विवाद के शिकंजे में दिल्ली एम्स के पीआरओ की नियुक्ति
दिल्ली, (प्रमोद कुमार मिश्र)।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के 2014 में आने के बाद देश में कई अखिल भारतीय आरोग्य संस्थान (एम्स) स्थापित किए गए लेकिन समय के साथ सबसे पुराने संस्थान दिल्ली स्थित एम्स की विश्वसनीयता दिन ब दिन विवाद में फंसती जा रही है।
अब यहां नया विवाद एम्स में जन संपर्क अधिकारी (पीआरओ) की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न हो गया है।
संस्थान के विश्वसनीय सूत्र के मुताबिक इसके मौजूदा निदेशक डा. एम. श्रीनिवास के कुर्सी पर बैठते ही विवाद उत्पन्न हो गया था। इससे पहले यह बात सामने आ चुकी है कि निदेशक की शह पर एक विवादित डॉक्टर जिस पर संस्थान से फरार रहने के आरोप लगे थे निर्बाध रूप कार्य कर रहा है जबकि इससे पूर्व के निदेशक के कार्यकाल के दौरान यह चिकित्सक संस्थान में फटकता भी नहीं था ।
कहना गैरजरूरी है कि एम्स में विगत 17 वर्षों से पीआरओ का पद खाली है। संस्थान के अंतिम पीआरओ बीके दास थे और 2007 में उनके जाने के बाद यह पद लगातार खाली रहा है। हालांकि संस्थान के सूत्र के मुताबिक इस बीच कई बार पीआरओ की नियुक्ति को लेकर पहल तो किए गए लेकिन संस्थान में चल रही अंदरूनी खींचातान के चलते नियुक्ति कभी भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाया।
गौरतलब है कि पीआरओ की नियुक्ति को लेकर अंतिम प्रयास की शुरुआत 2023 के दौरान हुई। इस दौरान अखबार में नियुक्ति को लेकर विज्ञापन प्रकाशित किए गए। यहां यह जानना जरूरी है कि दिल्ली स्थित एम्स में पीआरओ का पद पूरी तरह से प्रतिनियुक्ति पर आधारित है। यानि केंद्र सरकार के अन्य संस्थानों में कार्यरत कर्मी जिन्हें जन संपर्क कार्य का अनुभव है, उन्हें ही उनकी योग्यता व अनुभव के आधार पर संस्थान में प्रतिनियुक्त किया जाता है। हालांकि इसके लिए रिक्तियां निकाली जाती है और साक्षात्कार भी आयोजित किए जाते हैं।
मौजूदा पहल की शुरुआत 2023 के दौरान हुई और पीआरओ की नियुक्ति की वह प्रक्रिया आज तक जारी है। संस्थान के कार्यालय में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार इस प्रक्रिया के तहत संस्थान में एक स्क्रिनिंग कमिटी का गठन किया गया है जिसमें डा. प्रवीन वशिष्ट, प्रभारी नियुक्ति कोषांग को चेयरमेन, डा. नन्द कुमार, प्रभारी प्रोटोकॉल डिविजन को सदस्य व विश्वेस चतुर्वेदी, प्रशासनिक अधिकारी, नियुक्ति कोषांग को सदस्य-सचिव बनाया गया है। पिछले 30 जुलाई को उम्मीदवारों के आवेदनों की छटनी इस कमिटी की ओर से की गई और इस दौरान दो उम्मीदवारों जया जागृति व बिष्णु चरण पात्रो का चयन किया गया लेकिन कमिटी के द्वारा सिर्फ जया जागृति की उम्मीदवारी को साक्षात्कार के लिए अग्रसारित किया गया। इस दौरान सबसे बड़ी घटना ये घटी कि कमिटी के एक सदस्य डा. नन्द कुमार ने इस सिफारिशी पत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं किया। यानि कमिटी में किसी बात को लेकर कहीं न कहीं मतभेद है। अब सवाल है कि क्या साक्षात्कार के लिए एक ही उम्मीदवार का चयन सही है।
दूसरी तरफ, दूसरे उम्मीदवार बिष्षु चरण पात्रो के पास मास कम्यूनिकेशन में स्नाकोत्तर की डिग्री है जिसमें पब्लिक रिलेशन व एडवरटाईजिंग में उनकी दक्षता है। इतना ही नहीं, उन्होंने हेल्थ कम्यूनिकेशन में डाक्टर की उपाधि भी हासिल की है। अगर उनके अनुभव की बात की जाए तो उन्होंने 2012 के दौरान एक अंतराष्ट्रीय संस्थान की ओर से पोषित हेल्थ प्रोजेक्ट के कम्यूनिकेशन आफिसर के रूप में भी काम किया है। मौजूदा समय में वह केंद्र सरकार की एक संस्था राष्ट्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण संस्थान में उप-संपादक (अंग्रेजी) के पद पर कार्यरत हैं।
उधर, जब इस मामले में डा. नन्द कुमार, प्रभारी प्रोटोकॉल डिविजन व स्क्रीनिंग कमिटी के सदस्य से बात की गई तो उन्होंने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया।
कहना गैरजरूरी है कि एक बार फिर से पीआरओ की नियुक्ति को लेकर विवाद है और नियुक्ति फिर से खटाई में पड़ने वाली है। 


