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नेपाली दंग हैं नमो और नवाज के हाथ मिलाने से, क्या दिल भी मिले हैं ?

 

navaj & modiश्वेता दीप्ति, काठमाण्डू ,२७ नवम्बर २०१४ । पिछले कई दिनों से चर्चा परिचर्चा में घिरा सार्क सम्मेलन आज समाप्त हो गया । नेपाल अपनी मेजवानी में सफल रहा और मेहमान देशों ने नेपाल की मेहमानवाजी और नेपाल की जम कर तारीफ की । कमियों की तरफ अगर किसी ने ध्यानाकर्षण कराया तो वह थे भारतीय प्रधानमंत्री मोदी । उनकी दिलचस्पी नेपाल के संविधान प्रक्रिया में थी । पिछली बार जिस ऋषिमन की बात उन्होंने की थी, सम्भवतः वो इस बार उसे तलाश कर रहे थे और शायद उन्हें आभास भी था कि वो ऋषिमन कहीं नहीं है । इसलिए इसबार स्पष्ट शब्दों में उन्होंने आगाह कर दिया कि, सहमति की आवश्यकता है सबलता की नहीं । जिसकी वजह से कई मन आहत भी हुए हैं । कुछ ने अपनी चिढ़ व्यक्त कर दी और कुछ शायद सम्मेलन खत्म का इंतजार कर रहे होंगे । वैसे प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से कह दिया है कि मोदी जी ने आंतरिक मसलों में कोई घुसपैठ नहीं की है । किन्तु उनके इस विचार से कितने सहमत होंगे यह जल्द ही पता चल जाएगा ।

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उर्जा समझौता ने सम्भावनाओं के द्वार खोले हैं । रेल विस्तार, बैंकिग सुविधा, पर्यटकीय विस्तार, भारत और नेपाल के बीच फोन कॉल के सस्ते होने की बात और आतंकवाद से जुड़े सवाल, इस सम्मेलन की खासियत रही । यह सब व्यवहारिक रूप में जब दिखेगा तब दिखेगा, फिलहाल तो नेपाल की जनता सार्क के नाम पर सजी सँवरी काठमान्डू नगरी देख रही है, पिछले तीन दिनों से अपनी जीवनशैली की अस्तव्यस्तता देख रही है और बिन माँगे मोती मिले की तरह मिली छुट्टी का मजा ले रही है ।

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जाते–जाते सार्क सम्मेलन के समापन समारोह ने मीडिया को एक ब्रेकिंग न्यूज भी दे दिया और मेजवान देश को एक तसल्ली भी कि उनकी सक्रियता और सहभागिता में नमो और नवाज ने हाथ मिला लिए । किन्तु ये हाथ जब–जब मिले हैं तो एक पक्ष की ओर से घात ही मिले हैं । भारत के घाव इतने गहरे हैं कि ये हाथ मलहम लगाने का काम नहीं कर सकते । यह महज एक औपचारिकता थी या फिर १९वें सार्क सम्मेलन में जाने के लिए राह यह तो वक्त बताएगा । पर एक क्षण में दुनिया बदलती है और नवाज की दुनिया तो पल पल अपना रंग दिखाती है इसलिए २०१६ तक क्या होगा यह कहा नहीं जा सकता । किन्तु एक अच्छे पड़ोसी के नाते हम चाहेंगे कि जिस मजबूती और गर्मजोशी से मोदी और नवाज के हाथ मिले हैं उसकी गरमी और नरमी बनी रहे ।

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