वैश्विक छद्मयुद्ध के भंवर में यूक्रेन : प्रेमचन्द्र सिंह

प्रेमचन्द्र सिंह, लखनऊ । अमेरिका ने 24 फरवरी, 2025 को यूक्रेन- रूस युद्ध की तीसरी वर्षगांठ पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में यूक्रेन द्वारा प्रस्तुत शांति प्रस्ताव के खिलाफ रूस के समर्थन में अपना मतदान किया है। इस प्रस्ताव में रूसी हमले की निंदा और यूक्रेन से रूसी सेना की तत्काल वापसी की बात की गई थी। अपनी गुटनिरपेक्ष विचारधारा पर अडिग रहते हुए भारत ने चीन सहित 65 देशों के साथ इस प्रस्ताव पर वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया, जबकि नेपाल, भूटान, म्यांमार सहित 93 देशों ने यूक्रेन के पक्ष में अपना मतदान किया है। लगता है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव का महत्व अब प्रतीकात्मक होकर ही रह गया हैं। अमेरिका ने यूक्रेन द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया क्योंकि वह रूस- यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए रूस से बातचीत के अपने मौके को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है। हालांकि, उसी दिन जब यूरोपीय देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका द्वारा प्रेषित रूस- यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने संबंधित इसी तरह के एक प्रस्ताव में बदलाव कर दिया गया, तो अमेरिका ने अपने ही उस प्रस्ताव पर अपना समर्थन देने के बजाय उसे रोक दिया। यह सब अमेरिका की बदलती भू- रणनीति का वैश्विक मंच पर प्रदर्शन है।
यूक्रेन में चल रहा संघर्ष असल में रूस और अमेरिका के बीच एक अप्रत्यक्ष युद्ध (प्रॉक्सी वार) बन गया है, जिसके बीच यूक्रेन बुरी तरह फंस गया है। इस वैश्विक भूराजनीतिक शतरंज के खेल में यूक्रेन एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने अपने आक्रामक तेवर और सख्त कदम उठाकर यूक्रेन के लोकतंत्र को कमजोर किया है और उन्हेंने अभी हाल में ही यह स्वीकार किया है कि अगर अमेरिका से लगातार सैन्य मदद नहीं मिली, तो यूक्रेन के लिए अपने को बचाना बहुत मुश्किल होगा। राष्ट्रपति ट्रम्प का यूक्रेन युद्ध से अमेरिका को निकालने का फैसला दीर्घकालीन अमेरिकी रणनीतिक हितों के पक्ष में है। यह युद्ध दिखा चुका है कि पश्चिमी देशों के पास युद्ध के लिए जरूरी हथियार और रक्षा प्रणाली सीमित मात्रा में हैं। अमेरिका को भी हथियारों का उत्पादन बढ़ाने में मुश्किल हो रही है। पश्चिमी देशों ने यूक्रेन को बड़ी मात्रा में हथियार दिए हैं, जिससे यूरोपीय देशों की अपनी सैन्य क्षमता पर दबाव बना हुआ है। इस स्थिति में राष्ट्रपति ट्रम्प का फैसला अमेरिका के लिए फायदेमंद हो सकता है, ताकि वह अपनी रक्षा जरूरतों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके।
अगर ट्रम्प प्रशासन रूस से सीधी बातचीत शुरू करता है, तो इससे सबको जाहिर हो जाएगा कि अमेरिका युद्ध खत्म करने के लिए गंभीर है और यूक्रेन में शांति लाने में चीन की भूमिका बहुत सीमित है। फिलहाल युद्ध लंबा खींचने का सबसे बड़ा फायदा सिर्फ चीन को ही हो रहा है। वर्ष- 2020 के बाद से चीन ने अपने परमाणु हथियारों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा कर ली है और अपनी सेना को बहुत तेजी से मजबूत कर रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी देश ने इतनी तेजी से अपनी सैन्य शक्ति नहीं बढ़ाई, जितनी चीन ने बढ़ाई है। पूर्व राष्ट्रपति बाइडेन ने खुद कहा था कि युद्ध खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका बातचीत और समझौता है। इससे पहले कि चीन और रूस आपस में और मजबूत हो जायें और अमेरिका की ताकत को कमजोर कर दें, अमेरिका को रूस के साथ शांति समझौता कर लेना चाहिए। अगर चीन ताइवान पर कब्जा कर लेता है, तो यह पूरी दुनिया की शक्ति संतुलन को बदल देगा और अमेरिका की वैश्विक ताकत को खत्म कर देगा। इसके फलस्वरूप अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों पर भी इसका प्रतिकूल असर डालेगा। चीन आर्थिक उत्पादन, सैन्य खर्च और अन्य रणनीतिक मामलों में रूस से कहीं ज्यादा ताकतवर बनता जा रहा है और वह अमेरिका का सबसे बड़ा वैश्विक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहा है। जाहिर है कि अमेरिका यह सब होने देना नहीं चाहेगा।
रूस- यूक्रेन के बीच का यह युद्ध अमेरिका का ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र से हटा रहा है, जो दुनिया का नया भू- आर्थिक और भू- राजनीतिक केंद्र के तौर पर उभर रहा है। यह क्षेत्र भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को तय करने वाला है। विचारणीय बात यह है कि रूस और यूक्रेन के बीच के चल रहे इस युद्ध से चीन को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है, क्योंकि इस युद्ध ने वास्तव में नाटो और रूस को आपस में उलझा दिया है, जबकि चीन इस वैश्विक समीकरण का फायदा उठाकर अपनी ताकत बढ़ाता जा रहा है। अमेरिका के नेतृत्व में चल रहे “हाइब्रिड युद्ध” और रूस पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों का ऐसा असर हुआ है कि इससे चीन को ही फायदा हो रहा है। अब रूस अपना अधिकतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार चीनी मुद्रा युआन में करने लगा है और अपनी कमाई चीनी बैंकों में जमा कर रहा है। इसका तात्पर्य है कि चीन को रूस के वित्तीय लेन-देन से लाभ मिल रहा है। यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि चीन रूस को अपने साथ मिलाकर अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बनाने की रणनीति अपना रहा है। वर्ष- 2022 में घोषित चीन और रूस की “नो-लिमिट पार्टनरशिप” ने ऐसी स्थिति बना दी है जहां ये दोनों देश मिलकर अमेरिका की ताकत को कमजोर कर सकते हैं। अगर चीन और रूस औपचारिक रूप से सैन्य और रणनीतिक साझेदारी कर लेते हैं, तो यह पूरे यूरेशिया में एक शक्तिशाली गठबंधन बन सकता है, जो अमेरिका के लिए सबसे बड़ा भूराजनीतिक चुनौती का स्वरूप धारण करने की क्षमता रखता है।
अतः अमेरिका अपनी पुरानी रणनीति पर लौटने की रोडमैप पर सक्रियता से कार्यरत है, जिसके अंतर्गत पूर्व में उसने रूस और चीन के बीच मतभेद बढ़ाकर शीत युद्ध में जीत हासिल की थी। अगर रूस- यूक्रेन युद्ध खत्म हो जाता है, जिसकी अब प्रबल संभावना है, ऐसे में अमेरिका अपने सैन्य संसाधनों को यूरोप से हटाकर फिर से इंडो- पैसिफिक में तैनात कर सकेगा, जहां उसकी असली वैश्विक ताकत दांव पर लगी हुई है। खासकर, दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक पकड़ को रोकने के लिए अमेरिका को अपनी नौसेना और सैन्य प्रभाव को वहां मजबूत करना होगा। यह न केवल अमेरिका के भूराजनीतिक हितों की रक्षा करेगा, बल्कि उसके सहयोगी देशों को भी सुरक्षा प्रदान करेगा।


