बुद्ध या युद्ध ? : अजय झा
बुद्ध पूर्णिमा विशेष
इस धरापर जब भी कोई बुद्ध होने को सक्रिय होता है,तत्क्षण युद्ध शुरू हो जाता है। लेकिन यह युद्ध आनंद से पूर्ण होता है। प्रेम से लबालब होता है। करुणा से आप्लावित होता है। शांति से आच्छादित रहता है। शीतलता से सराबोर रहता है। जीवंतता से भरपूर होता है। सृजनशीलता में तल्लीन रहता है। वासंती सौंदर्य से सुशोभित रहता है। इस युद्ध में एक अहोभाव सन्निहित रहती है। क्योंकि यह युद्ध बुद्ध होने की कसौटी है। बुद्धत्व प्राप्त करने में सहायक है। एक आत्म निरीक्षण, आत्म मूल्यांकन और प्रतिपल होश तथा जागरण की प्रक्रिया है।
ध्यान रखें, बुद्ध एक ऐसे उत्तुंग शिखर हैं, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखायी नहीं पड़ता। उनका प्रारंभ तो दिखायी पड़ता है, लेकिन उनका अंत दिखायी नहीं पड़ता। और चुकीं शिखर है; तो शिखर पर विराजमान होने के लिए युद्ध स्वाभाविक हो जाता है। भलेही वह युद्ध आंतरिक हो। मानसिक हो।चेतनागत हो। लेकिन होता जरूर है, वह भी निरंतर, अखंड। और यही उनकी महिमा है। बुद्ध कोई धार्मिक शिक्षा नहीं देते। वे मनुष्य में केवल सहजता के भाव को खिलते देखना चाहते हैं। किसी मनुष्य ने आज तक स्वतंत्रता से इतना प्रेम नहीं किया। किसी मनुष्य ने आज तक मानवता से इतना प्रेम नहीं किया। उन्होंने केवल मैत्री भाव को स्वीकार किया। शरीर त्यागने से पहले उनका जो अंतिम वक्तव्य था, “मैं यदि कभी दोबारा लौटा तो तुम्हारा मैत्रेय बन कर लौटूंगा।” मैत्रेय का मतलब होता है मित्र।
बुद्ध का अर्थ है ज्ञान और शांति, जबकि युद्ध का अर्थ है हिंसा और विनाश। बुद्धत्व एक ऐसा मार्ग है जो हमें दुख से मुक्त करता है, जबकि युद्ध एक ऐसी राह है जो दुख को बढ़ाता है। युद्ध के बजाय बुद्ध को चुनना, जीवन में शांति और खुशी लाने का एक मार्ग है। युद्ध हमें दुख और निराशा में धकेल देता है, जबकि बुद्ध हमें शांति और खुशी की ओर ले जाते हैं। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारो, विश्लेषण करो; खोजो, पाओ अपने अनुभव से, तब जाकर भरोसा करना। विश्व के सारे धर्मों गुरुओं ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुसांगिक है। अनुभव होगा, तो श्रद्धा स्वयं उत्पन्न हो जाएगी। इस विश्व चेतना के मंच पर मानवीय चेतना के पूर्ण स्वतंत्रता के लिए बुद्ध अकेले खड़े हैं। ध्यान रहे ! बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति अपने परम रहस्य को नहीं जान सकता।
बुद्ध का सबसे बड़ा योगदान यह है कि : मनुष्य अपनी शाश्वतता, अपनी लौकिक सत्ता को प्राप्त कर सकते हैं अगर हम बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी इच्छा के, और बिना किसी लालसा के शांत बैठ सके, बस अपने होने का आनंद लेते हुए–उस खाली अंतराल में जहां सहस्त्र कमल खिल उठते हैं। गौतम बुद्ध अपने आप में एक श्रेणी है। क्योंकि उन्होंने करुणा पर सर्वाधिक जोर देकर अध्यात्म जगत में अद्वितीय योगदान दिया है। उनसे पहले ध्यान को ही पर्याप्त माना जाता था, किसी ने भी ध्यान के साथ करुणा पर जोर नहीं दिया। और उसका कारण था की ध्यान ही संबोधि घट जाती है, हमारी चेतना खिल उठती है, ध्यान में होना हमारे होने की चरम अभिव्यक्ति है। जहां तक व्यक्ति का सम्बन्ध है, ध्यान पर्याप्त है। गौतम बुद्ध की महानता इस बात में समाहित है कि ध्यान करने से पहले व्यक्ति को करुणा से परिचित कराने का प्रयास किया। हम अधिक प्रेमपूर्ण,अधिक दयावान, अधिक करुणावान हो जाएं। इसके पीछे एक छिपा हुआ विज्ञान है। इससे पहले कि व्यक्ति संबुद्ध हो यदि उसके पास एक करुणा से भरा ह्रदय हो तो संभावना बनती है कि ध्यान के उपरान्त वह दूसरों को वही सौंदर्य, वही ऊंचाई, वही उत्सव जो उसने खुद हासिल किया है, पाने में मदद कर सके। गौतम बुद्ध ने संबोद्धि को संक्रामक बना दिया।
बुद्ध ने पहली बार आत्मज्ञान को निस्वार्थ बनाया; उन्होंने इसे सामाजिक जिम्मेदारी बनाया। यह एक महान परिवर्तन और क्रांतिकारी कदम है। आत्मज्ञान से पहले करुणा को अपनी हृदय में प्रस्फुटित हो जाने दिया जाना चाहिए। अन्यथा आत्मज्ञान के उपरान्त कुछ भी सीखने को शेष नहीं बचता। आत्मानंद के उमंग और उन्माद से भरे हुए व्यक्ति के प्रसन्नता में करुणा बाधा बन जाती है-उसके आनंद में एक प्रकार का विघ्न पड़ जाता है। इसलिए सैकड़ों आत्मज्ञान को उपलब्ध हुए हैं परंतु सद्गुरु बहुत कम हुए। संबुद्ध हो जाने का मतलब जरूरी नहीं कि हम सद्गुरु भी हो गए। सद्गुरु हो जाने का अर्थ यह है कि हम अपनी अनंत करुणा के कारण उस परमशांति के अद्वितीय सौंदर्य में अकेले जाने में संकोच महसूस करते हैं। हम अपने साथ उन्हें भी उस परमानन्द में लिए चलना चाहते हैं जो अन्धकार रूपी दुख में हैं और अपने लिए मार्ग टटोल रहें हैं। उनकी मदद करना आनंददायी है, ना कि कोई बाधा।
गंभीरता से देखा जाए तो बुद्ध ने जीवन का समग्र विश्लेषण दिया। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, और फिर दुबारा कोई न कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए। बुद्ध, धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। हम जानते है कि प्रेम और भाव से भरे लोग परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते हैं। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुंच जाते हैं। लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं, और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गयी है। उंगलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं।
हमें तीन हजार वर्षों का इतिहास ज्ञात है। तीन हजार वर्षों में पाँच हजार युद्ध हुए हैं। जहां तीन हजार वर्षों में मनुष्य ने पांच हजार लड़ाइयां लड़ी हों तो इस जीवन को शांति का जीवन नहीं कहा जा सकता, नहीं सभ्य जीवन ही कहा जा सकता है। वल्कि आदिम जंगली बर्बर जीवन शैली कहा जा सकता है। वास्तव में हमने कोई शांति काल जाना नहीं क्योंकि हमने लड़ना ही सीखा है। ईर्ष्या और क्रोध हमारा आदर्श है , यह हमारा जन्मजात संस्कार है, यही हमारी पुस्तैनी परंपरा है, धरोहर है।
हम दो हिस्सों में मनुष्य के इतिहास को बांट सकते हैं- पहला युद्ध का समय, और दूसरा युद्ध के लिए तैयारी का समय। अर्थात् शीत युद्ध। शांति का कोई समय, कोई खंड अभी तक ज्ञात नहीं है। मनुष्य अभितक मनुष्यता को उपलब्ध नहीं हो सका है। निश्चित ही, कोई बहुत गहरी विक्षिप्तता, कोई बहुत गहरा पागलपन मनुष्य को पकड़े हुए है। अतः अविलंब हमें कोई रास्ता खोज लेना जरूरी है। पुरानी लड़ाइयां बहुत छोटी लड़ाइयां थीं और उनके बाद भी हम बचते चले आए हैं। लेकिन अब शायद जो युद्ध होगा, उसमें मनुष्य को बचने का भी कोई उपाय न हो। अलबर्ट आइंस्टीन से मरने के पहले किसी ने पूछा, तीसरा महायुद्ध में किन शस्त्रों का उपयोग होगा? आइंस्टीन ने कहाः तीसरे के प्रति कहना कठिन है, लेकिन चैथे के संबंध में कहा जा सकता है। पूछने वाला हैरान हुआ। उसने पूछा चैथे में किन शस्त्रों का उपयोग होगा? अगर मनुष्य बचा रहा-क्योंकि बचने की कोई संभावना नहीं है, तो फिर से पत्थर के हथियारों से लड़ाई शुरू करनी पड़ेगी। चूंकि तीसरा महायुद्ध, बहुत संभावना इस बात की है कि सारी मनुष्य-जाति को ही नहीं, बल्कि समस्त जीवन मात्र को समाप्त कर दे। पिछले महायुद्ध में पांच करोड़ लोगों की हत्या हुई। पांच करोड़ लोग छोटी संख्या नहीं है। दोनों पिछले युद्धों में मिला कर दस करोड़ लोग मारे गए। शायद हमें खयाल भी नहीं है कि इन दस करोड़ लोगों की हत्या करने में हमारा भी हाथ है। हम जो यहां बैठे हैं, हम जिम्मेवार है। कोई भी मनुष्य इस जिम्मेवारी और उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। जो भी जमीन पर हो रहा है, उस सब में हमारे हाथ हैं। आज भी हम रूस यूक्रेन युद्ध में अपनी अपनी सहभागिता जता रहे हैं। हर व्यक्ति किसी न किसी पक्ष में खड़ा है। कोई हमास को समर्थन करता है तो कोई इजरायल को। कोई पाकिस्तान को तो कोई भारत को। कोई चीन को तो कोई ताइवान को। अनेक आतंकी संगठनों का निर्माण किया गया है। उसका पालन पोषण अनेक देशों के सरकार करती है।अनेक रूपों में जेहाद का खूनी खेल खेला जा रहा है। धर्म और व्यापार के नाम पर आतंकवादी विचार धाराओं को संपोषित किया जा रहा है। और प्रयास मानव के विनाश पर केंद्रित है। किसने कितने को मारा ? यह पौरुषता का प्रतीक बन गया है। रक्षा के नाम पर युद्ध , धर्म के नामपर युद्ध, बोट के नामपर युद्ध, सत्ता के नामपर युद्ध, क्षेत्र के लिए युद्ध, भाषा के नामपर युद्ध, सम्पत्ति के लिए युद्ध; बस, युद्ध ही युद्ध! अरे, जब लड़ना ही है, मरना और मारना ही है तो जन्म लिए क्यों? क्या इतने गिरे हुए हो? पशु भी विशेष अवस्था में ही युद्ध करता है लेकिन तुम आधुनिक भेड़ मानव ; तुम तो कीड़े मकोड़े से भी तुच्छ हो। धिक्कार है तुम्हारी शिक्षा और संस्कार पर!
आधुनिक शिक्षा के नामपर हमारी तैयारी उन्नीस सौ पैंतालीस में हिरोशिमा और नागासाकी पर जो अणु बम गिराकर एक लाख के करीब मानवों के जीवन को नष्ट कर दिया । इधर अस्सी वर्षों में जो विकास हुआ है वह हिरोशिमा पर जो बम गिराया गया था, आज वह बच्चों के खिलौनों से ज्यादा नहीं है। अब हमारे पास इतने शक्तिशाली बम हैं कि चालीस हजार वर्ग मील घेरे के समस्त जीवन को नष्ट कर सकता है। और ऐसे उदजन बमों की संख्या लाखों में है। इस पृथ्वी के एक एक व्यक्ति को हजार बार मारा जा सकता है इतनी बम तैयार है।
आज मनुष्य का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ हत्या हिंसा पर केंद्रित है। सबसे बड़ी भूल यह है कि हम युद्ध का समाधान राजनीति से खोज रहे हैं। जबकि राजनीति स्थायी रूप से विश्व में शांति लाने में असमर्थ है। इसलिए असमर्थ है कि राजनीति मूलतः आकांक्षा है, एम्बीशन है। जहां राजनीति है, वहां दूसरे से आगे निकलने की होड़ है। प्रतिद्वंद्विता है और जहां आगे निकलने की दौड़ है, वहां आज नहीं कल, युद्ध अवश्यंभावी है। जब एक राष्ट दूसरे राष्ट्र से आगे निकलना चाहे, एक राष्ट्र से ऊपर निकलना चाहे तो अंत में युद्ध आ जाना स्वाभाविक है।
हम सारे लोग, जो मनुष्य के भविष्य के लिए विचार करते हों और जिनके मन में यह खयाल आता हो कि जीवन को बचाना और सुरक्षित करना आवश्यक है, उन्हें कुछ बातों पर विचार करना होगा। सबसे पहली बात तो यह विचार करनी होगी कि हम जो व्यक्ति गत रूप से छोटी छोटी बातों में लड़ते हैं और संघर्ष करते हैं। कहीं वही संघर्ष, कहीं वही लड़ाई अंततः बड़े पैमाने पर राष्ट्रों का युद्ध तो नहीं बन जाती है? कोई राजनीतिक, कोई समाज सुधारक मूलतः अंतर नहीं ला सकेगा, अगर व्यक्तियों के चित्त इस बात को समझने में समर्थ न हो जाए कि उनके भीतर जब तक द्वंद्व है, जब तक संघर्ष है, जब तक प्रतियोगिता है, एंबीशन है, महत्वाकांक्षा है, तब तक मनुष्य-जाति युद्ध से मुक्त नहीं हो सकती।
ओशो कहते हैं,” मनुष्य के हृदय में युद्ध का मूल कारण क्या है? यह तो आपने अनुभव किया होगा कि विनाश में हम सबकी उत्सुकता है। रास्ते पर कोई आदमी किसी को छुरा मार दे तो हम हजार महत्वपूर्ण काम छोड़कर उसे देखने को खड़े हो जाते हैं। क्यों? रास्ते पर कोई लड़ रहा हो, हम हजार महत्वपूर्ण काम छोड़ कर उसे देखने को रुक जाते हैं। लोग सुबह से ही अखबार और रेडियो की प्रतीक्षा करते हैं और युद्ध के समाचार पढ़कर उनकी आंखों में चमक आ जाती है। जब युद्ध चलता है तो लोगों में बड़ा उत्साह और बड़ी ताजगी और बड़ी चहल-पहल और बड़ी गति मालूम होती है। उनमें बड़ी जिंदगी मालूम होती है। और जब युद्ध शांत हो जात है, लोग फिर बोझिल हो जाते हैं, फिर उदास हो जाते हैं, फिर ढीले मन चलने लगते हैं। क्या आपको यह पता है, जब पहला महायुद्ध हुआ, तो मनोवैज्ञानिक बहुत परेशान हुए। पहला महायुद्ध जितने दिनों तक चला उतने दिन तक युरोप में चोरियां कम हो गई, हत्याएं कम हो गई, आत्महत्याएं कम हो गई, लोग कम पागल हुए। हैरानी की बात है। मनोवैज्ञानिक समझ नहीं पाए कि इसका क्या कारण है? फिर महायुद्ध हुआ। तब तो और बड़े पैमाने पर यह हुआ। हत्याओं की संख्या एकदम कम हो गई आत्महत्याओं की संख्या कम हो गई। लोगों ने युद्ध के समय में पागल होना बंद कर दिया। कम लोग पागल हुए। और क्यों? लोग इतने उत्साहित हो गए, लोग इतने आनंदित हो गए कि उन्हें हत्या करने की जरूरत नहीं पड़ी, आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ी। ऊब और बोर्डम कम हो गई। उदासी कम हो गई, लोग प्रफुल्लित थे। युद्ध ऐसी क्या प्रफुल्लता लाता है? अगर युद्ध इतनी प्रफुल्लता लाता है तो उसका अर्थ है, हमारे भीतर, हमारे मन में युद्ध की कहीं चाह होगी। हम कहीं चाहते होंगे। हमारे भीतर कहीं कोई आकांक्षा होगी, जिससे युद्ध पैदा होता है और अगर सतत युद्ध चलता रहे तो हम बहुत प्रसन्न हो जाएंगे। यह बात अपने खयाल से आप निकाल दें कि युद्ध से आप उदास हो जाते हैं। आप खुद विचार करें–अभी हिंदुस्तान और पाकिस्तान की लड़ाइयां चलीं, तो आप खयाल करें, आप ज्यादा प्रसन्न थे। आप ज्यादा प्रफुल्लित थे, आप ज्यादा ताजगी से भरे थे। आप खबरों के लिए बड़े आतुर थे। आपकी जिंदगी में एक रस मालूम हो रहा था। क्यों? कुछ कारण है। जो मनुष्य सामान्य जीवन से ऊबा हुआ है, वह मनुष्य युद्ध को चाहेगा, हिंसा को चाहेगा। बोर्डम जो हमारे जीवन की है, रोज सुबह से सांझ तक हमारे जीवन में न तो कोई रस है, न तो कोई आनंद है, न कोई प्रसन्नता है। जब तक कोई संशेसनल,जब तक कि कोई बहुत तीव्र संवेदना करने वाली बात न घट जाए, हमारे जीवन में कोई प्रफुल्लता, कोई जिंदगी नहीं आती।” केवल वही मनुष्य का समाज युद्ध से बच सकता है, जो मनुष्य का समाज अत्यधिक आनंदित और प्रफुल्लित हो। जो आदमी आनंदित होता है वह दूसरे को आनंद देने में आनंद अनुभव करता है। जो हमारे पास होता है, उस पे निर्भर होता है, हम दूसरे के साथ क्या करेंगे।
अगर आप प्रफुल्लित और आनंदित हैं, अगर आप अपने जीवन में चैबीस घंटे खुशी बिखेर रहे हैं, फूल बिखेर रहे हैं, खुशबू और सुगंध बिखेर रहे हैं तो आप बुद्ध के पक्ष में और युद्ध के विपक्ष में काम कर रहे हैं। आप एक ऐसी दुनिया को बनाने के काम में लगे हुए हैं, जहां युद्ध नहीं बुद्ध पैदा होंगे। अगर दुनिया में अधिक लोग खुश हो तो युद्ध असंभव हो जाएगा। युद्ध को रोकने के लिए और कोई रास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि दुनिया में आनंद की गहरी पर्ते बिखेरी जाएं। हमारी प्राणों से आनंद उठना चाहिए। लेकिन मेरे प्राण तो उदास और अंधकार में डूबे हुए हैं। उससे आनंद कैसे उठेगा? जरूर कोई रास्ता है कि सारा जीवन आनंद का एक संगीत हो जाए, एक गीत हो जाए और प्राणों की धड़कनें निरंतर सतत एक अपूर्व आनंद में धड़कने लगें। रास्ता है। मार्ग है। कुछ लोगों ने इसी जीवन में वैसे आनंद को उपलब्ध किया है। और तब फिर–तब फिर उनके जीवन से जो प्रकट हुआ प्रेम, उनके जीवन से जो प्रकट हुई अहिंसा, उसके वे आधार रखे हैं, जिससे मनुष्य का-नये मनुष्य का जन्म हो सके।
कुछ निर्मित करें, कुछ बनाएं, जो आपसे बड़ा हो। आपका जीवन केवल समय का गुजरना न हो, बल्कि एक सृजन हो। वह सृजन चाहे छोटा सा क्यों न हो, वह आपके प्रेम का कृत्य हो। जो लोग जीवन में सृजनात्मक हो जाते हैं, जो लोग भी जीवन में छोटे से प्रेम के कृत्य को निर्माण दे पाते हैं, उनके प्राण आह्लादित हो उठते हैं, वे आनंद से भर जाते हैं। फिर वह आनंद ऊपर से थोपा हुआ नहीं होगा। फिर वह आनंद उनके प्राणों के अंतिम केंद्र से उठता है, फिर उनके प्राणों के केंद्र से उठता है और उनके सारे जीवन का भर देता है। जो व्यक्ति निर्मित करने में संलग्न हो, सृजन कर पाए, तो सुख बाई प्रोडक्ट है सृजन की। सुख सीधा नहीं मिलता। आनंद सीधा उपलब्ध नहीं होता। जो सृजन करता है, उसे उपलब्ध होता है। जो सृजन के बीज बोता है, उसे आनंद के फूल उपलब्ध होते हैं। कभी सृजन का कोई काम करके देखें,
तो ध्यान रखें ,यदि आप दुखी हैं तो दुनिया से हिंसा का अंत नहीं होगा। आपका आनंदित होना जरूरी है। अगर आप आनंदित होना चाहते हैं तो आपका सृजनात्मक होना जरूरी है और अगर आप सृजनात्मक होना चाहते हैं तो आपका अहंकार शून्य होना जरूरी है। आपको यह जो खयाल हमारे भीतर पैदा हुआ है कि मैं कुछ हूं, यह भ्रम टूट जाना चाहिए। और अहंकार को विगलित करने के लिए ध्यान आवश्यक है। अर्थात् बुद्धम शरणम् गच्छामि!

