मानसून आ गया… प्रशासन कहाँ ? : अंशुकुमारी झा
अंशु कुमारी झा, हिमालिनी अंक जुलाई, 024। नेपाल की भू–बनावट कुछ अलग है । हिमाल, पहाड़ और तराई का सम्मिश्रण है नेपाल जहाँ आए दिन आगलगी, भूकम्प, भूस्खलन और बाढ से जनजीवन अस्त–व्यस्त होता रहता है । अब तक हम गर्मी से झुलसे हैं । इसबार तराई–मधेश का तापक्रम ४५ डिग्री सेन्टीग्रेट पहुँचा है । लोग गर्मी से बहुत परेशान हुए हैं । यहाँ तक की काठमांडू में भी इसबार गर्मी की अनुभूति हुई है । सबके मुँह से यही सुनते हैं कि बाप रे, इसबार की गर्मी तो हद कर दी है पर ऐसा क्यों हुआ है, इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है । उसी तरह मौसम विद् के अनुसार बारिस भी इसबार हद करने वाली है परन्तु सरकार चैन से सो रही है । हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आकर कितने घरबार नाश हो जाते हैं । कितने लोग अल्पायु में ही मौत को गले लगाते हैं, होता क्या है ? जो गया सो गया । जो बेघर हुआ वो हुआ । आँसू पोछने के लिए कुछ पैसे दे आते हैं और अपना पल्लु झाड़ लेते हैं । यही परम्परा तो चलती आ रही है । इसबार भी वही होगा ।
मानसून आ गया है । देश में जो किसान बचे हैं, वे धान की खेती के लिए आकाश की तरफ देख रहे हैं । सही भी है, किसान, खेती और बारिश का अपना अलग ही सम्बन्ध है जिसे कोई अलग नहीं कर सकता है । नेपाल का मुख्य खाद्यबाली धान ही है तो स्वाभाविक है मानसून का स्वागत करना । मानसून सिर्फ खुशियाँ लेकर नहीं आता, विपत्ति भी लेकर आता है । हरेक वर्ष मानसून के समय जनजीवन कष्टकर हो जाता है । सबकुछ जानते हुए भी हमलोग होशियार नहीं हो पाते हैं । हम जानते हैं कि बाढ़, भूस्खलन इत्यादि प्राकृतिक आपदा है पर अगर हम पहले से सतर्क रहें तो उक्त आपदा से होने वाली क्षति को न्यूनीकरण हो सकता है ।
राष्ट्रीय विपद् जोखिम न्यूनीकरण तथा व्यवस्थापन प्राधिकरण के तथ्यांक अनुसार पिछले साल जेष्ठ ३२ गते मानसून नेपाल आया था जो १२४ दिनों तक यहाँ रुका था । उन १२४ दिनों में मानसून के कारण ९२ लोगों की मौत हुई थी । गत वर्ष मानसून पूर्वी भाग से नेपाल में प्रवेश किया था । पूरब के जिले को बहुत प्रभावित किया था । ताप्लेजुङ, पाँचथर और संखुवासभा में बाढ़ और भूस्खलन से बहुत धनजन की क्षति हुई थी । इसी प्रकार २०७८ साल में मानसून के शुरुआती दौर में ही सिन्धुपाल्चोक के हेलम्बु और मेलम्ची में बाढ़ और भूस्खलन से बहुत लोगों की जान गई थी और बहुत लोग बेघर हुए थे । इसलिए हमें मानसून से उत्पन्न विपत्ति से बचने के लिए पूर्व तैयार रहना चाहिये ।
जल तथा मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इसबार देश के अधिकांश भाग में ३५ से ५५ प्रतिशत तक अधिक वर्षा होने की सम्भावना है । राष्ट्रीय विपद् जोखिम न्यूनीकरण तथा व्यवस्थापन प्राधिकरण के अनुमान अनुसार इसबार के मानसून से ४ लाख १२ हजार घर परिवार प्रभावित होंगे । जिसमें ८३ हजार घरपरिवार प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे और उसमें से १८ हजार परिवार को उद्धार तथा राहत देने की आवश्यकता होगी । अनुमानतः इस वर्ष मानसून से उत्पन्न आपदा से सबसे अधिक कोशी प्रदेश प्रभावित होगा । आकलन किया गया है कि कोशी प्रदेश में १ लाख १३ हजार ३ सौ ५३ घर परिवार प्रत्यक्ष प्रभावित होंगे । यह तो निश्चित ही है मानसून का आना, बारिस होना, पर उससे जो घटना होती है उसके लिए कहीं न कहीं मानव स्वयं जिम्मेदार है । पहाड़ी क्षेत्र में अगर तेज बारिस होती है तो भूक्षय होना शुरु हो जाता है । जिसका मुख्य कारण है, वन का विनाश करना, डोजर से पहाड़ को खोदना । मानव को बहुत सुख सुविधा की जरुरत होती है । सड़क भी चाहिए, बिजली भी चाहिए जिसके लिए पहाड़ को तोड़ना पड़ता है । पहाड़ तोड़ते वक्त डोजर का प्रयोग होता है जिससे मिट्टी कमजोर हो जाती है और जोरदार पानी पड़ने के बाद पहाड़ ही गिरने लगता है । वो गिरता हुआ पहाड़ कई बस्तियों को लेकर नदी में समा जाता है । भूकम्प आने से भी पहाड़ की मिट्टी कमजोर हो जाती है और बरसात के समय गिरने लगती है । यह समस्या सच में पहाड़ी जनमानस के लिए बहुत ही दर्दनाक होता है ।
निःसन्देह जीवन में रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत होती है तो हम सोच सकते हैं कि वह त्रास कैसा होता होगा । उसी तरह तराई क्षेत्र में भी बाढ़ आने से गाँव शहर डूब जाता है । लोग त्राहिमाम् करने लगते हैं । जब तराई क्षेत्र में बाढ़ आती है तो वह बहाव भारत की ओर जाता है । भारत ने अपने देश की जनता को बाढ़ से सुरक्षित करने के लिए नदी किनारे बड़े बड़े बाँध की व्यवस्था की है तो वह पानी तराई बासियों को ही सताता है । कई बस्तियाँ डूब जाती है । कई लोग बह जाते हैं । न रहने के लिए घर रहता न खाने के लिए अन्न और न ही पहनने के लिए कपड़े । बहुत ही पीड़ादायी अवस्था उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार की क्षति ज्ञात होते हुए भी पूर्व तैयार नहीं होना निष्कृय प्रशासन का परिचय है ।
सरकार प्रत्येक वर्ष मानसून से उत्पन्न विपत्ति के तुरन्त बाद राहत, उद्धार जैसे बहुत सारे प्रतिकार्य का योजना बनाती है पर वह योजना प्रभावकारी नहीं हो पाती है । इसके लिए हमेशा सवाल ही उत्पन्न हुआ है । उदाहरणस्वरूप अगर किसी स्थान पर बाढ़ आ गयी तो सबसे पहले वहाँ के स्थानीय निकाय को पहल करनी चाहिए जो नहीं कर पाता । अगर ऊपर से राहत के नाम पर कुछ आता भी है तो पीडि़त तक पहुँचते पहुँचते समाप्त ही हो जाता है । जो उस राहत का सही हकदार है उस तक नहीं पहुँच पाता । यही यथार्थ है । इसके लिए सरकार को स्थानीय निकाय को स्रोत साधन से परिपूर्ण बनाना होगा ताकि वह सही समय पर पीडि़त को सहयोग कर सके । उक्त आपदा से मानवीय क्षति कम करने के लिए प्रभावकारी पूर्वसूचना प्रणाली पर ध्यान देना होगा । जल तथा मौसम विज्ञान विभाग को मानसून के समय बाढ़ का अनुमान कर जनता को हमेशा सचेत करना होगा । सरकार को अधिक प्रभावित क्षेत्रों में साइरन प्रणाली की भी व्यवस्था करनी चाहिए ताकि लोग समय रहते सावधान हो जाय । जो बस्ती अधिक जोखिम में है उसे स्थानान्तरण करने की भी जरुरत हो सकती है इसलिए प्रशासन को सदैव तत्पर रहना होगा । मानसून से जो समस्या उत्पन्न होती है उसे रोकने का दायित्व राज्य का ही है । नदियों का अतिक्रमण, पेड़ पौधों के साथ अत्याचार, बेवजह पहाड़ को तोड़ना, नदियों का उत्खनन करना इत्यादि कारणों से बाढ़ का विकराल रूप सामने आ जाता है इसके लिए जनता को भी जागरुक बनाने की जिम्मेदारी राज्य की ही होती है ।
प्रकृति का असन्तुलन होने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन भी है । आज नेपाल के साथ–साथ सम्पूर्ण विश्व ही जलवायु परिवर्तन के चपेट में है । इसके लिए मानव को ही जिम्मेदार माना जाता है फिर भी मानव में चेतना नहीं है । आणविक होडबाजी, युद्ध और युद्ध में प्रयोग होने वाला बम, बारुद तथा क्षेप्यास्त्र से प्रकृति और भी दुषित होती जा रही है । विज्ञान और विकास के नाम पर मानव मस्तिष्क में जो असन्तोष है उसे तृप्त करने के लिए हमेशा प्रकृति के साथ ही छेड़छाड़ की जाती है । दूसरे तरफ मैं सबसे शक्तिशाली हूँ, मैं सबसे बड़ा हूँ, के अहंकार में भी मानव स्वयं के साथ गलत कर रहा है । बडेÞ–बड़े उद्योगपतियों के कलकारखाना तथा उद्योगों से जो अत्यधिक कार्बनडाइअक्साइड और हरितगृह गैस उत्सर्जन होता है उससे ज्यादातर निम्न वर्ग के लोग पीडित होते हैं । विकसित तथा औद्योगिक राष्ट्र के कारण जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नेपाल और नेपाल जैसा ही अन्य गरीब देश भुगतता है । समग्र में प्रशासन के साथ–साथ हम जनता को भी अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध रखने के लिए हमेशा तत्पर्य रहना चाहिए तभी हम सुरक्षित रह सकते हैं । हम प्रकृति को सुरक्षित करेंगे तो वो भी हमें सुरक्षित रखेगी ।

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