माँन्टेश्वरी शिक्षा के प्रति बढÞता आकर्षा

लीलानाथ गौतम:हर अभिभावक चाहता है कि हमारा बच्चा दूसरों के बच्चों से अलग और क्षमतावान हो सके । इसीलिए अभिभावक अपने बच्चे को उस तरह के वातावरण में पालन-पोषण करना चाहते हैं, जहाँ उनके बच्चे अपनी क्षमता का विकास और पर््रदर्शन कर सकें । दूसरी तरफ बढÞता शहरीकरण, जितना जल्दी हो सके आर्थिक उन्नति करने की महत्वाकांक्षा और व्यस्त दैनिकी के कारण हर परिवार के भीतर माता-पिता दोनों ही व्यवसाय में आबद्ध होते हैं । ऐसे दम्पति के लिए अपने बच्चों का उचित देखभाल करना मुश्किल हो जाता है । इस समस्या को कुछ हद तक सम्बोधन करता है- चाइल्ड केयर सेन्टर अर्थात माँन्टेश्वरी विद्यालय ।
माँन्टेश्वरी विद्यालय में जब बालबालिका कुछ साल रहते हैं, वह अन्य की तुलना में कुछ अधिक क्षमतावान होते हैं और उनका बौद्धिक विकास अधिक होता है ऐसी धारणा मानी जाती है । इसीलिए आजकल अपने बच्चों को माँन्टेश्वरी विद्यालय में नामांकन करानेवाले अभिभावक बढÞ रहे हैं । रटने वाली शिक्षण विधि के विकल्प के रूप में विकास हो रही माँन्टेश्वरी शिक्षा, आखिर क्या है – और क्यों बढÞ रहा है इसके प्रति आकर्षा – आईए, कुछ चर्चा करें-
बालबालिका की रुचि किस क्षेत्र में है – उसकी बौद्धिक क्षमता क्या है – इस विषय में विशेष ध्यान दिया जाता है माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति में । बच्चों का मनोविज्ञान भी विशेष रूप में अध्ययन किया जाता है । उसके बाद ही खेलकूद और मनोरञ्जन के माध्यम से शिक्षण दिया जाता है । इस पद्धति में बालबालिका स्वतन्त्र रूप में अपने अनुभव के
माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर सकें, इस बात पर विशेष जोडÞ दिया जाता है । जो बच्चे माँन्टेश्वरी पद्धति में अध्ययन करने के लिए क्लासरूम में जाते हंै, वे वहाँ रंग के साथ खेलते हैं और विभिन्न कलाकृति की सृजना में रमते हैं । जहाँ योग, संगीत, नृत्य, नाटक आदि के माध्यम से अनुभव हासिल करते हुए बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं । ऐसे विद्यालयों में आए बच्चों को पढÞने के लिए कोई भी दबाव नहीं दिया जाता । उनसे अग्रज क्लास में अध्ययनरत विद्यार्थियों को देखकर हर बच्चा क्रियाशील हो सके, इस बात पर जोडÞ दिया जाता है ।
माँन्टेश्वरी शिक्षा के शुरुआती काल में इसके प्रति कुछ अनावश्यक भ्रम भी पैदा हुआ था । वैसे तो अब भी कुछ भ्रम है । कुछ लोगों का मानना है कि माँन्टेश्वरी में अध्ययनरत विद्यार्थी अन्य सामान्य -टे्रडिसनल) स्कूल में अध्ययन नहीं कर सकते हैं । लेकिन शिक्षान्तर स्कूल के प्रि-कोअर्डिनेटर तथा शिक्षिका अनामिका गिरी का कहना है- यह सिर्फभ्रम है, यथार्थ नहीं है । शिक्षिका गिरी के अनुसार बालबालिका सिर्फसैद्धान्तिक रूप में पढÞ कर ही नहीं, व्यावहारिक और अनुभवजन्य क्रियाकलाप से ज्यादा सीख सकते हैं । माँन्टेश्वरी में व्यावहारिक और सैद्धान्तिक दोनो ज्ञान दिया जाता है । शायद इसीलिए हो सकता है, माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति अपना व्यावसायिक स्वरूप ग्रहण कर चुकी है । सिर्फ काठमांडू ही नहीं, देश के प्रमुख शहरों में माँन्टेश्वरी विद्यालय खुलने का क्रम बढÞता जा रहा है । पुतलीसडक स्थित बेस्ट माँन्टेश्वरी ट्रेनिङ सेन्टर की सञ्चालिका सुषमा सुब्बा के अनुसार माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति का अनुशरण करते हुए बालबालिका केन्द्रित विद्यालय स्थापना करने वालों की संख्या बढÞ रही है । सुब्बा के अनुसार बच्चे कम उम्र से ही किसी दबाब के बिना स्वतन्त्र रूप में शिक्षा ग्रहण कर सकें, ऐसी सोच बना कर माँन्टेश्वरी शिक्षा के प्रति हर अभिभावक आकषिर्त हो रहे हैं ।
नेपाल में पहली बार इन्टरनेशनल किन्डर गार्डेन स्कूल ने माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति की शुरुआत अपने विद्यालय में की थी । उसके बाद पर्ूवप्राथमिक शिक्षा में इस प्रणाली को कुछ विद्यालयों ने अनुसरण किया । शैक्षिक सामग्री और दक्ष शिक्षक-शिक्षिका का अभाव, शैक्षिक सामग्री का महंगा होना, विद्यालय का भौतिक पर्ूवाधार एवं वातावरण बालमैत्रीपर्ूण्ा नहीं होना, आदि के कारण सभी विद्यालय इस पद्धति को चाहते हुए भी लागू नहीं कर सकते हैं । लेकिन माँन्टेश्वरी शिक्षण प्रणाली को अपनाते हुए विद्यालय सञ्चालन करनेवालों की संख्या सौ से भी ज्यादा हो चुकी है ।
नेपाल में माँन्टेश्वरी शिक्षा के नाम में यूरोपियन बेस का माँन्टेश्वरी, अमेरिकन बेस का फास्ट ट्रैक किड, इन्डियन बेस का युरो किड्स आदि बालबालिका केन्द्रित शिक्षण पद्धति का विकास हो रहा है । विशेषतः ढर्Þाई से छह साल तक के बालबालिका को माँन्टेश्वरी विद्यालय में भर्ती किया जाता है । लेकिन काठमांडू एयरपोर्ट स्थित शिक्षान्तर स्कूल में अभी छोटे-छोटे बालबालिका ही नहीं, एसएलसी की तैयारी कर रहे किशोर-किशोरी भी माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति के अनुसार अध्ययन कर रहे हैं । इसी तरह वेस्ट माँन्टेश्वरी ट्रेनिङ सेन्टर की सञ्चालिका सुष्मा सुब्बा भी ±२ तक का अध्ययन माँन्टेश्वरी पद्धति के अनुसार कराना चाहती हैं । सुब्बा कहती हंै- ‘हम लोगों ने ६ से ९ साल के बालबालिकाओं को लेकर लाजिम्पाट में वेस्ट मन्टेश्वरी एलिमेन्ट्री नामक स्कूल की स्थापना की है । जिसका उद्देश्य भविष्य में ±२ तक का अध्ययन माँन्टेश्वरी शिक्षण विधि से ही करवाना है ।’
माँन्टेश्वरी विद्यालय को ‘चाइल्ड केयर सेन्टर’ भी कहा जाता है । जहाँ बच्चों के लिए आवश्यक भौतिक पर्ूवाधार तथा खेलने की सामग्री सहज उपलब्ध हो सकती है । बालबालिका जो सामग्री को लेकर खेलते हैं, वही सामग्री उसके लिए अध्ययन सामग्री भी हो जाती है । इसी तरह का व्यवस्थापन माँन्टेश्वरी विद्यालयों में किया जाता है । जहाँ बालबालिका के मनपसन्द कार्टर्ूूाले सामग्री से लेकर गीत, संगीत, गायन, ड्रामा आदि के माध्यम से अध्ययन-अध्यापन करवाया जाता है । शिक्षान्तर स्कूल की शिक्षिका अनामिका गिरी कहती हैं- ‘बच्चे ऐसे वातावरण में इस तरह रम जाते हैं कि वे अध्ययन के लिए कोई भी दबाव महसूस नहीं करते, वे समझते हैं कि मैं खेल रहा हूँ, गा रहा हूँ, मनोरञ्जन में मस्त हूँ । इसी तरह बालबालिका ज्ञान हासिल करते हंै । इसी शिक्षण पद्धति को ही मँान्टेश्वरी शिक्षण विधि कहा जाता हैं ।’
बिना किसी दबाव के बालबालिका ज्ञान प्राप्ति की ओर अग्रसर होने के कारण इस शिक्षण विधि के प्रति अभिभावक भी आकषिर्त हो रहे हैं । बानेश्वर स्थित बालवात्सल्य डे केयर एण्ड प्रिस्कुल की प्रिन्सिपल कृपा र्राई के अनुसार माँन्टेश्वरी पद्धति के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी और सामान्य स्कूल में अध्ययनरत विद्यार्थी के बीच गहरा अन्तर रहता है । र्राई कहती हैं- माँन्टेश्वरी एक ऐसा पद्धति है, जहाँ बच्चे मनोरञ्जन करते हैं और वही मनोरञ्जन शिक्षा प्राप्ति का जरिया होता है । शिक्षिका अनामिका गिरी भी यह बात स्वीकार करती हैं । गिरी का कहना है- ‘माँन्टेश्वरी क्लास के लिए हर बालबालिका विशेष होते हैं । यहाँ शिक्षक की इच्छा के मुताबिक नहीं, विद्यार्थी क्या चाहते हैं, उसके अनुसार पढर्Þाई होती है ।’
अर्लि चाइल्डहुड एजुकेसन अर्थात् माँन्टेश्वरी शिक्षा को समग्र में ३ वषर्ीय शैक्षिक पैकेज के रूप में माना जाता है । जहाँ कक्षागत ग्रेडिङ का सिद्धान्त नहीं, स्कूल में औपचारिक अध्ययन शुरु करने से पहले की आधारशिला निर्माण की जाती है । इसीलिए तो बहुत लोग इसको ‘डे केयर सेन्टर’ के नाम में भी जानते हैं । लेकिन जानकारों का मानना है कि यह सिर्फडे केयर सेन्टर ही नहीं है, इस में बच्चों की शैक्षिक क्षमता का आधार निर्माण किया जाता है ।
शिक्षाविदों का मानना है कि यह पर्ूववाल्यावस्था सीखने की सबसे उत्तम उम्र है । उन लोगों का कहना है कि १ से ५ साल के बच्चों के सीखने की क्षमता ५० प्रतिशत रहती है । ८ साल के बच्चों की क्षमता ८० प्रतिशत होता है । बाँकी २० प्रतिशत क्षमता का प्रयोग वह बांकी उमर में करता है । अगर इस तथ्य को मनन किया जाए तो बालबालिका के लिए शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त समय १ साल से ८ साल तक का ही है । इसीलिए अभिभावक को इस समय विशेष ध्यान देना चाहिए । इसी तथ्य के मद्देनजर ही माँन्टेश्वरी शिक्षण पद्धति के प्रति आकर्षा भी बढÞ रहा है ।

