नारी स्रष्टा किरण आचार्य की वर्तमान साहित्य गतिविधि तथा उनके द्वारा रचित परसुराम उपन्यास
नेपालगञ्ज/(बाँके) पवन जायसवाल । कृति समालोचक लेक प्रसाद प्याकुरेल द्वारा प्रस्तुत
शिक्षण पेशा में कुशल प्रधानाध्यापक की भूमिका निर्वाह पश्चात सेवा निवृत्त जीवन व्यतित कर रहीं नारी स्रष्टा किरण आचार्य की वर्तमान साहित्य गतिविधि एकदम अच्छी और लोभ दायी रही है । वि. सं २०६० में अनुभूति (कविता संग्रह ), २०६२ में अस्तित्व ( कविता संग्रह ) करके दो साहित्यिक कृति प्रकाशन में आई है उस के पश्चात करीब गुमनाम जैसी रही साहित्यकार किरण आचार्य की वि.सं. २०७७ में सरपजुवा (थारु भाषाको लोक कथा संग्रह ) और क्यान्टोनमेन्ट (कथासंग्रह ) वि.सं.२०७८ में सृष्टिचक्र ( लघुकथा संग्रह ), वि.सं.२०८० में जरत्कारु (उपन्यास), हाम्रा देवदेवी भ्रम र यथार्थ (धर्मदर्शन) जैसी कृतियाँ की प्राप्ति हुई है । पौराणिक आख्यान लेखन में अव्वल मानी गई किरण आचार्य ने अपन्ी आवीं) कृति के रुप में परशुराम पौराणिक उपन्यास सार्वजनिक की है ।
साहित्यकार किरण आचार्य की मौखिक जानकारी अनुसार एक उपन्यास और एक कथा संग्रह प्रकाशन की संघार में रही है किरण आचार्य की वि.सं. २०७७ के इधर की साहित्यिक यात्रा थप फराकिलो बनते गई है प्रस्ट होती है । पूर्वीय दर्शन की अध्ययन में विशेष रुचि रखते आई किरण आचार्य के पास नेपाली , अङ्ग्रेजी , हिन्दी , थारू और अवधी भाषा की अच्छी ज्ञान है । अङ्ग्रेजी साहित्य में स्नातक करने की बाद समाज शास्त्र में स्नातकोत्तर तक की अध्ययन करके अपनी ज्ञान की क्षितिज को थप फराकिलो की किरण आचार्य की आठीं कृति परशुराम पौराणिक उपन्यास रही है । शिखा बुक्स प्रकाशन और ज्ञानज्योति बुक्स पब्लिकेसन प्रालि वितरक रही इस कृति में पुराण, द्वन्द और राजनीति की त्रिवेणी मिल्ती है । पौराणिक कृति होने की बावजूद भी युद्ध की विपक्ष में रहकर गर्विला आवाज उठाई है इस की साथ वर्तमान राजनीति को सुधार करने की अनेक उपाय सुझाव की कारण प्रस्तुत कृति विशेष चर्चानीय बनी है ।
परशुराम पौराणिक उपन्यास की आवरण पृष्ठ में हाथ में परसु लिये क्रोधी स्वभाव दिखती है मुखाकृति रहे परशुराम की तस्बीर रक्खी है । कृति की परिधीय खण्ड अन्तर्गत की सुरु की पृष्ठ में कृतिगत सूचना रक्खा गया है इस की साथ कृतिकार की अपनी विचार रखने की बाद में कृति की मूल कथा वस्तु की प्रारम्भ किया गया है । कृति की कथावस्तु दो खण्ड में विभक्त है । जिस मध्ये में अध्याय १ से छटवीं की सुरुआत अथवा ८० पृष्ठ तक सहस्त्रार्जुन की कथा में केन्द्रित रही उपन्यास उस के बाद परशुराम की कथा में रही है । परशुराम उपन्यास पौराणिक युग और वर्तमान युग तथा धर्म, युद्ध और शिक्षा की फ्युजन है अथवा शिक्षा और युद्ध दो प्रकृति की बबिरुवा को कलमी बनाकर परशुराम नामक औपन्यासिक वृक्ष निर्माण किया गया है । अतिशयोक्ति नही होगी । हत्या हतियार ले होइन व्यक्तिको विचार ने करती है वह सिद्धान्त निर्माण और उस की पुष्टि रही इस उपन्यास में मनुष्य पतन की चरण को तार्किक ढंग से प्रस्तुत कि गई है । उपन्यास की अनुसार शुरु में मनुष्य में अज्ञानता दिखाई पडती है और अज्ञानता ने ज्ञान आर्जन की तीव्र भूख जगाती है । वह चाहना अनुसार मनुष्य ने अथाह ज्ञान प्राप्ति करता है और ज्ञान प्राप्त मनुष्य में अहम की प्रादुर्भाव होन लगती है । अहम की प्रादुर्भाव की साथ साथ इस की विकास और विस्तार होते जाती है मनुष्य में अन्याय और अत्याचार की पराकाष्ठा दिखती है । इसी पराकाष्ठा हमी मानव पतन की मूल आधार रही कहते हुये मनुष्य पतन की चरणों को सान्दर्भिक तवर से पुष्टि किया गया है । परशुराम उपन्यास की नायक परशुराम है इतना होते भी परशुराम कोई व्यक्ति से ज्यदा वीर, विद्वत, अजर अमर, कभी भी जन्मना व मरना नपडने तत्त्व, क्रान्ति, विद्रोह, अन्याय अत्याचार बिनाशक की एक प्रतिनिधि हैं जिस को राज्य की नेतृत्व ने जन्माता है आफन्त की अहंकार ने परिपोषित करती है । इस तरह प्रतिनिधित्व करनेवाले परशुराम को मूलपात्र के रुप में उपस्थित कराकर उस की केन्द्रीयता में एक मात्र उपन्यास को लेकर उपन्यास की शीर्षक परशुराम सार्थक बनी है । कुछ धार्मिक अन्धविश्वास एवं भ्रम को सप्रमाण देने में सफल परशुराम उपन्यास यथार्थ और कल्पना की मिश्रण भी है । इस उपन्यास में सुनते आये, सुनाते आये हुये अथवा अन्य कुछ धार्मिक पुस्तकों में मिलनेवाली मिथ्या जैसै लागने वाली विषयवस्तुओं को वैज्ञानिकीकरण किया गया है । प्रायः जैसी धार्मिक पुस्तक व कथाओं में परशुराम ने अपनी माता रेणुका की हत्या की पश्चात पिता जमदग्नी खुशी होकर वर माँगने से पहले परशुराम ने माता का जीवित करादें और पहले की सभी बातें माता रेणुका ने भूल जायें वर माँगने की बाद में रेणुका ने जीवन पुनः प्राप्त की थी वह प्रसङ्ग मिलती है । इसी तरह मरने के बाद मनुष्य वर की नावँ में पुनः जीवित होना असम्भव और अवैज्ञानिक है । उस तर्फ उपन्यासकार ने कहा रेणुका को जीवित नबनाकर कथावस्तु आगे बढाकर अविश्वसनीयता की भय से सहज तरीके से निकलते खिदाई पडती है । इस कथांश ने एका तर्फ कारुणिकता की माध्यम से पाठक कीे मन तान्ने में सफल हुई है । दूसरी तर्फ कृति कोे विश्वसनीयता की रास्ता तर्फ ले जारही है । कुछ धार्मिक कथाओं में सहश्रार्जुन और परशुराम की युद्ध में परशुराम ने सहश्राजुन की सभी जेस्ी हाथ काटकर दो मात्र बाँकी रखकर केवल मनुष्य के रुप में परिणत करके छोड दिया है जैसी प्रसङ्ग रही है । एक घनघोर शत्रु जो अपना स्वयं मारने के लिये पहाड उठाकर ले जाता है उस को परशुराम जैसे क्रोधी पात्र ने वध नकरके कुछ नरके छोड देना अविश्वसनीय लगता है । इस से बँचने के लिये उपन्यासकार ने सहश्रार्जुन की सीधै बध हुआ है प्रसङ्ग प्रस्तुत करना सकारात्मक है हरेक ने छोटे से ही सुनते आये व सुनाते आई प्रसङ्ग है परशुराम ने क्षेत्रियों की २१ बार वध की प्रसङ्ग । और कुछ ग्रन्थ ने सहस्त्रार्जुन ने कामधेनु गाय ले जाने की बाद परशुराम की माता रेणु ने २१ बार अपने छाती पीट पीट परशुराम के आगे क्रन्दन प्रस्तुत करने की कारण परशुराम ने २१ बार क्षेत्रियों की वध किया था वह विषयवस्तु उल्लेख किया है । एक ही व्यक्ति ने २१ जन्म तक अपना उपस्थित होकर इस तरह वध करना अविश्वसनीय और असम्भव है । कृति में उल्लेख किया गया अनुसार विभिन्न अलग अलग स्थानों में बार बार करके २१ बार तक युद्ध छेडने के बाद मात्र अधिकांश क्षेत्रीयों नाश हुये है प्रसङ्ग आने की कारण की सच ही परशुराम ने २१ बार क्षेत्रियों की वध किया है जिज्ञासा पूर्णतः समन होकर गया है ।
परशुराम उपन्यास ने परशुराम को लेकर अतिमानव बनाने की प्रयास अथवा अनावश्यक रुप में देवत्वकरण करने की प्रयास को परम्परा को चीर की है यह कृति के अन्दर कुछ प्रसङ्गों ने समाज और राजनीति सुधार की अनेकौँ उपाय सुझाये हैं । कृति में पारस राष्ट्र की उदाहरण देृते हुये राज्य की वास्तविक समस्या से नेतृत्व वर्ग को परिचित होने न देना जैसी घेराबन्दी अत्यन्त डर लगने होती है । वह घेराबन्दी ने राष्ट्र प्रमुख और जनताओं के बीच में वैसी दलदल निर्माण करती है । जहाँ से एक मात्र राष्ट्र ने पतन की रास्ता बाहेक और कुछ नही पकडती है निष्कर्ष निकाली गइ है । युद्ध ने मात्र लाती है विनाश को संकेत करते हुये उपन्यास के अन्दर युद्ध जो भी नाम किया जाये उस की परिणाम सधैव नकारात्मक और भयावह होत है सन्देश दिया है । कृतिकार की विचारों में जातीय द्वन्द अत्यन्त भयानक होती है । विद्यार्थी को विद्यालय में सैन्य शिक्षा देना जितना घातक और भयानक कुछ भी नही हो सकती है इतना होते हुये भी जिस ने जातीयता की मुद्दा उठाती है उस की पतन सुनिश्चित है जैसी सन्देशात्मक विचारें कृति की कथावस्तु से प्रस्तुत की है जो इस उपन्यास की प्रमुख प्राप्ति भी है । परशुराम उपन्यास पौराणिक पात्र परशुराम के उपर लीखा गया उपन्यास है । इतना होने की बाद भी इस उपन्यास ने वर्तमान राजनीति और समाज को ऐना जैसी प्रष्ट बनायी है, जहाँ राजनीति की अनेकौं समस्याएँ मात्र न होकर अधिक समाधान की उपायें भी सुझाया है । उपन्यास के अन्दर मिलाया गया राजनैतिक दुरावस्था और उसकी सुधार की रास्ता को देखा जाय तो हरेक राजनीति करनेवाले व्यक्ति व सत्तासीन व्यक्तियों ने यह उपन्यास की मूल मर्म मात्र समझने की खण्ड में देश ने उन्नति और सुशासन की रास्ता लाने की महत्वपूर्ण कडी मिला सकता है । परशुराम उपन्यास पौराणिक समय में अध्ययन अनुसन्धान की प्रमाणिक दस्तावेज भी है उपन्यास के अन्दर गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को चिन्हाने की साथ ऋृचिक की माध्यमद्वारा पौराणिक युग में रही अध्ययन, अनुसन्धान और वैज्ञानिक क्षमता की प्रस्तुतीकरण किया गया है । कृति की पृष्ठ ६९ में अनुसन्धान से ही जमदग्नी और विश्वामित्र जैसी प्रकाण्ड विद्वान जन्माया है प्रसङ्ग प्रस्तुत सन्दर्भ की महत्त्वपूर्ण उदाहरण रही है ।
उपन्यासकार किरण आचार्य की परशुराम उपन्यास कारुणिकता की दृष्टि से समेत सफल उपन्यास है । इस उपन्यास में लडाई झगडा हत्या हिंसा आदि की कारण कई अपनी इहलिला समाप्त किया है । स्वयंं कृतिका नायक परशुराम ने अपनी माता और भडे भाई की हत्या करने से भी कृति की कारुणिक बनाया गया है । इही सन्दर्भ में अरिस्टोटल की दुखान्त नाट्य सिद्धान्त को प्रस्तुत करना सान्दर्भिक होती है । अरिस्टोटल की विचार में कृति सफल होने के लिये दुखान्त से महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है । उन की कृति के अन्दर रहे कोई भी महत्वपूर्ण पात्र ने जानकर व अनजान में कमी कमजोरी करता है जिस के कारण दुखान्त सिर्जना होती है वह मान्यता इस उपन्यास में स्थापित है । खास करके जमदग्नी ने सयन कक्ष में की गल्तियाँ की कारण जमदग्नी लुक छिपकर चलना पडा है । रेणुका ने पानी लेने जाते समय की गल्ती की कारण मरना पडा है । परशुराम ने आफन्त हत्या करने की गल्ती के कारण परशुराम पागल जैसे हुये हैं । ये पात्रों ने जानजान व अनजान में गरेका गल्तियाँ की कारण कृति दुखान्त बनी अरिस्टोटल को दुखान्त सम्बन्धी मान्यता स्थापित हुइृ है ।
दक्ष पाठक और विज्ञ समीक्षक की अपेक्षा करना परशुराम उपन्यास पूर्वीय दर्शन में आधारित उपन्यास है जहाँ गीता की कर्मवादी दर्शन द्वेत और अद्वैतवादी विचार की द्वन्द अहम् ब्रह्मअस्मी, मूल मर्म में आधारित ब्रह्मवादी दर्शन आदि की प्रयोग से कृति को औवल बनाई है । ठोस सूत्रात्मक दर्शनोपयोगी भाषा कृति सापेक्ष तत्सम शब्द की प्रयोग में बाहुल्यता और कुछ शाश्वत बाणियों की प्राप्ति से कृति पठनीय बनी है । इतना होने की बावजूद भी कृति की कुछ पक्षें जैसी ऐसी है जहाँ सुधार की आवश्यकता दिखती है । कृति की सूचना खण्ड में कृति को पौराणिक आख्यान न कहकर पौराणिक उपन्यास कहरक पहिचान कराना जरुरी है । परशुराम उपन्यास में प्रमुख पात्र परशुराम है और उन के ही केन्द्रीयता में कथावस्तु आगे बढने की कारण से परशुराम की मूल कथा से पृष्ठभूमि की रुप में आया है सहस्त्रर्जुन की कथा लम्बी रही है जिस को कुछ सूत्रात्मक तरिका से प्रस्तुत करके परशुराम में ही केन्द्रित होने से कृति थप ओजपूर्ण बनती है । पृष्ठ ८४ में जमदग्नी ने पुत्रराम को कहीँ तुम और कहीँ तो तुम से देखा गया आदरगत विचलन और पहले मृत्यों में रानी भागना चाहती थी तो भी वो लोगों पकड पकडकर जबरजस्ती पठाना लेकि सहश्रार्जुन की मृत्यु में कोई भी रानी सती नही गई इस लिये आया घटनाक्रम की विचलन हुई है । परशुराम सुरुआत की सभी खण्ड में मनुष्य जैसे लागते है लेकिन अन्त्य की ओर कर्ण को श्राप देना व श्राप की आंशिक मुक्ति देने की घटना में परशुराम को देवत्वकरण न करने से उपयुक्त होती लेकिन परशुराम ने अपनी माता और भडे भाई को शिरछेदन करने की क्रम में परशुराम को कम हुई तो भी मानसिक सन्तुलन कमजोर हुई है पात्र के रूप में पृष्ठभूमि निर्माण कर देते तो उपन्यास और अधिक विश्वसनीय बनती दिखाई पडती है । यी और अइसे ही प्रकार की सुधार करने की पक्ष सुरक्षित रहे तो भी नेपाल की सन्दर्भ में ज्यादा कम रही है पौराणिक कथाश्रोत में आधारित उपन्यास लेखन परम्परा को बचाते हुये क्रोधी और रिसाहा की उपमा पाया परशुराम को शिक्षाप्रेमी, क्रान्तिकारी तथा अन्याय और अत्याचार की विनाशक पात्र के रूप में समेत तथ्यपरक ढङ्ग से पहिचान कराना इस कृति की प्रमुख वैशिष्ट्य है । हत्या हतियार से नही व्यक्ति की विचार से करती है उसकी संगत और प्रयोग से होती है वह विचार केन्द्रित इस उपन्यास में जातीयता के नावँ में चलाया गया द्वन्द किमार्थ सफल नही होती है इस ने विकास कम और विनाश ज्यादा लाती है तो भी इस की हिमायती होना स्वयं अपना खतम होना डर लगने रोग की शिकार होना है जैसी प्रेरणादायी विचारों की सम्प्रेषण करने की कारण भी किरण आचार्यद्वारा रचित परशुराम उपन्यास पठनीय कृति बनी है ।


