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काठमांडू, असार १५ –
कंचना झा

नेपाल का इतिहास अगर हम देखते हैं तो यही पाते हैं कि कहने के लिए यह देश शांतिप्रिय देश रहा है । कभी किसी का गुलाम नहीं हुआ है । लेकिन एक बात बिल्कुल सत्य है कि यहाँ के राजनीति की अगर बात करें तो कभी भी शांतिप्रिय नहीं रहा है । साथ ही मधेश को देखने का जो नजरिया है वह भी कभी बहुत अच्छा नहीं रहा है । केन्द्र ने मधेश को हमेशा एक कमजोर उपनिवेश की तरह देखा है । सच तो यह है कि केन्द्र कभी चाहता ही नहीं है कि मधेश को उसका अधिकार दिया जाए । क्योंकि अगर ऐसा हो जाता है तो मधेश के नाम पर जो इतनी राजनीति होती है वह नहीं हो पाएगी । बारम्बार मधेश के नेताओं ने केन्द्र का जो नजरिया है मधेश को देखने का उसपर सवाल किया है । वैसे तो यह नहीं कहा जा सकता कि जिस तरह की समस्याओं का सामना गजेन्द्र नारायण सिंह या उस समय के पुस्ता को देखना पडा कुछ इस तरह के समस्याओं का सामना आज की पीढ़ी को करना पड़ रहा है लेकिन हाँ ये सच है कि आज भी मधेश और मधेशियों को केन्द्र वो दर्जा नहीं दे पाया जिसका हक मधेश रखता है । इसका बहुत बडा उदाहरण सामने है कि यहाँ हर हर पार्टी हिंसा के ही रास्ते से आई है । हर पार्टी ने पहले हथियार उठाया है । गोली चलाई है लोगों का कत्ल किया है । महिलाओं और बच्चों को रुलाया है । घर के मुखिया के जाने के बाद किन–किन समस्याओं का सामना किया है महिलाओं ने ये भी सभी को मालुम है लेकिन केन्द्र ने हमेशा अपने आप को एक अलग ही धार में रखा है । बारम्बार प्रतिनिधि सभा में इस बात को उठाया गया कि मधेश के लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों ? जब सभी राजनीतिक दल ने एक ही रास्ता को अपनाया है तो फिर सजा में यह दो राय क्यों ? लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष माननीय महन्थ  ठाकुर ने कई बार यह चेतावनी भी दी है कि अगर यही नजरिया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अपने अधिकार के लिए एकबार फिर मधेश आंदोलन कर सकता है ।
वो बारम्बार मधेश के जिन नेताओं पर कारवाई की जा रही है या जो जेल की सजा काट रहे हैं उनको छुड़ाने के लिए अपनी बात को सदन में रख रहे हैं । इसी के तहत कुछ दिन पहले जब प्रतिनिधि सभा में उन्हें बोलने का समय दिया गया तो उन्होंने एक बार फिर अपनी बात को सदन के समक्ष रखा है ।
उन्होंने नेपाल के इतिहास को दिखाते हुए अपनी बात की शुरुआत की । प्रतिनिधि सभा में अपनी बात को रखते हुए लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष महंथ ठाकुर ने कहा कि अभी जो कुछ देश में हो रहा है वह कुछ नया नहीं हो रहा है । यह राज्य का चरित्र है और अदालत का भी वही चरित्र होता है जो राज्य का होता है । क्योंकि राज्य का ही एक अंग है अदालत । राज्य के चरित्र से अलग नहीं हो सकता है अदालत का चरित्र । इसलिए अदालत के फैसले में भी वही दिखता है । नेपाल में जो भी पार्टी आई है वह हथियार उठाकर ही आई है ।
माओवादी की बात करें तो जनयुद्ध करके ही आई है । उन्होंने प्रतिनिधिसभा में खुलकर प्रश्न करते हुए कहा कि जनयुद्ध से आए माओवादी पर किसी तरह का कोई मुद्दा नहीं है तो फिर मधेशी नेताओं पर मुद्दा क्यों ?
आज यह बात उठाना जरुरी है वैसे मैंने् बारम्बार इस मुद्दें को उठाया है । उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि जब केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे तब भी उन्होंने इस मुद्दें को उठाया था । कुछ मुद्दों को वापस लिया गया लेकिन दो महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दें थे एक तो महोत्तरी और दूसरी घटना टीकापुर की थी जिसे आज भी वापस नहीं लिया गया है । और यह अभी भी कारवाई की ही अवस्था में है । दोनों जगहों के मुद्दों को लेकर लोगों को सजा हो चुकी है । उन्होंने लाल आयोग की बात का भी उठान किया जिसमें उस समय में जो कुछ घटनाएं घटी थी उसमें इसे दिखाया गया था । उस समय जो अत्याचार हुआ था ।बच्चों की हत्या कर दी गई थी । घर में घुसकर महिलाओं का अपमान किया गया था । खाना बना रही महिला को गोली मार दिया गया था । इस बात को हमने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया लेकिन दुखद बात यह है कि जितने भी अन्तर्राष्ट्रीय लोगों से मिले उनका कहना था कि राज्य तो कह रही है कि आपके आन्दोलन ने तो अपराधिकरण को बढावा दिया है । मैंने भी कहा ये तो आप राज्य से कहें मुझे क्यों कह रहे हैं ? इन बातों को तो राज्य को ध्यान में रखना है । उस समय मुझे पता चला कि वास्तव में मधेश तो अभी भी नेपाल के राज्य का एक उपनिवेश है । आन्तरिक उपनिवेश है । और उपनिवेश की न तो अपनी बोली होती है न ही अपनी कोई भाषा । उसका अपना कोई व्यक्तित्व भी नहीं होता है । उन्होंने कहा कि उसकी न तो अपनी बोली होती है न ही अपनी भाषा । केन्द्र अर्थात् मालिक । मालिक की ही बोली को मानने के लिए उपनिवेश बाध्य है । उसकी ही बोली जनता की भी बोली होती है । मालिक की ही बोली को सभी सुनते हैं । उपनिवेश की बोली नहीं सुनी जाती है । हमारी हालत यही है । चाहे हम कहीं भी जाएं कुछ भी कहें हमारी बोली का कोई महत्व नहीं है । कर्तव्यवश हम अदालत गए, कानून का सहारा भी लिया लेकिन वहाँ भी कुछ खास बात नहीं बनी है । हमारे नेता लोग है जिनपर कुछ मुद्दों को लगाकर जेल में बंद कर दिया गया है । जिन व्यक्तियों को सजा दी गई हैं वो हमारी पार्टी के ही लोग हैं । अभिराम शर्मा को लेकर उन्होंने कहा कि वो पहले भी सांसद थे और अभी भी वो प्रदेश सांसद हैं और दल के नेता भी हैं । इसी तरह राम शंकर मिश्र, सरेश पाण्डे , धमेंन्द्र राय नेता हैं तो क्या इस तरह के लोग किसी की हत्या कर सकते हैं जहाँ हजारों लोगों की भीड थी । एक जुनियर पुलिस ऑफिसर घायल हुआ और गाँव के लोगों ने उसके साथ क्या किया ? यहाँ तक की उसकी मृत्यु जलेश्वर में भी नहीं हुई है । जलेश्वर में वह घायल हुआ और उसे जनकपुर अस्पताल लाया गया । लोग सड़क पर आंदोलन कर रहे थे , गाँव गाँव में लोग आंदोलन में थे । उन्हें मेन सड़क से नहीं, कच्ची सड़क से ही ले जाने का प्रयास किया गया । माननीय ठाकुर अपनी बात को पूरी नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने जो बात कही उससे यह साफ जाहिर होता है कि पुलिस की मृत्यु किसी व्यक्ति के कारण से नहीं हुई है तो इस तरह का अन्याय क्यों ?
अगर यह मधेश के लोगों के लिए है तो फिर जनयुद्ध करके आए हजारों हजार लोगों की हत्या कर आए प्रचंड को हम छोड रहे हैं । वो सत्ता में हैं तो मधेश के व्यक्तियों के ही साथ यह अन्याय क्यों ? यह तो साफ दर्शाता है कि केन्द्र की नियत ठीक नहीं है मधेश के प्रति ।
उन्होंने जिस लाल आयोग की चर्चा की है उसके बारे में जानना बहुत आवश्यक है । यह लाल आयोग क्या है ? तराई मधेश में सरकार के बिरुद्ध विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा, हत्या,तोड़फोड़ और अन्य घटनाओं की सच्चाई और तथ्यों की जांच के लिए असोज ६, २०७३ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश गिरीशचंद्र लाल के समन्वय में एक उच्च स्तरीय जांच आयोग का गठन किया । और १ गते कार्तिक २०७३ में आयोग ने अपना काम करना शुरु किया । आयोग ने १४ महीना के बाद प्रतिवेदन तैयार कर तत्कालीन प्रधानमन्त्री शेर बहादुर देउवा को सौ.प दिया । लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी आयोग का प्रतिवेदन अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है । मधेश केन्द्रीत दलोंं द्वारा प्रतिनिधि सभा में बार–बार आवाज उठाने के बाद सभामुख ने प्रतिवेदन सार्वजनिक करने का ‘रुलिङ’ किया था लेकिन प्रतिवेदन अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है ।
अब इस ओर चलते हैं कि उन्होंने जो कहा है कि इतिहास साक्षी रहा है कि नेपाल के इतिहास में बिना हथियार के प्रयोग से कोई राजनीति में नहीं आएं हैं । चाहे पृथ्वी नारायण शाह , जंगबहादुर राणा की बात करें या फिर आज के कांग्रेस , एमाले और माओवादी की बात करें । सभी हत्या हिंसा कहें या अति कु्ररता का नरसंहार मचा कर ही सत्ता में आएं हैं । ये अलग बात है उस हत्या हिंसा कू्ररता को इन लोगों ने राजनीति का नाम दे दिया ।
इसी तरह अगर आप गिरिजा प्रसाद कोईराला की बात करें , ओली प्रचंड की बात करें या बात करें उपेन्द्र यादव की तो सभी पर एक तलवार लटकती नजर आ रही है । माओवादी का समय तो सभी को याद ही होगा । कैसे घर से ही लोगों को लेकर चले जाते थे । कई बार घर के सदस्य रोते, चिल्लाते बिलखते रह जाते थे और माओवादी उन्हें अपने साथ लेकर चले जाते थे । कभी उस माँ से पूछे, कभी उस पत्नी से पूछे कभी बच्चें से पूछे ,कभी किसी भाई बहन से पूछे , इसकी सजा क्या मिलनी चाहिए ? क्या इसके लिए कोई अदालत नहीं है लोग खुलेआम घुम रहे हैं । सारी सजा क्या मधेशियों के लिए है । हाँ कोई ये नहीं कह सकता कि हत्या करना अच्छी बात है लेकिन आंदोलन का समय था । कोई सोची समझी नीति नहीं थी । या फिर कोई षडयंत्र नहीं रचा गया था किसी के खिलाफ । यह बात बहुत अच्छे तरीके से केन्द्र भी जानती है । प्रधानमंत्री भी जानते हैं लेकिन तु भी चुप मैं भी चुप सब चुप । क्योंकि कहीं न कहीं ये सभी लोग किसी खास वर्ग या कहे जात या कहे भाषा भाषी से संबंध रखते हैं जो हमेशा मधेश के के साथ हमेशा विभेद करते आ रहे हैं ।



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