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चमत्कारी आस्था का प्रतीक गढीमाई

gadhi mai
 

भउचप्रसाद यादव:लाखों देवी देवताओं में एक देवी हैं गढीमाई, जहाँ हर पाँच वर्षमें मेला लगा करता है । यह मेला विश्व का ही सबसे बडÞा मेला है । यह मेला बलि प्रथा के लिए अधिक प्रसिद्ध है । इस मेला में कितनी संख्या में बलि दी जाती है इसका कोई प्रमाणिक लेखा-जोखा नहीं है । हँस, मर्ुगा, कबूतर, खस्सी, भैसा आदि का कोई सही तथ्यांक मिलना मुश्किल है ।
मेला के समय में गढीमाई भगवती के स्थान को केन्द्र में रखकर उसके चारों ओर नौ किलोमीटर तक सीमा निर्धारित की जाती है । इस निर्धारित सीमा के भीतर कहीं भी बलि दी जा सकती है । इसलिए सही संख्या और तथ्य संकलन करना मुश्किल होता है । विश्व में सम्भवतः यही मेला है जहाँ सबसे अधिक बलि दी जाती है ।
गढीमाई मंदिर बारा जिले के बरियारपुर में अवस्थित है और यह नेपाल के ऐतिहासिक, साँस्कृ

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चमत्कारी आस्था का प्रतीक गढीमाई

तिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपर्ूण्ा है । कलैया से आठ किलोमीटर की दूरी में यह मंदिर अवस्थित है । गढीमाई भगवती की स्थापना के विषय में कई किवंदतियाँ मिलती हैं । माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना करीब आठ सौ वर्षपहले बरियारपुर के भगवान चौधरी ने किया था । एक कथा के अनुसार एक रात भगवान चौधरी के घर में चोरी हर्ुइ । चोर को गाँव वाले ने पकडÞा और उसे पीट पीटकर मार डÞाला जिसका आरोप भगवान चौधरी पर लगाया गया । जिसके कारण उसे काठमांडूके जेल में डÞाल दिया गया । भगवान चौधरी एक आस्तिक व्यक्ति था । जेल में होने के बाद भी उसकर्ीर् इश्वर में आस्था कम नहीं हर्ुइ । जेल में ही उसे एक सपना आया । जिसमें देवी ने उससे कहा कि, ‘किस पापी ने तुम्हें जेल में भेजा है -‘ भगवान चौधरी ने देवी से सवाल किया कि, ‘आप कौन हैं – आप जो भी हैं मेरे आगे आकर मुझे दर्शन दीजिए ।’ तब देवी ने उसे साक्षात् दर्शन दिए और कहा, ‘तुम मुझे अपने गाँव ले जा सकते हो -‘ इस पर भगवान चौधरी ने कहा कि, ‘मैं तो कैद में हूँ भला आपको गाँव कैसे ले जा सकता हूँ -‘ देवी ने कहा कि, ‘तुम प्रतिज्ञा करो कि मुझे अपने गाँव ले जाओगे तो मैं तुम्हें कैद से मुक्त कराऊँगी ।’ भगवती की शर्त चौधरी ने मान ली । तत्पश्चात् सभी सिपाही न्रि्रामग्न हो गए, जेल का दरवाजा अपने आप खुल गया और चौधरी जेल से मुक्त हो गया ।
उसके बाद चौधरी ने पूछा कि ‘आपको मैं कैसे ले जाऊँ -‘ तब भगवती ने कहा कि, ‘तुम मेरे पैर की धूल को अपनी पगडÞी में बाँध कर अपने सर पर रखो और मन्दिर का त्रिशूल हाथ में लेकर चलो । तुम्हें खुद रास्ता मिल जाएगा ।’ भगवान चौधरी ने माता के आज्ञानुसार ही किया । रास्ते में बातचीत के दौरान माता ने चौधरी को अपनी इच्छा बताई और हर वर्षमेला लगाने तथा बलि प्रदान की बात की । किन्तु चौधरी ने हर पाँच वर्षपर मेला लगाने की बात कही और विभिन्न पशु-पंक्षी के बलि देने की बात तथा दैनिक पूजा अर्चना करने की बात भी मानी । इसी बातचीत के क्रम में वे दोनों पासाहा नदी के किनारे होते हुए बरियारपुर गाँव के बरगद के पेडÞ के नीचे पहुँचे । जहाँ मंदिर की स्थापना हर्ुइ, जो आज भी उसी जगह अवस्थित है । उसके बाद से वहाँ पूजा और हर पाँच वर्षपर मेला लगने लगा । लेकिन वहाँ बिना कारण अकाल मौत से लोग मरने लगे । तब भगवान चौधरी ने भगवती की आराधना की और उन्हें सारी बातें सुनाई । तब देवी ने कहा कि पंचवलि के साथ नरवलि की व्यवस्था करो सब ठीक हो जाएगा । इसके बाद चौधरी गाँव गाँव घूमकर नरवलि के लिए आदमी तलाशने लगा लेकिन उसे कोई नहीं मिला । तब वह पुनः देवी के पास पहुँचा और समस्या सुनाई । तब देवी ने कहा कि सेमरी गाँव जाओ तुम्हें वहाँ आदमी मिलेगा । यह सेमरी गाँव अभी रौतहट जिला में पडÞता है । भगवती के आदेश से चौधरी उस गाँव में पहुँचा, वहाँ उसे एक व्यक्ति मिला । लेकिन उसने शर्त रखी कि भगवती की सवारी उसके घर पर होगी तो मैं पाँच बूंद खून दूँगा और तभी से यह प्रथा चलती आ रही है । पंचबलि के अर्न्तर्गत खस्सी, राँगा, जंगली चुहा, सूअर, मर्ुर्गी आदि की बलि दी जाती है । पहली बार जिसने पाँच बंूद खून दिया था, आज भी उसी परिवार के लोग यह प्रथा पूरी करते हैं । जिसे झाँक्री कहा जाता है । आज भी वो अपना पाँच बूंद रक्त देकर ही मंदिर में प्रवेश करते हैं ।
गढी माई मेला पाँच-पाँच वर्षमें अगहन शुक्लपक्ष में लगा करता है । मेला लगने वाले साल में आसाढÞ महीना के उसी तिथि में झाँक्री लक्ष्मण रेखा बनाकर सीमा निर्धारण करता है । सीमा निर्धारण के बाद उस सीमा में रहने वाली बहू-बेटी बाहर नहीं जा सकती और ना ही कोई और उसमें प्रवेश कर सकता है । मेला के बाद पूणिर्मा के दिन गढÞी स्थान के पास ही संसारी माई के मंदिर में खस्सी की बलि देकर झाँक्री सीमा खत्म करता है तब कहीं जाकर बहू-बेटी का आना जाना शुरु होता है ।
अगहन शुक्ल पक्ष के पंचमी से अष्टमी तक मंदिर में विशेष पूजा अर्चना होती है । पंचमी के दिन खप्पर पूजा होती है और सप्तमी तथा अष्टमी को ब्रहृम स्थान में नरवलि स्वरूप पाँच बून्द रक्त चढÞा कर पंचबलि शुरु होती है । रक्त चढÞाने के बाद दीप स्वयं प्रज्ज्वलित हो उठता है । इसके जलने के पश्चात् बलि देने का क्रम शुरु हो जाता है । बलि पूजा शुरु होने के बाद बनारस  के डोम राजा हरिश्चन्द्र की संतान बनारस से लाए हुए राँगा -भैंसा) की बलि चढÞाते हैं  । उसके बाद आम जनता बलि चढाते हैं । माना जाता है कि बलि में चढÞाने के लिए सफेद चूहा खुद ही आ जाता है, दीप का स्वयं प्रज्ज्वलन यहाँ की खासियत है । साथ ही माना जाता है कि यहाँ खून और माँस पर मक्खियाँ नहीं बैठती हैं और माँस खाने से कोई रोग भी नहीं लगता है । मेला के समय में अगर किसी के घर में कोई शोक हो जाय तो वो बलि नहीं देते हैं । ऐसे लोग उसी वर्षमाघ संक्रान्ति या फागुन संक्रान्ति के दिन बलि देते हैं । उसके बाद गढÞी माई के नाम पर पाँच वर्षतक कोई बलि नहीं दी जाती है । यह पाँच वषर्ीय मेला मुख्यतः अगहन महीना में होता है । पर यह आषाढÞ से ही शुरु हो जाता है और किसी कारणवश जो बलि नहीं चढÞाते हैं, वो फागुन में बलि प्रदान करते हैं इस तरह यह मेला आषाढÞ से फागुन तक चलता है ।

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