जवाहर कर्नावटजी की कृति ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता’ पर डॉ लारी आजाद
मेरे बहुत पुराने मित्र भाई जवाहर कर्नावट ने अपनी कृति ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता’ भेजी है जो उनके दुर्लभ जीवट और दशकों के श्रमसाध्य अध्यवसाय का प्रतिफल है। २७ देशों से निकलने वाली हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को जुटाना और जीवन की दीर्घ यात्रा में ये सोच कर सुरक्षित रखना कि एक दिन इनके योगदान को प्रस्तुत करूंगा, अपने आप में एक भागीरथ संकल्प था। जवाहर भाई मुझसे पहली बार विदेश में ही मिले थे, फिर देश विदेश के सुदूर आयोजित कार्यक्रमों में मिलते रहे; मुझे उनकी मैत्री पर गर्व है।
इस पुस्तक को देख कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि इसके प्रणयन की परिकल्पना उन्होंने मुझसे दशकों पूर्व साझा की थी। इसके प्रकाशन के ठीक पहले उन्होंने एक भव्य आयोजन में मुझे विशिष्ट अतिथि बना कर भोपाल निमंत्रित किया था और मैंने उनसे वादा किया कि मेरे पास जो भी सामग्री एकत्र है, आप को और आपके वर्तमान संस्थान को भेंट कर दूंगा परन्तु किसी और कार्यक्रम में अति व्यस्तता के नाते मैं जाने से रह गया जिसका उन्हें दुख हुआ; मैंने हृदय से क्षमायाचना की।
फिर ये पुस्तक हस्तगत हुई ।
गिरमिटिया भारतीय जहां जहां गये, वहां से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया; जवाहर भाई ने मारीशस, दक्षिण अफ़्रीका,फ़ीजी, सूरीनाम, गयाना, त्रिनिदाद -टुबैगो से प्रकाशित होने वाले पत्रों व संपादकों को संग्रहीत किया है। उत्तरी अमेरिका व आस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूज़ीलैंड की स्तरीय प्रामाणिक पत्रकारिता का सिंहावलोकन किया है। यूरोप में ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, नार्वे, हंगरी व रूस की विभिन्न जीती मरती पत्रिकाओं और उनकी विषय सामग्री का अनुसंधान किया है। एशिया में जापान,यू ए ई, कुवैत,क़तर, चीन, सिंगापुर, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और नेपाल में हिंदी संपादकों की वैचारिकी पर गहनता से प्रकाश डाला है। कलेवर ३०० पृष्ठों में समाहित एवं सम्पन्न है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों के चित्र, अध्यायों के अंत में संदर्भ सूची और पुस्तक के अंत में साधन-स्रोत इसे मूल्यवान बनाते हैं। जवाहर भाई निःसंदेह साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने जो दशकों पूर्व सोचा, उसे कर दिखाया; मुझे उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर भी गर्व है।
इनमें उल्लिखित अनेक पत्रिकाओं में मैं भी छपा, कई से वर्षों जुड़ा रहा, कई का दक्षिण पूर्व एशिया और भारत में प्रतिनिधित्व भी किया है जैसे ‘हिमालिनी’, ‘सौरभ’ इत्यादि। स्वयं मैंने भी तीन पत्रिकाओं का संपादन दशकों किया जिनके संस्करणों का प्रकाशन विदेशों से भी हुआ। १९८५ में इसका प्रारंभ नेपाल व भूटान से प्रकाशित ‘हिमकिरीटिनी’ से हुआ।
भाई जवाहर जी इधर लगातार विदेश यात्राओं में व्यस्त हैं, विगत दिनों फ़ीजी, जापान, पुर्तगाल, तुर्की, मारीशस, श्रीलंका, नेपाल में अपने संस्थान के कुल मुख्य के संग उन्होंने साहित्यिक यात्राएं की हैं जो फलप्रद साबित हो रही हैं। विश्व में जहां भी हिंदी और भोजपुरी बोली जाती है ऐसे दर्जनों देशों की यात्राएं मैंने भी बार बार की है और जवाहर भाई के इस पुस्तक में उल्लिखित निष्कर्षों से न केवल सहमत हूं बल्कि प्रमाणित करता हूं कि वे सत्य के निकट हैं। ऐसे गंभीर लेखन कार्य नित्य नहीं होते , न ही घर बैठे हो सकते हैं; इनके लिए जवाहर भाई जैसी जिजीविषा और लगन चाहिए। वे दृष्टि संपन्न और निर्पेक्ष शोधक हैं, उनके इस महती प्रयास को हिंदी पत्रकारिता में शोध करने वाले उच्च शिक्षा के मर्मज्ञ ही समझ सकते हैं। आज गूगल से उंगलियों पर सतही जानकारी लेने वाले पाठकों के लिए यह ग्रंथ एक मील पत्थर और प्रामाणिक दस्तावेज़ है। मित्रवर जवाहर जी को सहस्रों साधुवाद एवं अभिनंदन।



