे ।गौतम बुद्ध के विचार सदैव अमर हैं। जब तक इस धरती पर मानवीय अस्तित्व रहेगा तब तक गौतम बुद्ध के विचार भी इस धरती पर गतिशील रहेंगे।
जिस प्रकार उपनिषद में ऋषियों और श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण द्वारा इस जीवन और संसार पर व्यक्त किये गये विचार अमर हैं, उसी प्रकार गौतम बुद्ध द्वारा इस जीवन और संसार पर व्यक्त किये गये विचार भी अमर हैं। यह शाश्वत सत्य है। यही एस धम्मो सनंतनो है।
आज संसार हत्या, हिंसा, कत्लेआम और व्यभिचार जैसे विचार और व्यवहार से ग्रस्त है। दुनिया अब बाहुवलियो के हाथ में है. कमज़ोरों के लिए जीवित रहना कठिन हो गया है। जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, वैसे ही शक्तिशाली देश अब कमजोर देश के अस्तित्व को मिटा रहा है। यह स्थिति बुद्ध के समय में भी था। और यही उनके लिए प्रेरणा का कारण भी बना।
युद्ध पर प्रेम की जीत, हिंसा पर ज्ञान का विजय और लोभ पर क्षमा का प्रभाव तथा करुणा और ध्यान की तलवार से क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं पर विजय का सूत्र बुद्ध चरित्र का केंद्र बिंदु रहा है।
वर्तमान समय में मानवता के मूल्य और प्राकृतिक दोहन के कारण उत्पन्न हाहाकार ने मानव जीवन को अभिशप्त कर दिया है। अब चारों ओर सद्भाव और शांति की मांग हो रही है। इस समय लोगों के मन में गौतम बुद्ध के विचारों के संबंध में जानने की उत्कंठा उत्पन्न होना स्वाभाविक है तो वही इस महाकाव्य का लोकार्पण होना समय सापेक्ष है। शुभ संकेत है।

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