श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाशपर्व – एक संदेशपर्व : प्रवीण गुगनानी
प्रवीण गुगनानी, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार ।
कितना सुंदर, पुनीत व अद्भुत लगता है जब सिक्ख गुरु श्री अर्जुनदेव जी लिखते हैं – ‘जित्थे जाए बहै मेरा सतिगुरु सो थानु सुहावा राम राजे’ अर्थात् जहां पर मेरे परमात्मा ‘श्रीराम’ बैठते हैं, वह स्थान स्वमेव पवित्र हो जाता है। वे यह भी लिखते हैं – ‘राम गोविंद जपेंदेयां होवा मुख पवित्तर’।
आज गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाशपर्व पर हमसे आत्मचिंतन की मांग करता है। ऐसी पवित्र व समृद्ध वाणी के संवाहक हमारे सिक्ख समाज को सनातन से विभाजित करने के बहुतेरे षड्यंत्र हो रहे हैं आज। यह एक अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र है। सिक्ख, जैन, बौद्ध न केवल सनातन से उपजे बल्कि इनकी समूची ग्रंथावली, आख्यानों, व्याखानाओं, कथा-कहानियों, भजन, शबद, भाषा, बोली, मुहावरों, रीति-रिवाज, परंपराओं, पर्व-त्योहारों में सनातनी देव परंपरा, ऋषि परंपरा, वैदिक तत्त्व आदि आदि का प्रभाव ही नहीं अपितु प्रभुत्व है। आज आवश्यकता है कि कोई भी हिंदू व्यक्ति सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि को अपने से अलग-विलग न समझें और इन समुदायों के बंधु भी हिंदुत्व से निकली हुई अपनी जड़ों व मूल तत्त्व की साज-सम्भाल करते रहें। आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम सभी हिंदू, सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि समुदाय अपने मूल एकात्म स्वरूप अर्थात् श्रीराम या सनातन से जुड़े रहें व परस्पर एक दूसरे का सम्मान करें व विधर्मियों के सामने एक दूजे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने का अभ्यास करें। खालसा पंथ की स्थापना के लक्ष्य का स्मरण ही श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धा है। कुनबा बड़ा होने पर अलग अलग रहने की व्यवस्थाएं प्रकृति का नियम है किंतु शत्रुओं के सामने तो हमें ‘वयम् पंचाधिकम् शतम्’ अर्थात, हम पांच नहीं, एक सौ पांच हैं; का आचरण प्रस्तुत करना होगा, यही समय की सबसे बड़ी मांग है।
पूज्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब में परमात्मा की स्तुति करने के लिए “राम”, “रामा” और “राम राजे” का उल्लेख 2533 बार हुआ है, “हरि” शब्द 8344 बार, “गोबिंद”
शब्द 475 बार और “मुरारी”
शब्द 97 बार उपयोग किया गया है।
श्री गुरु नानक देव जी, गुरु अर्जुन देव जी और “हिंद की चादर” गुरु तेग बहादुर जी ने इसका उपयाेग किया है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में लिखा है – ‘हरि अमृत भिन्ने लाेइिणां मनु प्रेम रतन्ना राम राजे।। मन रामि कसवटी लाएआ कंचनु सोविंना’ अर्थात मेरी आंखें अमृत से भरी हुई हैं और मन राम नाम यानि परमात्मा के प्रेम से भरा है। मैंने अपने नाम को राम यानि प्रभु की कसौटी पर परख लिया है और मेरा मन कंचन भाव सोने का हो गया है। गुरु श्री तेग बहादुर जी ‘राम गियो, रावण गियो, जाको बोह परिवार’ जैसी अद्भुत पंक्तियों के माध्यम से रामजस गाते हुए थकते ही नहीं हैं।
ऐसे हमारें श्री गुरु ग्रंथ साहिब को केवल सिक्ख समाज का ग्रंथ मान लिया जाना निश्चित ही एक बड़ी भूल सिद्ध होगी। श्री गुरु ग्रंथ साहिब केवल सिक्खों का ही नहीं बल्कि समूचे सनातनियों का पूज्य ग्रंथ है। हम सभी हिंदू, बौद्ध, जैन, सिक्ख को मिलकर इस महान ग्रंथ के भाव व संदेश को आगे बढ़ाना चाहिये।
गुरु ग्रंथ साहिब को सिक्ख समुदाय का अंतिम और जीवित गुरु की मान्यता से पूजा जाता है। दसवें गुरु, गोविंद सिंह जी ने वर्ष 1708 में मृत्युपूर्व कह दिया था कि उनके बाद कोई व्यक्ति गुरु नहीं होगा और गुरु ग्रंथ साहिब ही अंतिम गुरु होंगे।
गुरुग्रन्थ साहिब जी में मात्र सिक्ख गुरुओं के ही उपदेश नहीं है, इसमें तीस सन्तो की वाणी को भी सादर सम्मिलित किया गया है। इसमें संत जयदेवजी, संत परमानंदजी, संत कबीर, संत नामदेव, संत रविदास, संत सैण जी, संत सघना जी, संत छीवाजी, संत धन्ना आदि की वाणी व संदेश भी सम्मिलित है।
यह एक धार्मिक संदेशवाहक किंतु बड़ा ही सरस, मधुर, गेय, दार्शनिकता व कलात्मकता से सराबोर ग्रंथ हैं। इसकी भाषायी अभिव्यक्ति, शब्दों का अद्भुत प्रयोग, सरल-सहज-सुबोध भाषा हमें बड़ी शीघ्रता से ईश्वर के समीप ले जाती है। यह एक रागात्मक ग्रंथ है जिसमें संगीत के सुरों को बड़े ही श्रमपूर्वक साधा गया है। इस ग्रंथ को गाने-पढ़ने में इकत्तीस रागों का प्रयोग इस ग्रंथ की शास्त्रीय उच्चता का परिचायक है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में केवल धर्म, ईश्वर के नाम जपने व संन्यासी हो जाने को धर्म नहीं माना गया है। श्रीमदभग्वद्गीता से सीख लेते हुए यह ग्रंथ धर्म के माध्यम से कर्म प्रधान हो जाने जैसे अद्भुत दर्शन को यह हमारे सामने रखता है। ग़ुरबानी के अनुसार प्रभु को पाने हेतु अपने पारिवारिक, व सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर वनों में चले जाने की आवश्यकता सभी को नहीं होती है। एक गृहस्थ व्यक्ति को यही मानना चाहिये कि ईश्वर हमारे हृदय में ही है। प्रभु को अपने अंतरतम में ही खोजा जा सकता है। उसे अपने अंतर्मन में ही सिद्ध करना होता है। परमात्मा की आराधना से उपजी हुई हमारी आत्मिक आभा, शक्ति ही हमें अपने परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्वकल्याण के मार्ग की ओर ले जाती है। इसमें बड़ी ही सहजता से हमें धर्म सिखाते हुए लिखा गया है कि मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग से ही हृदय को व हृदय के माध्यम से विश्व को जीत सकते हैं।
गुरमुखी में लिखे गये इस ग्रंथ का पंजाब की भूमि से बड़ा ही प्रगाढ़ संबंध रहा है इसलिए इसकी गेयता में पंजाबीपन का आभास होता है किंतु यह ग्रंथ अधिकांशतः हिन्दी के प्रयोग से ही गढ़ा गया है। इसे हिन्दी के स्थान पर ‘लोक हिन्दी’ कहा जा सकता है। संतों ने इसमें हिन्दी, पंजाबी, ब्रज, खड़ी बोली, बिहारी, संस्कृत आदि कई बोलियों का उपयोग बड़े ही बोधगम्य रीति से किया है। इतनी विस्तृत बोलियों का उपयोग करने के बाद भी इसे सरल-सहज-सुगम बनाये रखना इसके रचयिताओं के श्रम को दर्शाता है। इसमें सिक्ख समुदाय के प्रवर्तक श्री गुरुनानक देव की सूक्तियाँ और प्रार्थनाएँ हैं। इस ग़ुरबानी को इनको गुरु अंगद देव, गुरु अर्जुनदेव व गुरु तेगबहादुर ने सहेजा और संकलित किया है। चौदह सौ तीस पन्नों के इस ग्रंथ में 5,894 शबद हैं, इनमें से 974 शबद गुरुनानक देव जी के हैं, 62 शबद दूसरे गुरु के, 907 शबद तीसरे गुरु के, 679 चौथे गुरु के व 115 शबद नवें गुरु के हैं। इस ग्रंथ में शेष लगभग पचास प्रतिशत शबद विभिन्न संतों की वाणी के हैं। इससे सिद्ध होता है कि सिक्ख समुदाय के प्रणेता सनातन के सामाजिक समरसता के तत्त्व को श्री गुरु ग्रंथ साहिब का मूलतत्व मानते थे। सामाजिक समरसता ही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और इस बात को दूरदर्शी सिक्ख गुरुओं ने आज से लगभग पांच सौ वर्षों पूर्व ही आभास कर लिया था। वर्ष 1604 में प्रकाशित यह ग्रंथ सिक्ख गुरुओं की दूरदर्शिता को दर्शाता है। किंतु, यह दुर्भाग्य है कि हम इसके समरसता के तत्वों को समझने के स्थान पर व्यर्थ के वितंडों में इसकी वाणी का उपयोग करते हैं।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम श्री गुरु ग्रंथ साहिब को धार्मिक दृष्टि के साथ सामाजिक समरसता के सिद्ध मार्ग की तरह देखें। हमें देखना होगा कि सिक्ख समुदाय का विकास और गठन किन परिस्थितियों में और क्यों किया गया था? गुरु गोबिंद सिंग जी के पुत्रों का जघन्य व नृशंस हत्याकांड किसने और क्यों किया? गुरु तेगबहादुर क्यों बलिदान हुए? सिक्ख गुरुओं ने अपना समूचा सैन्य संघर्ष किनके विरुद्ध व क्यों किया? बंदा बहादुर का बलिदान क्यों हुआ? खालसा पंथ की स्थापना क्यों की गई? खालसा पंथ व विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के मध्य हुए एक सौ दस युद्धों का रक्तरंजित, ज्ञात इतिहास लिखित में है हमारे पास। इस इतिहास को स्मरण में रखने और अपने धर्म की रक्षा करने का संदेश हमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब से मिलता है।


