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वैश्विक स्तर पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराती हिन्दी : डा श्वेता दीप्ति

 

काठमान्डू 10 जनवरी

“हिन्दी का वैश्वीकरण”,आज के परिेप्रेक्ष्य में एक सामयिक विषय है ये । जिसकी चर्चा किसी खास दिन या महीने में नहीं होती बल्कि हिन्दी को लेकर यह बहस निरन्तर जारी है । नेपाल में हिन्दी के अस्तित्व को लेकर हिन्दी प्रेमियों और भाषाभाषियों को चिन्ता होती रहती है । विदेशी भाषा कह कर आज तक हिन्दी को यहाँ संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है । जबकि नेपाल के इतिहास में हिन्दी का अपना एक महत्तवपूर्ण स्थान है । यहाँ के राजनीतिक परिवर्तन और शैक्षिक विकास में हिन्दी का अमूल्य योगदान है । लेकिन आज इसे सही स्थान नहीं मिल रहा । पर एक सुखद पहलू ये है कि यहाँ हिन्दी के विरोध की बातें चाहे जितनी भी हो जायँ पर आम जनता में  हिन्दी से लगाव भी दिख ही जाता है ।

विश्व में हजारों भाषाएँ हैं लेकिन कुछ ही भाषाओं के साहित्य का स्तर इतना समुन्नत है कि उस भाषा की रचनाओं का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हो । जिस भाषा का जितना अधिक साहित्य विश्व की अन्यान्य भाषाओँ में अनूदित किए जाने की एक निरंतर परंपरा रहेगी, निश्चित रूप से उसकी प्रयोजनीयता प्रामाणिक मानी जाएगी और विश्व स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रहेगी ।

हम सभी जानते हैं कि विश्व में अँग्रेजी के बाद चीनी भाषा को दूसरा स्थान प्राप्त है और यह माना जाता है कि चीनी सबसे अधिक लोगों के बीच बोली जाती है । विश्व में लगभग पैंतीस सौ भाषाएँ बोली जाती हैं जिनमें पाँच सौ ऐसी भाषा है जिसका लिखित रूप नहीं है । सोलह ऐसी भाषा है जिसे पाँच करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं जिनमें अरबी, अँग्रेजी, इतालवी, उर्दु, चीनी परिवार की भाषाएँ, जर्मन, जापानी, तमिल, तैलगु, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, बंगला, रुसी, स्पेनी और हिन्दी । यह हिन्दी के लिए गौरव की बात है कि सोलह सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा में हिन्दी शामिल है । १३७ देशों में हिन्दीभाषी रहते हैं किन्तु अफसोस कि इसका सही आँकड़ा हमारे समक्ष नहीं है । जिसकी वजह से चीनी भाषा दूसरे स्थान पर है और इसका सबसे बड़ा  एक कारण यह है कि चीनी भाषा में लगभग सत्तर भाषा एवं उपभाषाओं को शामिल किया गया है जो विश्व के कई देशों में बोली जाती है । इन सभी को मंदारिन में शामिल कर के यह तथ्य लाया गया कि चीनी भाषा विश्व में दूसरे स्थान पर है । जबकि सच्चाई यह है कि इसमें से कई भाषा को लोग आपस में नहीं समझते । परन्तु विडम्बना यह है कि हिन्दी से उन सभी भाषाओं और उपभाषाओं को अलग कर दिया गया जो एक समान एक ही लिपि के हैं और जिन्हें सभी समझते हैं,  यही वजह है हिन्दी का विश्व में तीसरे स्थान पर होना । अगर हम जुड़ें तो इस बात से कोई नहीं नकार सकता कि हिन्दी विश्व की पहली भाषा बनने में सक्षम है । आवश्यकता एक ऐसे मानक पद्धति की है जो सभी भाषाओं के तथ्याँक को सामने लाने के लिए प्रयोग किया जाय ।

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भाषा क्या है ? सहज शब्दों में कहें तो विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है भाषा । मानव को समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि इसके पास मस्तिष्क है, और इस मस्तिष्क में उपजते हैं विचार । इन विचारों को अभिव्यक्त होने के माध्यम की जरूरत होती है ।  यों तो मौन भी मुखर होता है किन्तु अभिव्यक्ति के स्तर पर भाषा ही वह माध्यम है जिससे विचार, अनुभव और भाव मूर्त रूप धारण करते हैं । भाषा वस्तुतः व्यक्ति मात्र की पीड़ाओं, उल्लासों और संवेदनाओं का एक अनुवाद है । भाषा वैचारिक और मानस पटल पर उद्वेलित होने वाली भावनाओं का प्रतिबिम्ब है । विश्व में कई भाषाएं बोली जाती हैं और सम्भवतः सभी भाषाएं आपस में संवेदना के स्तर पर जुङाव रखती है परन्तु हिन्दी भाषा अपनी सहजता और लचीलेपन के कारण इस संवेदनशीलता की इस विशेषता के अत्यÞन्त निकट है ।

हिंदी भाषा का साहित्य भी आज विविध विधाओं के माध्यम से वैश्विक फलक पर अपना स्थान बना रहा है । उत्कृष्ट लेखन व हिंदीतर श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद इस भाषा को मांझ कर इसके  वैश्विक स्वरूप को प्रभावी रूप से प्रस्तुत कर सकता है जो कि भूमंडलीकरण के इस दौर में परम आवश्यक है ।

आज हिन्दी के प्रचार में पत्र पत्रिकाओं के साथ साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्र भी अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन हिन्दी को बढ़ावा दे कर सहारा बन रहे इन माध्यमों से ही हिन्दी को सबसे बड़ा खतरा भी है । ये माध्यम बोल चाल की भाषा के नाम पर विदेशी भाषा के व्यामोह से स्वंय को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं और इनमें प्रयुक्त भाषा में अंग्रेजी शब्दों की बहुतायत होने लगी है परिणाम है कि हिंदी के स्वरूप में बदलाव आ रहा है और हिंग्लिश के रूप में एक नया अपभ्रंश रूप अवतरित होने लगा है । वर्तमान में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग केवल भाषागत आवश्यकता के लिए ही नहीं होता अपितु एक सामाजिक स्तर प्रदर्शन के रूप में किया जा रहा है । सह राजभाषा के पद पर आसीन अंग्रेजी को आज विकास का पर्याय माना जा रहा है । मध्यवर्ग इस प्रवृत्ति को अधिक ओढ़ रहा है यही कारण है कि कई बार हिंदी की स्थिति शोचनीय लगती है परन्तु साथ ही इसके प्रसार को देखकर आश्वस्ति होती है कि तुमुल कोलाहल में भी हिंदी अपनी शांत, सौम्य परन्तु दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही है । यह हिंदी की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि आज संचार के अत्याधुनिक साधनों मोबाइल और इन्टरनेट जहां अंग्रेजी का एकछत्र राज्य हुआ करता था वहां भी यह भाषा विस्तार प्राप्त कर रही है । आज इन यंत्रों पर देवनागरी टंकण हेतु अनेक एप्स उपलब्ध हैं जिससे हिंदी लोकप्रिय हो रही हैं । तकनीकविज्ञों के अनुसार हिन्दी कम्प्यूटर इत्यादि के लिए संस्कृत के पश्चात सर्वश्रेष्ठ भाषा माध्यम है और इसका कारण इसकी ध्वन्यÞात्मक प्रकृति है । हिन्दी विश्व की बिरली भाषा है जो ध्वनि संचरित है । हिंदी पूरी तरह से सक्षम और समर्थ भाषा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि इसे जैसे बोला जाता है वैसा ही लिखा भी जाता है । यानी हिंदी भाषा पूरी तरह से ध्वनि और उच्चारण आधारित भाषा है । यह खूबी विश्व की अन्य किसी भी भाषा में नहीं है । अंग्रेजी सहित विश्व की अन्य भाषाओं के लिखने और बोले जाने में काफी अंतर होता है । हिंदी भाषा का जन्म संस्कूत भाषा से हुआ है । वैज्ञानिकों द्वारा संस्कृत और हिंदी भाषा को ध्वनि विज्ञान और दूरसंचारी तरंगों के माध्यम से अंतरिक्ष और अन्य अज्ञात सभ्यताओं को संदेश भेजे जाने के लिए भी सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया है ।

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वैश्वीकरण, बाजारीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में तत्क्षण बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच हिंदी भाषा एक नए जोश के साथ उभर रही है । आज भारत वैश्विक अर्थजगत में महाशक्ति बनकर उभर रहा है । विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाने वाले देश अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा तो अपने देश के नागरिकों को कई बार हिंदी सीखने की सलाह दे चुके हैं क्योंकि उन्हें भी लगता है कि भारत एक उभरती हुई विश्व शक्ति है और भविष्य में हिंदी सीखना अनिवार्य होगा । व्यवसाय की दृष्टि से देखें तो बाजार बिकने वाली वस्तु की ताकत को देखता है । हिंदी भाषा में वह ताकत है । यही कारण है कि आज सर्वाधिक विज्ञापन भी हिंदी में आते हैं । इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी हिंदी का प्रभाव बढ़ रहा है । अब कई साफ्टवेयर और हार्डवेयर अंतर्निर्मित हिंदी यूनिकोड की सुविधा के साथ आ रहे हैं । इससे हिंदी की तकनीकी समस्याएं लगभग समाप्त हो गई हैं .

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नेपाल में हिन्दी के व्यवहार का प्राचीनतम रूप शिलालेखों एवं उपलब्ध हस्तलिखित सामग्रियों से अनुमान किया जा सकता है कि नेपाल के लिए हिन्दी यहाँ की ही एक भाषा है । पश्चिम नेपाल की दांग घाटी में प्राप्त आज से लगभग ६५० वर्ष पूर्व के शिलालेख में दांग का तत्कालीन राजा रत्नसेन, जो बाद में योगी बन गया था, उसकी एक दंगीशरण कथा नामक रचना भी मिलती है। यह कृति नेपाल में हिन्दी के व्यापक प्रयोग और गहरी जड़ को पुष्ट करती है। यह रचना साहित्यिक दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण है ही हिन्दी की भाषिक विकास प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी साहित्य का जो इतिहास आज तक लिखा गया है, वह भारत के हिन्दी साहित्य का ही इतिहास रहा है। वास्तव में भारत से बाहर हिन्दी की जो धाराएं चलती रही हैं, वे अब भी इतिहासकारों की दृष्टि से ओझल है। उनकी ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। पाल्पा के सेन वंशीय नरेशों तथा पूरब में मोरंग और अन्य कई राज्यों के तत्कालीन नरेशों ने तो हिन्दी को अपनी राजभाषा ही बनाया था। कुष्णशाह, मुकंदसेन आदि नरेशों के सभी पत्र और हुक्मनामें हिन्दी में ही मिलते हैं, जिससे हिन्दी की तत्कालीन स्थिति का आसानी से अनुमान हो जाता है। काठमांडू उपत्यका के मल्ल राजाओं में से अनेक ने हिन्दी में रचनाएं कीं। उनके हिन्दी प्रेम का कारण भी वहां हिन्दी का व्यापक प्रयोग और प्रचार ही कहा जा सकता है। इस प्रकार हिन्दी वहाँ कम से कम सात सौ वर्षों पूर्व से ही बहुसंख्यक लोगों की प्रथम और द्वितीय भाषा के रूप में चलती आई है।

निष्कर्षतः यह माना जा सकता है कि हिंदी की महती भूमिका आज न केवल राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने के लिए अनुभूत हो रही है, बल्कि उस भाषा के साहित्य में सकल विश्व को प्रेम व ज्ञान सौरभ से सज्जित व परिमार्जित करने के भी अनुपम क्षमता है। जिससे स्पष्टतः विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य का अनुपम महत्त्व परिलक्षित व प्रतिफलित होता है।

 

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