अमेरिका और यूरोप के बीच बदलते सरोकार : प्रेमचन्द्र सिंह
प्रेमचन्द्र सिंह, लखनऊ ।नगत 28 फरवरी और 1 मार्च के बीच की रात राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जेलेंस्की की व्हाईटहाउस में हुई मुलाकात में गजब का नजारा दुनियां को देखने को मिला, जहां मेजबान राष्ट्रपति की किसी विदेशी मेहमान के प्रति विस्मयकारी व्यवहार पर मेहमान राष्ट्रपति ने भी पलटकर वार किया। यह अभूतपूर्व घटना है, लेकिन यह घटित हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जेलेंस्की दोनों कैमरा के सामने ही भीड़ गए और उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस भी बीच में कूद पड़े और तीनों के बीच नोंकझोंक और तू- तू- मैं- मैं को पूरी दुनियां ने देखा। इस घटना पर पूरे दुनियां में प्रतिक्रिया हुई है, कुछ का मानना है कि यह चमत्कार ही है कि इस माहौल में चप्पल जूते नहीं चले। झगड़े के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि राष्ट्रपति जेलेंस्की शांति नहीं चाहते हैं और अगर वह अमेरिका के साथ इस प्रकरण में समझौता नहीं करते हैं, तो अमेरिका इस जंग से बाहर हो जाएगा और यूक्रेन का साथ नहीं देगा। राष्ट्रपति ट्रंप का यह भी कहना था कि यूक्रेन रूस के साथ जंग में जीत हासिल नहीं कर सकता है। साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्रपति जेलेंस्की पर अमेरिका के लोगों और अमेरिका का अनादर करने का भी आरोप लगाया, लेकिन राष्ट्रपति जेलेंस्की का कहना था कि वह यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी के साथ युद्ध विराम चाहते हैं। इस विवाद पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन सहित ज्यादातर यूरोपीय देशों ने राष्ट्रपति जेलेंस्की का समर्थन किया है। साथ ही इस विवाद के कारण यूक्रेन की दुर्लभ खनिजों के लिए होने वाला अमेरिका और यूक्रेन के बीच का समझौता फिलहाल खटाई में पड़ गया है और यूक्रेन में युद्ध विराम के प्रयासों को भी झटका लगा है। राष्ट्रपति ट्रंप को विश्वास था कि वह राष्ट्रपति जेलेंस्की को युद्ध विराम के लिए तैयार कर लेंगे, लेकिन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने साफ कर दिया कि वह रूस के साथ युद्ध जारी रखना चाहते हैं। अब सवाल है कि क्या यूक्रेन बिना अमेरिका के सहयोग के यूरोपीय देशों के समर्थन से युद्ध जारी रख पाएगा?
हालांकि इस अजीबोगरीब घटना के बाद वैश्विक समुदाय में राष्ट्रपति जेलेंस्की के प्रति हमदर्दी अधिक दिख रही है। बातचीत के दौरान माहौल तब अधिक गर्म दिखा जब राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि शुरू से रूस के साथ इस जंग में यूक्रेन अकेले रहा है, ऐसी परिस्थिति अमेरिका के साथ भी भविष्य में हो सकती है। इस पर राष्ट्रपति ट्रंप उत्तेजित दिखे और उन्होंने कहा कि अमेरिका के बारे में आप नहीं सोचें, अमेरिका की समस्या हम पर छोड़ दीजिए। इस घटना के बाद जेलेंस्की ने फॉक्स न्यूज के साथ एक घंटा बातचीत किया और उसमें अमेरिका के प्रति उनकी भाषा ही बदली हुई थी। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस युद्ध में पहले दिन से ही यूक्रेन के साथ है और मैं अमेरिका का शुक्रगुजार हूं। लेकिन उन्होंने अमेरिका से माफी नहीं मांगी। वह बार बार यह कहते दिखे कि अगर अमेरिका यूक्रेन की युद्ध के पहले दिन से सहायता नहीं करता, तो यूक्रेन को अपने अस्तित्व में बने रहना मुश्किल था।
फ्रांस के राष्ट्रपति इस मुद्दे पर आज 2 मार्च, 2025 को यूरोप के देशों के बीच विमर्श के लिए आग्रही है और इसके कुछ दिन बाद ही जी- 7 की बैठक भी होने वाली है। इन दोनों बैठकों में इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच होने वाली क्रिया- प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। हालांकि अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो दक्षिण अफ्रीका के मुद्दे पर जी-7 के विदेश मंत्रियों की हाल ही में आयोजित बैठक में शिरकत नहीं किया है और इधर कनाडा को ‘फाइव- आई समूह’ से अमेरिका निकाल चुका है। अमेरिका और यूरोप के बीच संबंध का आधार अब नाटो संधि का आर्टिकल – 5 ही है जिसके अंतर्गत किसी भी सदस्य के ऊपर कोई भी बाहरी आक्रमण नाटो के सभी सदस्यों के ऊपर आक्रमण मानकर कार्यवाही होती है। नाटो संगठन में केवल अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस इन्ही तीन देशों के पास ही न्यूक्लियर वेपन है और इसमें भी संधि के प्रावधानों के तहत फ्रांस को न्यूक्लियर वेपन के प्रयोग से बाहर रखा गया है। अब इस संगठन में बचा केवल अमेरिका और ब्रिटेन दो न्यूक्लियर देश, जिसमें ब्रिटेन की सामरिक न्यूक्लियर क्षमता जगजाहिर है। इसका मतलब नाटो सैन्य संगठन का सारा दारोमदार केवल और केवल अमेरिका पर है। अमेरिका का यही सुरक्षा का आश्वासन अमेरिका के लिए परेशानी का कारण है। मिशाल के तौर पर इंडो फेसिफिक क्षेत्र में ताइवान और यूरोप में यूक्रेन को अमेरिकी सहायता का आश्वासन ही इन देशों की उत्तेजक रवैया के मूल में है, जो विश्व शांति के रास्ते में खतरा बना हुआ है और अमेरिका को सैंकड़ों करोड़ डॉलर खर्च करने की मजबूरी में डालता रहा है।
विश्लेषकों का माने तो राष्ट्रपति ट्रंप के कहने का तात्पर्य अप्रत्यक्ष रूप से केवल इतना था कि यह केवल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बाइडेन की बेवकूफी थी जो यूक्रेन को 350 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सहयोग इस युद्ध के लिए दिया, नहीं तो यूक्रेन रूस के साथ लड़ाई में दो हफ्ते भी नहीं टिक सकता था। इस घटना के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से कहा और सोशल मीडिया पर भी लिखा कि यह व्यक्ति (राष्ट्रपति जेलेंस्की) शांति का पक्षधर नहीं है। वह समझ रहे है कि अमेरिका उसके साथ है तो यह उनके पक्ष में युद्ध के लिए बहुत बड़ा लाभ है और वह इस लाभ के सहारे जंग लगातार लड़ते रहना चाह रहे है, इस जंग को रोकना बिल्कुल ही नहीं चाहते है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह भी कहना था कि अगर अभी राष्ट्रपति जेलेंस्की सीजफायर के लिए तैयार हो जाते हैं, तो राष्ट्रपति जेलेंस्की द्वारा उठाए गए बाकि पहलुओं पर अमरीका के साथ यूक्रेन का विमर्श शुरू हो सकता है। बैठक में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस के अतिरिक्त अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो भी थे। मार्को रूबियो ने बाद में इस बैठक की पृष्ठभूमि तथा बैठक से उत्पन्न परिस्थितियों पर विस्तार से बताया कि इस बैठक से चार पांच दिनों पूर्व राष्ट्रपति जेलेंस्की से उपराष्ट्रपति वांस और विदेशमंत्री रूबियो दोनों मिल चुके थे और उन्हें साफ साफ बता दिया गया था कि यूक्रेन की जिस दुर्लभ खनिज को लेकर समझौता की बात हो रही है, उस समझौता के अंतर्गत दुर्लभ धातु की खोज और खुदाई दशकों में भी पूरा होने वाला नहीं है क्योंकि यूक्रेन में अभी तक इन खनिजों की उपलब्धता ही सुनिश्चित नहीं है। अगर लोग सोच रहे हैं कि इस समझौता से अमेरिका को फायदा होने वाला है, तो वे वास्तविकता से दूर हैं। अगर दशकों बाद अमेरिका को 350 बिलियन डॉलर वापस हो भी जाए, तो मुद्रास्फीति के इस दौर में उसकी क्या कीमत शेष रह जाएगी। उनका कहना था कि इस समझौता के बहाने अगर अमेरिका का यूक्रेन में प्रश्नगत 350 से 500 बिलियन डॉलर का निवेश हो जाता है, तो अमेरिका अपने निवेश की सुरक्षा के लिए बचनबद्ध हो जाएगा और यह यूक्रेन की सुरक्षा की स्वतः गारंटी बन जाएगा। साथ ही इस समझौता के तहत जिन खदानों की बात हो रही है, वह सारी की सारी यूक्रेन में नहीं है बल्कि उनमें से कई खदान क्षेत्र अभी रूस के कब्जा में है। लेकिन यह बात राष्ट्रपति जेलेंस्की को समझ में नहीं आ रही है। इसके पीछे की समस्या यह है कि यूरोप के कई देश मिलकर राष्ट्रपति जेलेंस्की को युद्ध के लिए उकसा रहे हैं, जिसकी बजह से राष्ट्रपति जेलेंस्की समझ रहे हैं कि वह अमेरिका पर दवाब बनाने में सफल हो सकते हैं। अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी की सोच है कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने मीडिया का इस्तेमाल कर राष्ट्रपति ट्रंप पर दवाब बनाने का प्रयास किया है। इसी संदर्भ को लेकर उपराष्ट्रपति जे.डी.वांस बिफर गए। इस प्रकरण पर अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी का मानना है कि राष्ट्रपति जेलेंस्की की खराब पक्ष को दुनियां के सामने उजागर करने के लिए यह कूटरचना थी। इस मामले को लेकर शायद कुछ लोग यह भी समझने लगे हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप यूक्रेन का पक्ष छोड़कर रूस का पक्ष ले रहे हैं।
राष्ट्रपति जेलेंस्की का कहना है कि रूस विश्वसनीय नहीं है, रूस यूक्रेन पर 2014, 2020 और 2023 में तीन बार सैन्य हमला कर चुका है। ऐसे में रूस आगे भी अपनी सैन्य आकांक्षा को नहीं दोहराएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी के बिना युद्धविराम समझौता मंजूर नहीं है और यूक्रेन के लिए सुरक्षा गारंटी का मकसद केवल नाटो संधि के आर्टिकल – 5 की सैन्य कवच से यूक्रेन को लैस करना है। अर्थात यूक्रेन के लिए सुरक्षा गारंटी का मतलब नाटो की सदस्यता प्राप्त करना मात्र है, ताकि यूक्रेन अमेरिकी न्यूक्लियर आवरण के अंदर अपने को महफूज कर सके। पूर्व में म्यूनिख की बैठक के बाद ब्रसेल में संपन्न ‘यूक्रेन कॉन्टैक्ट ग्रुप’ की बैठक में अमेरिका के विदेश मंत्री साफ कर चुके हैं कि यूक्रेन अपनी सुरक्षा कवच के तहत अमेरिकी न्यूक्लियर वेपन्स और अमेरिकी सैन्य जवानों की तैनाती यूक्रेन की धरती पर चाहते हैं, जिसमें अमेरिका की रुचि नहीं है। अब सवाल उठता है कि अगर अमेरिका नाटो से निकल जाता है, तो क्या यूरोपीय देशों में इतना दम है, इतनी आर्थिक क्षमता है कि वे इस युद्ध के भार को उठा पायेंगे, यह देखने और समझने वाली बात है। अगर यूरोप इस बोझ को उठा सकता है, तो अमेरिकी रुझान इसे स्वागत करता दिख रहा है।
बताते चले कि इस घटना के बाद अमरीकी लोगों का राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति समर्थन अधिक बढ़ गया है। खासकर अमेरिका में अधिकांश लोग अब कहने लगे हैं कि अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दिए जाने वाला डॉलर राष्ट्रपति जेलेंस्की का दुस्साहस इतना बढ़ा दिया है कि अब वह अमेरिका को अपनी बपौती समझने लगे है। इस परिपेक्ष्य में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के इस व्यवहार को अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति का अपमान के तौर पर देखा जाने लगा हैं। फिर भी गोरे जुडैक ईसाइयों के प्रति मोह ही शायद अमेरिका को नाटो के विस्तार और यूक्रेन के युद्ध तक खींच रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के ही स्टीव बैनन का कहना है कि अमेरिका इराक,अफगानिस्तान, यूक्रेन और फिलिस्तीन के युद्धों के मामलों में करीब 9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च कर चुका हैं और इससे अमेरिका को कुछ नहीं मिला। सच्चाई तो यह है कि इस फिजूलखर्ची के चलते अमेरिका में गरीबी, बेरोजगारी तथा बूढ़े लोगों की देखभाल सरीखे अनेकों समस्यायें बढ़ती जा रही है।
अतः इस घटना के बाद अमेरिका के रुख से लग रहा है कि वह अब यूक्रेन को आगे युद्ध लड़ने के लिए हथियार तथा अन्य सामरिक व वित्तीय सहायता देने वाला नहीं है और अगर यूक्रेन अमेरिका से माफी भी मांगता है, अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाता भी है, तब भी प्रश्नगत खनिज समझौता का स्वरूप अब पूर्ववत रहने वाला नहीं है। इस समझौता के प्राविधान अमेरिका के पक्ष में और मजबूत तथा सख्त होने वाला है।अब इस मसला मेंअमेरिका की रुख और डील दोनों में ही बड़े बदलाव की संभावना दिखने लगी है।


