हिन्दी सम्पर्क भाषा या मातृभाषा ः महामहिम उपराष्ट्रपति झा
विनय कुमार, मार्च २१ ।
जनगणना में जबतक हिन्दी भाषा मातृभाषा है, यह नहीं लिखवाते हैं तब तक हिन्दी आगे नहीं आ सकती है ।ऐसी अवधारणा महामहिम उपराष्ट्रपति परमानन्द झा की थी । ‘नेपाल में हिन्दी को संवैधानिक मान्यता दिलाने हेतु’ आज शनिवार ७ गते को अन्तराष्ट्रीय हिन्दी परिषद् नेपाल द्वारा आयोजित अन्तरक्रिया कार्यक्रम को सम्बोधन करते हुए उपराष्ट्रपति झा ने हिन्दी के लिए सदभावना पार्टी के योगदान की प्रशंसा की । हिन्दी भाषा को सम्पर्क भाषा या मातृभाषा के रूप में आगे लाना चाहते हैं, इसपर अन्तराष्ट्रीय हिन्दी परिषद नेपाल को आग्रह किया कि एक स्पष्ट अवधारणा के साथ आगे बढ़ें । अन्तराष्ट्रीय हिन्दी परिषद ने नेपाल में हिन्दी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए उपराष्ट्रपति झा के समक्ष आज ज्ञापन पत्र पेश किया । ज्ञापन पत्र प्रस्तुत करते हुए परिषद के अध्यक्ष डा. डम्बरनारायण यादव ने कहा कि कथित राष्ट्रवादियों ने हिन्दी का विरोध किया है और इसपर अन्तरराष्ट्रीय परिषद् कड़ी आपति जताता है । राजनीतिक मित्रों से संसद में भाषा संस्कृति के लिए आवाज को बुलन्द करने के लिए अनुरोध भी किया । हिन्दी एक सनातन जड़ है, सभी साहित्य
संस्कृति से जुड़ी हुई भाषा है अध्यक्ष यादव ने कहा । इसी तरह पूर्वमन्त्री रामेश्वर राय यादव ने कहा कि राष्ट्रीयता से भाषा को नहीं जोड़ना चाहिये । उन्होंने याद करते हुए कहा, धोती, कुर्ता, हिन्दी टोपी की वजह से हमे अपमानित होना पडा था । भाषा की वजह से राष्ट्रीय अखण्डता पर अगर असर पहुंचता है तो वो कैसा राष्ट्र मन्त्री यादव ने प्रश्न भी किया, उन्होंने कहा कि क्या अखण्डता को इतना कमजोर होना चाहिए ? इसी तरह प्राज्ञ उषा ठाकुर ने कहा कि हिन्दी भाषा का विश्व में तीसरा स्थान है, और बहुत जल्द दूसरी भाषा बनने के करीब आ चुकी है कहा । हिन्दी भाषा तोड़ने का नहीं जोड़ने का काम कर रही है । कार्यक्रम में त्रिविवि हिन्दी केन्द्रीय विभागीय प्रमुख डा. श्वेता दीप्ति ने कहा कि हिन्दी के बिना नेपाली इतिहास अधूरा रह जाएगा क्योंकि इतिहास गवाह है कि नेपाल के हर पहलू में हिन्दीप् ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है कहते हुए जोरदार टिप्पणी की । डा. दीप्ति ने कहा कि अगर हिन्दी विदेशी भाषा है तो अँग्रेजी क्या है ? पाश्चात्य संस्कृति हमारी पौर्वात्य संस्कृति पर हावी हो रही है । हिन्दी का विरोध क्यों जबकि वह हमारी संस्कृति और परम्परा को जीवित रखने में सहायक ही है । पाठ्यक्रम में अंग्रेजी को रखने से नेपाली भाषा भी खतरे में है । हिन्दी भाषा सीमा क्षेत्रो में ही नहीं सुदूर क्षेत्रों में भी फैली हुई भाषा है कहा । कार्यक्रम में भारतीय राजदूतावास के मिसन उपप्रमुख पीयुष श्रीवास्तव, पीआइसी के मोहन चन्द्र बहुगुणा की उपस्थिति थी । कार्यक्रम में तमलोपा नेपाल के अध्यक्ष तथा पूर्वमन्त्री महेन्द्र राय यादव, पुर्वमन्त्री विनोद साह की भी उपस्थिति था । डा. रामदयाल राकेश, डा. गंगा प्रसाद अकेला, वरिष्ठ पत्रकार रामाशीष, अब्दुल मोमिन खान ने अपना मंतव्य प्रस्तुत किया । कार्यक्रम में तेजकान्त झा ने कार्यपत्र प्रस्तुत किया । संस्था के विषय के ऊपर डा. विरेन्द्र रौनीयार ने प्रकाश डाला । स्वागत मंतव्य डा. रीना यादव ने किया तो उदघोषण् श्रीमती लक्ष्मी जोशी ने किया । 

