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पाकिस्तान का गहराता आंतरिक संकट : सैन्य वर्चस्व और दक्षिण एशियाई सुरक्षा के सामने नई चुनौती

 

अनिल तिवारी । दक्षिण एशिया के सामरिक और भू-राजनीतिक संतुलन में पाकिस्तान का स्थान अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होने, चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी, अफ़ग़ानिस्तान के साथ खुली सीमा, भारत के साथ दशकों पुरानी प्रतिद्वंद्विता तथा इस्लामी दुनिया से उसके घनिष्ठ संबंधों के कारण पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति केवल उसका घरेलू राजनीतिक विषय नहीं रह जाती, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा प्रश्न बन जाती है।

हालाँकि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। सात दशकों से अधिक के राजनीतिक इतिहास में लोकतंत्र, सैन्य शासन, न्यायपालिका, सुरक्षा संस्थानों और राजनीतिक दलों के बीच लगातार चले शक्ति संघर्ष ने राज्य की संस्थाओं को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान एक मजबूत, स्थिर और संस्थागत लोकतंत्र विकसित करने का अवसर बार-बार खोता रहा है।

आज पाकिस्तान एक साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक संकट, सुरक्षा चुनौतियों, जातीय असंतोष और संस्थागत अविश्वास का सामना कर रहा है। इन समस्याओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक संकट के विभिन्न आयामों के रूप में समझने की आवश्यकता है।
1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से ही पाकिस्तान कमजोर राजनीतिक संस्थाओं से जूझता रहा। कश्मीर विवाद, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अस्थिरता के कारण सेना धीरे-धीरे देश की सबसे प्रभावशाली संस्था बनती गई।

1958 में पहले सैन्य तख्तापलट के बाद सेना केवल सुरक्षा संस्था नहीं रही, बल्कि नीति-निर्माण, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था की निर्णायक शक्ति बन गई। इसके परिणामस्वरूप अयूब खान, याह्या खान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे सैन्य शासकों ने प्रत्यक्ष शासन किया।

यद्यपि 2008 के बाद प्रत्यक्ष सैन्य शासन समाप्त हो गया, लेकिन सेना का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। उसके बाद पाकिस्तान में नियमित चुनाव तो हुए, परंतु देश में तथाकथित “हाइब्रिड लोकतंत्र” विकसित हुआ, जिसमें निर्वाचित सरकारों के साथ-साथ गैर-निर्वाचित शक्ति केंद्र भी समान रूप से प्रभावशाली बने रहे।संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री और संसद सर्वोच्च हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत नीति, अफ़ग़ानिस्तान नीति, परमाणु कार्यक्रम तथा अन्य रणनीतिक मामलों में सेना का प्रभाव आज भी स्पष्ट दिखाई देता है।
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जैसे प्रमुख राजनीतिक दल लंबे समय से परिवार-केंद्रित नेतृत्व पर आधारित रहे हैं। इन दलों में वैचारिक राजनीति और आंतरिक लोकतंत्र की अपेक्षा व्यक्तिपूजा तथा गुटबाज़ी को अधिक महत्व मिलने के आरोप लगते रहे हैं।

सरकार बदलते ही प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक फेरबदल, राजनीतिक प्रतिशोध तथा दीर्घकालिक सुधारों की बजाय अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ने राज्य की संस्थाओं को और कमजोर किया है।

ऐसी परिस्थितियों में सेना स्वयं को “राष्ट्रीय स्थिरता की गारंटी” के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही है। अनेक सर्वेक्षणों से यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान के नागरिकों का एक वर्ग राजनीतिक दलों की तुलना में सेना पर अधिक विश्वास करता है। हालांकि यह स्थिति लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए गंभीर चुनौती भी है।
पंजाब प्रांत की 20 प्रांतीय विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव से पहले अधिकांश विश्लेषकों का अनुमान था कि सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) अपनी गठबंधन सरकार के साथ अगस्त 2023 तक सत्ता में बनी रहेगी।लेकिन 17 जुलाई 2022 को हुए उपचुनावों ने पाकिस्तान की राजनीति की दिशा बदल दी। इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (PTI) ने PML-N को अप्रत्याशित और करारी शिकस्त दी। इसके बाद राजनीतिक माहौल तेजी से इमरान खान के पक्ष में झुकता दिखाई दिया।बारह दलों की गठबंधन सरकार का भविष्य अनिश्चित लगने लगा और अनेक राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले आम चुनाव की संभावना व्यक्त करनी शुरू कर दी।लेकिन यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही।
उपचुनाव के लगभग दो सप्ताह बाद, 2 अगस्त 2022 को पाकिस्तान के चुनाव आयोग (ECP) ने PTI की बहुचर्चित “विदेशी फंडिंग” मामले में अपना निर्णय सुनाया।इस फैसले ने केवल पार्टी को ही नहीं, बल्कि इमरान खान को भी कानूनी विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया। भ्रष्टाचार-विरोधी और ईमानदार नेता के रूप में उनकी जो सार्वजनिक छवि बनी थी, उसे इस फैसले से गहरा आघात पहुँचा।

इसी के साथ उनके राजनीतिक विरोधियों ने कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर उन्हें घेरना शुरू कर दिया। समय से पहले चुनाव कराने का उनका अभियान भी कमजोर पड़ गया और सत्ता गठबंधन ने PTI के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की रणनीति तेज़ कर दी।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यदि समय से पहले चुनाव भी हुए, तो वे इमरान खान के दबाव के कारण नहीं, बल्कि सत्ता गठबंधन की राजनीतिक सुविधा के अनुसार होंगे।

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इमरान खान बनाम पाकिस्तानी सेना

सत्ता से हटने के बाद इमरान खान ने अपनी हार को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि उनके विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं था, बल्कि विदेशी शक्तियों और उनके स्थानीय सहयोगियों द्वारा रची गई साज़िश का परिणाम था।

उनके आरोपों का निशाना केवल अमेरिका नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सेना भी बनी। उन्होंने सेना पर उनका साथ न देने का आरोप लगाया और सेना की घोषित “तटस्थता” पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “तटस्थ तो केवल जानवर होते हैं।”

इसके बाद उन्होंने सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की तुलना इतिहास के विवादास्पद पात्र मीर जाफ़र और मीर सादिक़ से की, जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में विश्वासघात का प्रतीक माना जाता है।इसी दौरान सोशल मीडिया पर सेना और नई सरकार के विरुद्ध व्यापक अभियान भी चलाया गया। इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना ने लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से संयम बनाए रखा और कोई प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं दी।

आईएसआई प्रमुख विवाद और संबंधों में दरार

2021 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के महानिदेशक की नियुक्ति को लेकर सरकार और सेना के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए। सामान्यतः इस प्रकार के विषय सार्वजनिक विवाद का कारण नहीं बनते, लेकिन इस घटना ने यह प्रश्न फिर सामने ला दिया कि पाकिस्तान में वास्तविक शक्ति किसके हाथ में है।

इस विवाद के बाद इमरान खान और सेना के बीच विश्वास तेजी से कमज़ोर होता गया। अंततः अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और इमरान खान को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा।यद्यपि सरकार परिवर्तन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ, लेकिन इमरान खान ने इसे विदेशी हस्तक्षेप और घरेलू शक्ति केंद्रों द्वारा रचा गया राजनीतिक षड्यंत्र बताया। दूसरी ओर विपक्षी दलों ने इसे संसदीय लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया करार दिया।

इमरान खान के सत्ता से हटने के बाद शहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। उम्मीद थी कि नई सरकार राजनीतिक तनाव कम करेगी और आर्थिक सुधारों पर ध्यान देगी।लेकिन परिस्थितियाँ इसके विपरीत विकसित हुईं।

एक ओर इमरान खान ने देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया, वहीं दूसरी ओर गठबंधन सरकार आंतरिक मतभेदों, आर्थिक संकट और जन असंतोष से घिर गई। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता गया, महँगाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची, ऊर्जा संकट गहराया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ कठोर आर्थिक समझौते करने पड़े।

राजनीतिक अस्थिरता ने दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों को और कठिन बना दिया।

पाकिस्तान का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि केवल चुनाव कराना लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण नहीं है। जब राजनीतिक दल आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक न हों, न्यायपालिका राजनीतिक विवादों में उलझ जाए, सुरक्षा संस्थाएँ राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करें, मीडिया स्वतंत्र रूप से काम न कर सके और नागरिक संस्थाएँ कमजोर हों, तब लोकतंत्र का संस्थागत विकास अवरुद्ध हो जाता है।

आज पाकिस्तान इसी जटिल चक्र में फँसा हुआ दिखाई देता है, जिसका प्रभाव केवल इस्लामाबाद की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक विश्वास और पूरे दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिरता पर भी पड़ रहा है।दक्षिण एशिया के सामरिक तथा भू-राजनीतिक संतुलन में पाकिस्तान की भूमिका अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होने, चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी, अफगानिस्तान से लगी खुली सीमा, भारत के साथ दशकों पुराने प्रतिद्वंद्विता संबंध तथा इस्लामी दुनिया में उसकी राजनीतिक उपस्थिति के कारण पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति केवल उसका घरेलू राजनीतिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा प्रश्न बन चुकी है।

विडंबना यह है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। सात दशक से अधिक के राजनीतिक इतिहास में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सेना, न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और सुरक्षा प्रतिष्ठान के बीच निरंतर शक्ति संघर्ष ने राज्य की संस्थागत क्षमता को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान बार-बार स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने का अवसर खोता रहा है।

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आज पाकिस्तान एक साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक संकट, सुरक्षा चुनौतियों, जातीय विद्रोह और संस्थागत अविश्वास का सामना कर रहा है। इन सभी संकटों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक ही संरचनात्मक समस्या के विभिन्न आयामों के रूप में समझने की आवश्यकता है।

लोकतंत्र और सैन्य वर्चस्व का द्वंद्व

1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद पाकिस्तान को कमजोर राजनीतिक संस्थाओं, प्रशासनिक अस्थिरता, कश्मीर विवाद तथा राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं का सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे सेना देश की सबसे प्रभावशाली संस्था बन गई।

1958 में पहले सैन्य तख्तापलट के बाद सेना केवल सुरक्षा संस्था नहीं रही, बल्कि विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक रणनीति तथा राजनीतिक निर्णयों की केंद्रीय शक्ति बन गई। इसके बाद अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ जैसे सैन्य शासकों ने प्रत्यक्ष रूप से देश का शासन संभाला।

यद्यपि 2008 के बाद प्रत्यक्ष सैन्य शासन समाप्त हो गया, किंतु सेना का प्रभाव कभी समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद पाकिस्तान में नियमित चुनाव अवश्य हुए, लेकिन देश में तथाकथित “हाइब्रिड लोकतंत्र” विकसित हुआ, जिसमें निर्वाचित सरकारें मौजूद रहीं, जबकि वास्तविक शक्ति का एक बड़ा हिस्सा गैर-निर्वाचित संस्थाओं, विशेषकर सेना, के हाथों में केंद्रित रहा।

संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री और संसद सर्वोच्च हैं, किंतु भारत नीति, अफगानिस्तान नीति, परमाणु कार्यक्रम, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सेना की निर्णायक भूमिका आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

राजनीतिक दलों की संस्थागत कमजोरी

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जैसे प्रमुख दल लंबे समय से परिवार-आधारित नेतृत्व पर निर्भर रहे हैं। इन दलों पर आंतरिक लोकतंत्र की कमी, व्यक्तिवादी राजनीति और गुटबाजी को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं।

सरकार बदलते ही प्रशासनिक ढांचे में व्यापक फेरबदल, राजनीतिक प्रतिशोध और अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ने संस्थागत विकास को कमजोर किया है।

ऐसी परिस्थितियों में सेना स्वयं को “स्थिरता की गारंटी” के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही है। विभिन्न सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि पाकिस्तान के अनेक नागरिक राजनीतिक दलों की तुलना में सेना पर अधिक भरोसा करते हैं। किंतु यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करने का भी जोखिम पैदा करती है।

इमरान खान और बदलती राजनीतिक परिस्थिति

पंजाब विधानसभा की 20 सीटों पर जुलाई 2022 में हुए उपचुनाव ने पाकिस्तान की राजनीति की दिशा बदल दी। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) को अप्रत्याशित पराजय दी और ऐसा प्रतीत होने लगा कि इमरान खान शीघ्र ही सत्ता में वापसी कर सकते हैं।

लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद पाकिस्तान के निर्वाचन आयोग ने पीटीआई के कथित “विदेशी फंडिंग” मामले में अपना बहुप्रतीक्षित निर्णय सुनाया। इस निर्णय ने इमरान खान की “ईमानदार और भ्रष्टाचार विरोधी” नेता की सार्वजनिक छवि को गंभीर झटका पहुँचाया।

इसके बाद इमरान खान के विरुद्ध कानूनी और राजनीतिक दबाव बढ़ता गया, जबकि सत्ता गठबंधन ने अपना कार्यकाल पूरा करने की दिशा में बढ़त बना ली।

इमरान खान बनाम सेना

प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद इमरान खान ने अपनी पराजय को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसे विदेशी शक्तियों और देश के भीतर मौजूद शक्ति केंद्रों की साजिश बताया।

धीरे-धीरे उनका निशाना पाकिस्तान की सेना भी बन गई। सेना द्वारा स्वयं को “तटस्थ” घोषित किए जाने पर इमरान खान ने कहा था—

“तटस्थ तो केवल जानवर होते हैं।”

उन्होंने सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की तुलना इतिहास के विवादास्पद पात्र मीर जाफर और मीर सादिक से की, जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में विश्वासघात का प्रतीक माना जाता है।

सोशल मीडिया पर भी सेना और नई सरकार के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया गया। प्रारंभ में सेना ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया, किंतु बाद की घटनाओं ने दोनों पक्षों के बीच तनाव को और गहरा कर दिया।

2021 में आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सरकार और सेना के बीच खुला मतभेद सामने आया। पाकिस्तान जैसे देश में इस प्रकार का सार्वजनिक विवाद असाधारण माना जाता है। अंततः अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और इमरान खान सत्ता से बाहर हो गए।

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आर्थिक संकट और शासन व्यवस्था

शहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि राजनीतिक तनाव कम होगा और आर्थिक सुधारों पर ध्यान दिया जाएगा। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत रही।

देश विदेशी मुद्रा संकट, ऊँची महँगाई, ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की कठोर शर्तों के दबाव में आ गया। राजनीतिक अस्थिरता के कारण आवश्यक आर्थिक सुधार लगातार टलते रहे।

पाकिस्तान का अनुभव यह दर्शाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। जब राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र कमजोर हो, न्यायपालिका राजनीतिक विवादों में उलझ जाए, सुरक्षा संस्थाएँ राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करें, मीडिया स्वतंत्र न रहे और नागरिक संस्थाएँ कमजोर हों, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था का संस्थागत विकास अवरुद्ध हो जाता है।

बलूचिस्तान : पाकिस्तान की सबसे जटिल चुनौती

भौगोलिक दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध है। इसके बावजूद यह पाकिस्तान के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है।

स्थानीय समुदाय लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उन्हें नहीं मिलता तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी सीमित है। इसी असंतोष ने समय-समय पर सशस्त्र विद्रोह का रूप लिया है।

हाल के वर्षों में बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों, संचार अवसंरचना और परिवहन नेटवर्क पर हमलों में वृद्धि हुई है। पाकिस्तान सरकार इन्हें आतंकवाद की समस्या बताती है, जबकि अनेक स्थानीय समूह इन्हें लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असंतोष का परिणाम मानते हैं।

 

पाकिस्तान एक अन्य गंभीर चुनौती तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से भी जूझ रहा है। 2014 में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए भीषण हमले के बाद पाकिस्तान ने व्यापक सैन्य अभियान चलाया था, किंतु अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद टीटीपी की गतिविधियों में पुनः वृद्धि देखी गई।

पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी के कई लड़ाके अफगानिस्तान की सीमा से गतिविधियाँ संचालित करते हैं, जबकि अफगान तालिबान इस आरोप को अस्वीकार करता है। इस विवाद ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बना दिया है।

बलूचिस्तान सहित कई क्षेत्रों में जबरन गुमशुदगी, गैर-न्यायिक हत्याओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चिंता व्यक्त की है।

पाकिस्तान सरकार का कहना है कि आतंकवाद विरोधी अभियान संविधान और कानून के दायरे में संचालित किए जाते हैं। इस प्रकार सुरक्षा का प्रश्न केवल सैन्य विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह मानवाधिकार, विकास, संघीय व्यवस्था और राजनीतिक समावेशन से भी जुड़ चुका है।
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद और नियंत्रण रेखा पर तनाव दशकों से बना हुआ है। अनेक रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का आंतरिक संकट कभी-कभी बाहरी तनावों को भी प्रभावित कर सकता है।

दोनों देशों के परमाणु शक्ति संपन्न होने के कारण किसी भी सीमित सैन्य घटना के बड़े संघर्ष में बदलने की आशंका बनी रहती है। इसलिए राजनीतिक स्थिरता केवल पाकिस्तान की आंतरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सामरिक अनिवार्यता है।
पाकिस्तान आज अपने इतिहास के सबसे जटिल दौरों में से एक से गुजर रहा है। राजनीतिक ध्रुवीकरण, कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएँ, आर्थिक संकट, जातीय असंतोष, सुरक्षा चुनौतियाँ और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने उसे बहुआयामी संकट में डाल दिया है।

फिर भी किसी भी राष्ट्र का भविष्य पूर्वनिर्धारित नहीं होता। इतिहास बताता है कि गंभीर संकटों से भी संस्थागत सुधार, राजनीतिक सहमति, आर्थिक पुनर्निर्माण और संवैधानिक शासन के माध्यम से बाहर निकला जा सकता है।

पाकिस्तान के लिए भी दीर्घकालिक समाधान सैन्य वर्चस्व या अल्पकालिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण, विधि के शासन, समावेशी आर्थिक विकास, प्रांतीय सहभागिता और राष्ट्रीय सहमति में निहित है।

दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता के लिए एक उत्तरदायी, संस्थागत रूप से सुदृढ़ और लोकतांत्रिक पाकिस्तान सभी देशों के साझा हित में है। आने वाले वर्षों में पाकिस्तान द्वारा लिए जाने वाले राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी निर्णय न केवल उसके अपने भविष्य को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के रणनीतिक संतुलन को भी गहराई से प्रभावित करेंगे।

अनिल तिवारी

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