मधेश, मानव अधिकार और मानसिकता
रणधीर चौधरी:मानव अधिकार हनन के लिए सिर्फमधेश की मिट्टी उर्वर है ऐसा कहना शायद उतना जायज नहीं होगा । समग्र नेपाल मंे मानव अधिकार हनन की घटना होती आ रही है । परंतु र्,कई मानव अधिकार संस्थाओ के अनुसार पिछले कई सालांे से मधेश की मिट्टी मानव अधिकार हनन के लिए कुछ ज्यादा ही उर्वर होती जा रही है । मधेश में भूमिगत राजनीति के दौरान २८१ युवाओं की गैरन्यायिक हत्या हो या, फिर गैरकानूनी रूप में दी जानेवाली यातना हो । मधेश में बढÞते गैरन्यायिक गिरफ्तारी को हम अलग नहीं रख सकते हैं । समग्र में कहा जाए तो, सिर्फसंख्यात्मक हिसाब से ही नहीं बल्कि फैलावट के हिसाब से भी इस में बढÞोत्तरी हर्ुइ है । तभी तो, मधेश मंे मानव अधिकार संस्थाओ की संख्या में वृद्धि हर्ुइ है । एक ऐसी ही मानव अधिकार संस्था तर्राई मानव अधिकार रक्षक सञ्जाल र्-थर्ड एलायन्स) द्वारा हरेक तीन महीने में प्रतिवेदन तैयार कर राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उर्ठाई जाती है । कोशिश होती है, मानव अधिकार हनन में कमी लाने की ।
बात हम करते हैं २०१४ की, पिछले दस महीनांे की, अगर हम कहें कि इन महीनांे में मानव अधिकार हनन में कमी आइ है तो शायद अपने आपको झूठा साबित करना होगा । यातना, गैरन्यायिक गिरफ्तारी, महिलाहिंसा या तो फिर अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता की हो, इन सभी का ग्राफ नीचे नहीं आ पाया है । न चाहते हुए भी मुझे इस लेख का शर्ीष्ाक मानव अधिकार और मानसिकता रखना पडÞा है, कुछ ऐसी घटना जिनमें मानव अधिकार की घटना मंे स्टेट की मानसिकता पर अधिकतम व्यक्तियों द्वारा सवाल खडÞा किया गया है । घटना है ३१ मई २०१४ की, सप्तरी के अब्दुल रहमान की मोटर साइकल चोरी और उस घटना को ले कर फेसबुक पर अब्दुल की प्रतिक्रिया, ‘क्या सुधरेगी पुलिस, चोरी की गई खुद की मोटर साइकल पता लगाने के लिए पुलिस को ५०,००० नगद देना पडÞा । बस इसी अभिव्यक्ति के कारण अब्दुल को साइबर क्राइम के तहत गैरन्यायिक तरिके से गिरफ्तार किया गया । इस घटना के ठीक दो दिन बाद ही राजू साह को गिरफ्तार कर लिया जाता है । राजु साह, जो कि प्रसासन आफिस में आफिसर की नौकरी करता था । मामला था- सामाजिक संजाल फेसबुक और ट्वीटर पर गृहमन्त्री बामदेब गौतम की एक तस्वीर, जिसमंे गौतम ट्राफिक नियमों का उल्लंघन कर सडÞक पर लगाए गए डिभाइडर की रस्सी को उठा कर सडÞक पार कर रहे थे । सामाजिक संजाल में उस तस्वीर के ऊपर बहुत सारे कमेन्ट किये गये थे । कुछ ऐसी प्रतिक्रिया भी आई थी जिसको अभी यहाँ पर रखना उचित नहीं होगा । उसी तस्वीर पर राजू साह की भी प्रतिक्रिया थी, ऐसे को तो पिछवाडÞे में गोली ठोकना चाहिए । बस, उसके बाद वही हुआ जो दो दिन पहले अब्दुल के साथ हुआ था, राजु को भी गिरफ्तार कर लिया गया । राजु को तीन दिन तक केन्द्रीय अनुसन्धान ब्यूरो में अनुसन्धान के लिए रखा गया । मानो ऐसा लगा कि, गृह मन्त्रालय द्वारा सामाजिक संजाल पर विशेष निगरानी रखा जा रहा था । अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता हनन की बेजोडÞ कडÞी थी अब्दुल और राजु की गिरफ्तारी । लोगों का मानना है कि, स्टेट ने यह क्यों नहीं सोचा कि, फेसबुक पर वैसी प्रतिक्रिया आना एक युवा की प्रतिक्रिया है, उच्च ओहदे पर आसीन व्यक्तित्व के गैरजिम्मेदाराना हरकत के लिए ।
इन दोनों घटना के बाद सामाजिक संजाल में मधेसी जनता ने अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरु की, जिस को अगर ध्यान से देखा जाय तो, सभी के लेख व प्रतिक्रिया मंे मधेसी के साथ भेदभाव किए जाने की ही बात थी । लोगों का यह भी मानना है कि, एक लोकतान्त्रिक देश में वास्तविक प्रतिक्रिया देने के कारण फेसबुक जेनरेसन की गिरफ्तारी स्टेट की पत्र सं १९४८ ने किया है । नेपाल के सर्न्दर्भ में मानव अधिकार आन्दोलन वि.सं २०४६ के बाद ही परिष्कृत हुआ है । संयुक्त राष्ट्र संघ के एक जिम्मेदार सदस्य की हैसियत से मानव अधिकार के कई महत्वपर्ूण्ा महासंधियो का पक्षधर राष्ट्र भी नेपाल बन चुका है । फिर भी, इस देश में मानव अधिकार की अवस्था अगर नाजुक दिखाई दे तो इस बात को स्वीकारने में हमें जरा भी संकोच नही मानना चाहिए ।
फिर हम बात करंे उस घटना की, जिसने पिछले महीने से मधेस और नेपाली राजनीति के गलियारांे में सनसनी मचाई हर्ुइ है, यानी डा.सी.के राउत की गिरफ्तारी । घटना सेप्टेम्बर १३ की है । डा. राउत सन्थाल जाति के द्वारा मनाने वाली छाता मेला से लौट रहे थे । उसी वक्त उनको गिरफ्तार कर लिया गया । लगभग २ दर्जन पुलिस उनकी भाडेÞ की गाडÞी को रोक कर बिना नोटिस के पकडÞ लेती है । पुलिस को अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि, नेपाल के अन्तरिम संबिधान २०६३ के धारा २४ के उपधारा -१) मंे, कारण सहित की सूचना के बाद ही किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है । डा. राउत की गिरफ्तारी प्रकरण नेे तो मानव अधिकार हनन की सीमा ही पार कर ली । गिरफ्तारी के २ घन्टे बाद डा. राउत को नोटिस दिया जाता है, और गिरफ्तारी का कारण बताया जाता है, भडÞकाउ भाषण । नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ की धारा १३ -३) जिसमें स्पष्ट कहा गया है, हरेक व्यक्ति को अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता है । कोई भी व्यक्ति अपना विचार शान्तिपर्ूण्ा तरीके से रख सकता है । र्सवाेच्च न्यायालय मंे बन्दी प्रत्यक्षीकरण मुद्दा पडÞने के बाद उनको काठमांडू लाया गया, हनुमान ढोका थाना में रखा गया । डा. राउत के अनुसार उनको वहाँ पर मानसिक यातना दी गई । हमें पता होना चाहिए, नेपाल के अ.सं. के धारा २६ की उपधारा -१) बमोजिम किसी भी कैदी को यातना देना मानव अधिकार का घोर उल्लंघन होता है । डा. सी.के राउत पर राज्य विप्लब, र्सार्वजनिक अपराध और साइबर क्राइम के तहत मुकदमा चलाया गया है । राष्ट्र विभाजन वाली भावनाआंे को सम्मिलित कर किताब लिखने का आरोप भी लगाया गया है । नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ से पता चलता है कि, संविधान की धारा -१) मे स्पष्ट अक्षरांे में लिखा गया है कि, किसी भी व्यक्ति को कुछ प्रकाशन करने पर रोक नही लगाया जायगा । और उप-धारा २, ३ में छप जाने के बाद उसको जफ्त भी नहीं किया जा सकता । नेपाल मंे मानव अधिकार उल्लंघन एक आम बात हो चुकी है । नेपाल एक गरीब और अविकसित राष्ट्र है । विकास के लिए जनता बेचैन है । हरेक साल बजट भाषण होता ही है । देश विकास के लिए बजट मिलाया जाता है । इस बार भी विकास के लिए अच्छी रकम दी गई है । बात करें सडÞक विकास की, सडÞक विकास के लिए जम्मा ३७ अरब बजट अलग किया गया, जिसमें ४ अरब तर्राई की सडÞकों के लिए है । मैं नहीं भूल पाया हूँ, जब कभी भी मैं तर्राई में विकास क्यों नहीं – यह सवाल काठमांडू के मित्रों से करता था तो वे मुझे बहुत ही अच्छी तरह से समझाते थे- तर्राई के लोग जागरूक नहीं हैं और विकसित होना नहीं चाहते हैं । मै चकित रह जाता था । बात इसी ११ अक्टुबर २०१४ की है, बारा के स्रि्रौनगढÞ, जहाँ पर स्थानीय द्वारा सडÞक निर्माण के लिए आवाज उर्ठाई गई और जय नारायण पटेल को राज्य द्वारा चलाइ गई गोली का शिकार होना पडÞा । राज्य की तरफ से जवाब आया स्थिति नियन्त्रण से बाहर हो चुकी थी । इसलिए गोली चलानी पडÞी । गोली चलाने के भी कुछ नियम-कानून होते हैं । नेपाल के स्थानीय प्रशासन ऐन २०२८ के अनुसार अगर गोली चलाने की परिस्थिति आ ही गई तो उसके भी चरण होते हैं जिसके तहत, राज्य द्वारा भीडÞ को पहले समझाना चाहिए, अश्रु गैस छोडÞना चाहिए, पानी का फव्वारा प्रयोग करना चाहिए, हवा में गोली चलाना चाहिए, रबर की गोली चलानी चाहिए । गोली चलाते हैं तो इस तरीके से चलाएँ जिससे इन्सान की मौत न हो । लेकिन स्रि्रौनगढÞ घटना में इन नियमों का शानदार उल्लंघन किया गया है ।
विकास के लिए आवाज उठाना इन्सान का मौलिक अधिकार है, जिस अधिकार को यहाँ एस.एल.आर के द्वारा दबा दिया जाता है । यह आम मधेसी जनता का कहना है । उनका यह भी कहना है कि, गणतान्त्रिक नेपाल के इतिहास मंे सम्भवतः यह पहली घटना है ।
हाँ, जरूरी है मानसिकता में परिवर्तन लाना । गणतान्त्रिक देश में अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता कायम रहनी चाहिए । विकास के लिए उठी आवाज को अधिक से अधिक सुनना और समझना चाहिए । नेपाल के तथाकथित मानव अधिकारकर्मियांे की चुप्पी से जाहिर होता है कि मानसिकता में परिवर्तन कि बहुत आवश्यकता है । दवाब पडÞने के बाद सी.के राउत प्रकरण में बोलना और स्रि्रौनगढÞ गोलीकाण्ड में बडÞी चुप्पी साधना, इससे पता चलता है कि मानसिकता मे परिवर्तन लाना चाहिए और देश की जनता को उनके मानव अधिकार का उपयोग करने का अवसर मिलना चाहिए । नवगठित राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से हमें आस लगाना ही होगा, हाल ही में गठित आयोग के अध्यक्ष अनुपराज शर्मा का कहना है कि आयोग द्वारा किए गए सिफारिस को लागु नही किया गया तो आँधी तुफान ला देंगे । आम लोगों का मानना है कि, मधेस में मानव अधिकार का हनन न होने देने के लिए पहले सभी मानव अधिकार रक्षकों की मानसिकता में परिवर्तन आना अति आवश्यक है ।

