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फिर जाग उठा राजतंत्र का भूत : कंचना झा

 

कंचना झा, हिमालिनी अंक मार्च 025 । कुछ दिन पहले काठमांडू में हजाराें लोगों ने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन में रैली निकाली, जिसमें राजशाही की वापसी और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग उठाई गई । इस प्रदर्शन में जनता ने जिस तरह भाग लिया उससे ऐसा लगा कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और अस्थिरता के प्रति वो अपना गहरा असंतोष व्यक्त कर रहे थे ।

जिस राजतंत्र को जनता ने एक समय उखाड़ फेंका था, आज वही जनता उसकी वापसी की मांग कर रही है । यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—क्या जनता वास्तव में राजा की वापसी चाहती है, या यह गणतंत्र भी उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, जिसके चलते वे किसी नए विकल्प की तलाश में हैं ? ‘हाम्रो राजा, हाम्रो देश, प्राणभन्दा प्यारो छ’—यह नारा उस दिन भीड़ में गूंज रहा था । अगर इस नारे के पीछे छुपे असली कारणों को गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह भीड़ निराश, आक्रोशित और ठगी हुई जनता की थी । जो हर हाल में बदलाव चाहती है ।

सच्चाई यह है कि जनता किसी विशेष व्यक्ति के समर्थन में नहीं, बल्कि अपनी निराशा और आक्रोश व्यक्त करने के लिए सड़कों पर उतरी थी । उन्हें यह अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि सत्ता में चाहे कोई भी आए, उनके जीवन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला । राजतंत्र की वापसी भी आम नागरिकों के लिए किसी चमत्कारिक समाधान की तरह नहीं होगी । लेकिन मौजूदा सरकार के प्रति जनता में इतना आक्रोश है कि वे किसी भी नए विकल्प को आजमाने के लिए तैयार दिख रहे हैं ।

इस भीड़ का और गहराई से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह राजनीतिक दलों की निष्क्रियता, भ्रष्टाचार और अनैतिक गतिविधियों के खिलाफ एक स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया है । यही वह जनता है, जिसने कभी राजतंत्र को अस्वीकार कर गणतंत्र को अपनाया था, लेकिन आज राजनीतिक अस्थिरता और नेताओं के अनैतिक आचरण ने उन्हें निराश कर दिया है ।
इस भीड़ में शामिल लोग न तो किसी राजा के समर्थक थे, न ही किसी राजनीतिक दल के । ये वे निराश नागरिक थे, जिनकी आंखों में कभी अपने देश के लिए हजारों सपने थे, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता ने उनके सपनों को चूर–चूर कर दिया । इनमें कई ऐसे युवा थे, जो अपने देश में रहकर डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहते थे, देश की सेवा करना चाहते थे, लेकिन राजनीति ने उन्हें केवल निराशा ही दी है । यही कारण है कि आज वे बदलाव की तलाश में हैं ।

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नेपाल की जनता लगातार भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं को देख–सुनकर हताश हो चुकी है । उनमें गहरा आक्रोश है, क्योंकि नेताओं ने केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को तवज्जो दी, आम जनता की समस्याओं की अनदेखी की । इसी बढ़ते असंतोष के चलते जनता अब नए विकल्प तलाश रही है । ज्ञानेंद्र शाह का स्वागत इसी असंतोष की अभिव्यक्ति थी, न कि किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का समर्थन ।
पूर्व राजा के समर्थन में निकली इस भीड़ ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के खिलाफ भी नारे लगाए । प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे का मतलब ही है कि जनता बदलाव चाहती है । इस गणतंत्र में जो सत्ता दल हैं उनसे जनता में राजनीतिक दल प्रति वितृष्णा उत्पन्न हो गई है । जब अति हो गया है तब वह सड़कों पर उतरी है । सच कहें तो ज्ञानेंद्र शाह को भी नहीं मालुम था कि भीड़ इतनी ज्यादा होगी । लोग उनके समर्थन में इस तरह से सड़क पर उतरेंगे ।
इस भीड़ को देखकर सत्तावादी दलों में एक डर तो पैदा हुआ ही है । कहीं न कहीं राजनीतिक दलों में यह डर फैल रही है कि न जाने क्या होगा ? कहीं फिर से राजतंत्र तो वापस नहीं आएगा । आम नागरिकों के बीच भी यह कानाफूसी शुरु हो गई है कि क्या सच में नेपाल में एकबार फिर राजतंत्र स्थापित होगी ? जबाव आता है कुछ नहीं कहा जा सकता है । यह नेपाल है नेपाल में कुछ भी हो सकता है ।
यह बात तो स्पष्ट दिख रही है कि इस भीड़ से सशंकित तो हैं ओली । इसलिए जब अपने खिलाफ नारे को सुना तो इसके जवाब में ओली ने ज्ञानेंद्र शाह को चुनौती देते हुए कहा कि अगर उन्हें सत्ता में आने की इतनी लालसा है, तो वे एक राजनीतिक पार्टी बनाएं और चुनाव लड़ें । प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, प्रचंड ने तो इन गतिविधियों को “नौटंकी” बताते हुए जनता को आगाह किया कि वे इस भुलावे में न आएं । उन्होंने कहा, “आपके आस–पास के लोग आपको उकसा रहे हैं । विदेशी मीडिया में एक–दो तस्वीरें छपने से आपको लगता है कि आप वापस आ सकते हो ? तो सावधान, आपका यह सपना कभी पूरा नहीं होगा ।”
नेपाल और नेपाली जनता को लेकर कुछ लोगों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था असफल हो रही है और नेता जनता की वास्तविक समस्याओं को सुलझाने में नाकाम साबित हो रहे हैं । ऐसे में, लोग अपने अतीत की ओर लौटकर राजतंत्र को एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में देखने लगे हैं । यह एक दिलचस्प विडंबना है कि जिस राजतंत्र को कभी जनता ने अस्वीकार कर दिया था, आज उसी की वापसी की तैयारी चल रही है ।
इस विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है । मीडिया में प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता इस मुद्दे पर लगातार चर्चा कर रहे हैं । ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों का मानना है कि राजशाही के दौरान वर्तमान की तुलना में अधिक स्थिरता और पारदर्शिता थी, भ्रष्टाचार कम था, और इसलिए वे एक बार फिर उसी प्रणाली की ओर लौटना चाहते हैं ।

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लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि जनता ने राजतंत्र से भी मोहभंग होने के बाद ही गणतंत्र को स्वीकार किया था । इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए लोगों ने संघर्ष किया, बलिदान दिए, और वर्षों तक आंदोलन चलाया । क्या जनता इस कठिन संघर्ष को भूल गई है ? क्या वे यह मान बैठे हैं कि राजतंत्र की वापसी से सभी समस्याएं हल हो जाएंगी ?
आज की जनता यह क्यों भूल रही है कि आपके ही माता–पिता ने ज्ञानेन्द्र शाह को नारायणहिटी से हटाने के लिए सड़कों पर प्रदर्शन किया था, उनके ही बेटे–बेटियाँ अब ‘राजा आओ देश बचाओं ‘ का नारा लगाते हुए सड़कों और सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगे हैं । सच है कि जनता में गुस्सा है, आक्रोश है तो आज की राजनीतिक अवस्था से । जिस तरह नेता अपनी बातों से मुकर रहे हैं यह गुस्सा लाजमी भी है ।
इस भीड़ से एक और बात आग की तरह फैली वो थी – ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन में उतरी भीड़ में कुछ लोगों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें अपने हाथ में ली थी । यह मुद्दा नेपाल की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के लिए चिंता का विषय बन गया, और कई नेताओं ने इसे भारत की ओर से राजशाही को समर्थन देने की साजिश करार दिया ।
विसं २०६५ जेठ २९ गते के उस अन्तिम घड़ी को याद करें जब आम नागरिकों राजा को बाध्य कर दिया नारायणहिटी से बाहर निकलने को । याद है न पत्रकार सम्मेलन कर नेपाल सरकार को ज्ञानेन्द्र शाह ने श्रीपेच सौंपा और रानी कोमल को लेकर नारायणहिटी से बाहर निकलें ।

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पत्रकार सम्मेलन के अंत में भी उन्होंने कहा था, “मैंने देश छोड़ने के बारे में सोचा भी नहीं है । मैं अपनी मातृभूमि नेपाल में ही रहकर देश के व्यापक हित और शांति के लिए योगदान देना चाहता हूँ । शाह वंश की विरासत के रूप में रहे श्रीपेच और राजदंड को हमेशा के लिए सुरक्षित रूप से संरक्षित रखने के उद्देश्य से, आज की तिथि से मैंने इसे नेपाल सरकार के जिम्मे सौंप दिया है ।”
अब प्रश्न यह उठता है कि राजा के रूप में किसे देखा जा रहा है ? जिस तरह सड़कों पर उतरकर राजतंत्र की मांग की जा रही है, यदि तत्काल राजा आ भी जाएँ, तो वह ज्ञानेन्द्र शाह होंगे, और उनके बाद पारस शाह ही आएंगे ।
एकबार फिर भीड़ को दिखाकर हम इतिहास बदलने का प्रयास कर रहे हैं । किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि जनसमूह इस कदर सड़क पर उतरेगी । जब सडक पर उम्मीद से ज्यादा लोग दिखे, तो दावा करने वाले समूह भी उसी तरह बढ़ गए । राप्रपा, राप्रपा नेपाल, विभिन्न राजावादी समूहों, दुर्गा प्रसाईं समूह सहित कई संगठनों की वहां उपस्थिति थी । जब सड़क पर उतरी भीड़ ज्यादा दिखने लगी, तब राप्रपा भी आयोजक बन गया । राप्रपा नेपाल और दुर्गा प्रसाईं ने भी अग्रिम पंक्ति में रहकर यह तर्क दिया कि जनता उनकी वजह से ही सड़क पर उतरी है ।

गणतंत्र को लेकर एक ही बात कही जा रही है कि वर्तमान व्यवस्था में, चाहे शासक वर्ग कितना भी खराब क्यों न हो, जनता के पास उन्हें पाँच वर्षों में बदलने का अधिकार और सुविधा है । परिवर्तन प्रकृति का नियम है । परिवर्तन हमेशा कुछ अच्छे के लिए ही होता है तो ऐसे में जनता को यह आशा रखनी चाहिए कि कुछ दिन बाद ही सही नए चेहरे जरुर उभरेंगे, ऐसा व्यक्ति अवश्य उभरेगा जो देश का चेहरा बदल सके ।
नेपाल की जनता आज स्थिर सरकार और मजबूत अर्थव्यवस्था की चाह रखती है । वे राजनीतिक दलों की निष्क्रियता और भ्रष्टाचार से निराश हो चुके हैं । लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अतीत की ओर लौटना ही इसका समाधान है, या फिर जनता को एक नए और अधिक उत्तरदायी नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए ?

कंचना झा
कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन, www.himalini.com

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