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डॉ. स्वर्णिम वाग्ले के संसदीय भाषण की आलोचनात्मक समीक्षा: एक सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य : राकेश मिश्रा का स्टेटस

 

काठमांडू । मैंने डॉ. स्वर्णिम वाग्ले का संसद में दिया गया विचारोत्तेजक भाषण बड़े ध्यान से सुना। संसद में गंभीर विमर्श की उनकी कोशिश सराहनीय है।

डॉ. वाग्ले का तर्क है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवा वितरण की कमजोर स्थिति का कारण “एलीट का पलायन” (elite exit) है—यानी जब प्रभुत्वशाली वर्ग इन सेवाओं पर निर्भर नहीं रहता या उनसे कट जाता है। वे यह भी सुझाव देते हैं कि राज्य को “संस्थान” (institution) की बजाय एक “संगठन” (organization) के रूप में पुनः कल्पना करना चाहिए, जिससे उसकी क्रियान्वयन क्षमता बेहतर हो सके। हालांकि यह विचार सहज रूप से आकर्षक लग सकता है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से यह अपूर्ण और कुछ हद तक विरोधाभासी है, खासकर उस परिप्रेक्ष्य में जिसमें ‘एलीट कैप्चर’ (elite capture) की भूमिका अहम है—जिसे वाग्ले के तर्क में पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया है। राज्य को “संगठन” मानने के तर्क पर मैं आगे चर्चा करूंगा।

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वाग्ले का यह दावा कि एलीट का पलायन सार्वजनिक सेवा को कमजोर करता है, इस धारणा पर आधारित है कि अगर प्रभुत्वशाली वर्ग इन सेवाओं में शामिल रहता है, तो उनकी गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है। यह धारणा सैद्धांतिक रूप से कमजोर है। पब्लिक चॉइस थ्योरी और इंस्टीट्यूशनल इकॉनॉमिक्स जैसे सिद्धांत यह दिखाते हैं कि जब एलीट सार्वजनिक सेवाओं में शामिल होते हैं, तो वे अक्सर अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे संसाधनों का आवंटन और नीतियों का निर्माण उनके लाभ के अनुरूप हो जाता है।

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ऐसे संदर्भों में, जहां ‘एलीट कैप्चर’ की स्थिति होती है—जहां शक्तिशाली वर्ग निजी लाभ के लिए राज्य के निर्णयों पर हावी रहते हैं—वहां एलीट की सार्वजनिक सेवाओं में भागीदारी असमानता को और गहरा कर सकती है। उदाहरण के लिए, दक्षिण एशिया में शिक्षा पर हुए अध्ययन यह दिखाते हैं कि जब एलीट वर्ग सार्वजनिक स्कूलों में शामिल होता है, तो शहरी और संपन्न वर्गों की संस्थाओं को disproportionate फंडिंग मिलती है, जबकि ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग उपेक्षित रह जाते हैं।

दूसरी ओर, सैद्धांतिक रूप से यह भी संभव है कि एलीट के बाहर निकलने से सार्वजनिक सेवाओं पर गैर-एलीट समुदायों की निर्भरता बढ़े और उनके प्रति जवाबदेही की मांग भी बढ़े। वाग्ले का तर्क इस संभावित परिकल्पना की अनदेखी करता है और इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं देता कि एलीट के पलायन से सेवा स्तर में गिरावट आई है। जब तक ऐसे प्रमाण नहीं दिए जाते, यह तर्क सिर्फ एक अनुमान बना रहता है और उन वैकल्पिक कारणों को नजरअंदाज करता है—जैसे कि लगातार धन की कमी, नौकरशाही की अक्षमता या राजनीतिक संरक्षकवाद (clientelism)—जो विकासशील देशों में सार्वजनिक सेवा की विफलता के बेहतर ज्ञात कारण हैं। राकेश मिश्रा का स्टेटस  से

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