नेपाल का सागरमाथा.. चीन का चोमोलूँगमा क्यो ? : ललित झा
ललित झा, जनकपुरधाम । वैसे तो पांच वर्षों की लम्बी प्रतिक्षा और अथक प्रयास के बाद नेपाल सरकार द्वारा काठमांडू मे 16-18 मई 2025 के बीच आयोजित सागरमाथा संवाद सफलतापूर्वक संपन्न हो गया । सागरमाथा संवाद का आयोजन भूराजनीतिक दृष्टिकोण से नेपाल सरकार का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम था जिसमे देश दुनियाँ के काफी महत्वपूर्ण लोग शामिल हुये । तीन दिन तक चले सागरमाथा संवाद मे भारत चीन ब्रिटेन जापान भूटान बांग्लादेश कतार पाकिस्तान तथा यूनाइटेड अरब अमीरात के अलावे दर्जनों अन्य देशों के सरकारी गैर सरकारी प्रतिनिधिमंडल ने भाग लिया । सागरमाथा संवाद नेपाल सरकार द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम था जिसके माध्यम से नेपाल का उदेश्य पुरे विश्व को संदेश देना था । इसके भव्य आयोजन के पीछे नेपाल का मुख्यतः दो प्राथमिक उद्देश्य था-
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1,नेपाल सरकार यह चाहती है कि पर्वतराज हिमालय के सर्वोच्च शिखर जिसे दुनियाँ माउंट एवरेस्ट के नाम से जानती है उसे दुनियाँ उसके नेपाली नाम ” सागरमाथा ” के नाम से पहचाने साथ ही यह भी जाने की सागरमाथा नेपाल में है और यह नेपाल का है । ऐसा कहा जा रहा है कि इसके पीछे प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली भी काफी दिलचस्पी ले रहे थे क्योंकि उनकी भी इच्छा यही है कि हिमालय के सर्वोच्च शिखर को दुनियाँ सागरमाथा के नाम से पहचाने । हाल ही मे ओली जी ने दुनियाँ से अपील भी किया था कि माउंट एवरेस्ट को उसके नेपाली नाम सागरमाथा से जाना जाय ।
2. सागर माथा संवाद का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य इसका विषय- जलवायु परिवर्तन, पहाड़ तथा मानवता का भविष्य था इसके माध्यम से नेपाल जलवायु परिवर्तन का पहाड़ी ईकोसिस्टम तथा मानव समाज पर इसके विनाशकारी प्रभाव को वैश्विक पटल पर विमर्श के केंद्र में लाना था लेकिन सागरमाथा संवाद मे हिस्सा लेने आये चिनियाँ प्रतिनिधिमंडल ने नेपाल के इस उद्देश्य पर पानी फेर दिया
वस्तुतः हुआ यह है कि सागरमाथा संवाद मे भाग लेने चीन के नेशनल पीपुल कांग्रेस के स्टैंडिंग कमिटी के उपाध्यक्ष शिआओ जी के नेतृत्व में एक उच्च स्तरिय प्रतिनिधिमंडल नेपाल आया था । सागरमाथा संवाद के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए चिनियाँ प्रतिनिधिमंडल के नेता शिआओ जी ने, नेपाल के प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री के समक्ष ही, नेपाल के उद्देश्यों पर पानी फेरते हुए सागरमाथा को “चोमोलुंगमा” कह दिया l ऐसा नहीं है कि शिआओ जी ने भूलवश ऐसा कह दिया हो बल्कि लगभग बीस मिनट के अपने संबोधन में उन्होंने दस बार चोमोलुंगमा शब्द का प्रयोग किया । हैरानी की बात यह है कि अपने संबोधन में उसने एक बार भी सागरमाथा शब्द का प्रयोग नही किया और बार बार नेपाल के प्रधानमंत्री के सामने ही सागरमाथा को चोमोलुंगमा नाम से संबोधित करता रहा तथा नेपाल के उद्देश्यों और इच्छाओ का मजाक उड़ाता रहा
विश्व कूटनीति के इतिहास में ऐसी घटना शायद कम ही देखने को मिलती है जब एक मित्र राष्ट्र द्वारा अपने मेजबान देश के भावनाओ का उपहास उड़ाते हुए इसके उद्देश्यों पर पानी फेरने का प्रयास किया गया हो । जानकारों के अनुसार चिनियाँ प्रतिनिधिमंडल द्वारा सागरमाथा को चोमोलूँगमा कहना, नेपाल के उद्देश्यों पर न सिर्फ पानी फेरने का प्रयास है बल्कि सागरमाथा के स्वामित्व पर भी उसने प्रश्न उठा दिया है वह भी नेपाल में आकर ।
चीन ने ऐसा क्यों किया– कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार चीन ने ऐसा बिल्कुल सोच समझकर एक तय रणनीति के तहत किया है । चीन के इस कदम का उद्देश्य भूराजनीतिक है जो स्पष्ट रूप से नेपाल समेत संपूर्ण विश्व को यह संकेत दे रहा है कि हिमालय का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट सागरमाथा नही बल्कि चोमोलूँगमा है जिस पर चीन का आधिपत्य है । 
भूराजनीतिक जानकारों के अनुसार चीन की यह पुरानी आदत है, वह पहले भी ऐसा करता रहा है खासकर भारत के संदर्भ में l भारत के अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानों का नाम चीन अपने स्तर से बदल देता है और कोई चीनी नाम रख देता है । किसी दूसरे देश के स्थानों का चीनी नामकरण के पीछे बीजिंग का स्पष्ट उद्देश्य होता है उस स्थान पर चीन का दावा करना ।
दरअसल चीन नामकरण कूटनीति का सहारा लेकर अपने भूराजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहता है, चिनियाँ कूटनीति की यह पुरानी चाल है लेकिन नेपाल के लिए यह बिल्कुल नया कुटनीतिक चाल है जिसका संदेश और संकेत दोनों काफी गंभीर है । पूर्व मे भी नेपाल और चीन के बीच सागरमाथा के स्वामित्व को लेकर कुछ विवाद रहा है लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच इस मसले को लेकर कभी कोई मतभेद सामने नही आया था । सन् 1960 मे सीमा समझौता सम्पन्न होने के बाद दोनों देश शांति एवं मैत्री की राह पर करीब हो रहे थे । सी जिनपिंग के विशेष पहल पर 2017 में, नेपाल चीन के बीच हुए एक समझौता के तहत नेपाल, चीन के अति महत्वाकांक्षी भूराजनीतिक परियोजना B. R. I. ( Belt and road initiative) का सदस्य बना था जिसका काफी विरोध भी हुआ था । चीन के राष्ट्रपति ने कई अवसरों पर नेपाल को अपना सदाबहार दोस्त कहा है । आज राजनीति से लेकर सामाजिक सांस्कृतिक तथा भू राजनीतिक क्षेत्रों तक, नेपाल के हर क्षेत्र में चीन अपनी मजबूत उपस्थिति बना चूका है । नेपाल की सरकार भी चिनियाँ हितों को नेपाल में सर्वोच्च प्राथमिता देती रही है और भारत के प्रभाव को संतुलित करने के नाम पर चीन के साथ कई समझौते पर हस्ताक्षर किये है । नेपाल सरकार अपनी एक चीन नीति का हमेशा बखान करती रही है ऐसे में चीन द्वारा सागरमाथा को लेकर की गयी यह हरकत नेपाल के लिए किसी धोख़ा से कम नही है ।
दरअसल कूटनीतिक दृष्टिकोण से चीन ने नेपाल को धोख़ा दिया है और ओली जी के नेतृत्व वाली सरकार पर दबाव डालने के लिए अथवा सौदेवाजी करने के लिए एक षडयंत्र रच रहा है । चीन मामलों के जानकारों के अनुसार, चीन, नेपाल सरकार को अपने प्रभाव में लेकर येन केन प्रकारेन, कुछ ऐसा समझौता करना चाहता है जिससे नेपाल को चीन के भूराजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति का केन्द्र बनाया जा सके । नेपाल को चीन पर निर्भर बनाया जा सके ।
सागरमाथा संवाद मे जो कुछ भी हुआ है वह नेपाल में चीन के बहुआयामिक षडयंत्र का एक हिस्सा है । वह दबाब की कूटनीति का प्रयोग कर, नेपाल को अपने भारत विरोधी भूराजनीतिक भूआर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बनाना चाहता है पर हैरानी की बात ये है कि अब तक नेपाल द्वारा शिआओ जी के इस कूटनीतिक अमर्यादा पर कोई विरोध दर्ज नही कराया गया है और न ही विदेश मंत्रालय द्वारा कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर चीन के इस कदम का विरोध किया गया है । कहने को तो ओली जी की इस सरकार को लोग अतिराष्ट्रवादी सरकार मानती है लेकिन चीन के सामने उनका यह नेपाली राष्ट्रवाद यूँ खामोश क्यों है ? यह समझ से परे है । सिंहदरवार से लेकर विदेश मंत्रालय तक.. सभी जगह खामोशी है । छोटे छोटे विषयों पर नेपाली राष्ट्रवाद की दुहाई देनेवाला नेपाली मीडिया,तथाकथित राष्ट्रवादी स्तंभकार और राष्ट्रवादी अभियानी सभी खामोश है । कोई कुछ नही बोल रहा, ऐसा लगता हैं जैसे सभी बीजिंग के दबाव में हों ।
दोस्ती के संदर्भ में एक प्रसिद्ध चीनी कहावत है जिसे नेपाल के नीति निर्माताओं को समझना आवश्यक है । “चीन के लोग या तो सिर्फ अपने आप से दोस्ती करते हैं या फिर अपना स्वार्थ देखकर अन्यथा वह दोस्ती नही, दोस्ती का ढोंग करते हैं ” इस प्रसिद्ध चीनी कहावत के आलोक में तो चीन नेपाल के साथ दोस्ती नही बल्कि दोस्ती का ढोंग करता हुआ प्रतीत होता है और छद्म दोस्ती के इस दलदल में नेपाल धीरे धीरे फंसता जा रहा है । नेपाल सरकार तथा विदेश नीति निर्माताओं को चीन के इस कूटनीतिक षडयंत्र के प्रति समय रहते सावधान हो जाना चाहिए अन्यथा चीन की दोस्ती में जो हश्र श्रीलंका और मालदीव का हुआ है वही हश्र नेपाल का भी न कर दे चीन ?
इस संदर्भ में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम नही उजागर करने की शर्त पर यह बताया कि सागरमाथा संवाद मे चीन के करतुत को हमने नोटिस किया है लेकिन अभी हम इस पर कुछ नही कह सकते । तो इसका मतलब नेपाल में सरकार ने चीन को कुछ भी करने कहने का छुट दे रखा है चाहे वह नेपाल के राष्ट्रीय हित के विरुद्ध ही क्यों न हो ? कालापानी लीपुलेक् के मुद्दे पर जमीन आसमान एक करने वाले राष्ट्रवादी आज खामोश क्यों है ? सागरमाथा संवाद के उद्घाटन सत्र के भरी सभा में चीन ने सागरमाथा को चोमोलूँगमा कहा, एक नही दस बार कहा फिर भी प्रधानमंत्री ओली विदेश मंत्री आरजू राणा, वित्त मंत्री विष्णु पौडेल सभी खामोश रहे । नेपाल के राष्ट्रीय हितों का चीर हरण होता रहा लेकिन किसी ने भी चीनी हरकतों का प्रतिवाद नही किया । ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर वह कौन सा कारण है जो ओली सरकार को खामोश रखा है ? क्या नेपाल का तथाकथित् राष्ट्रवाद सिर्फ भारत का विरोध करने के लिए होता है ? खैर सच जो भी हो.. आम चुनाव भले अभी दूर हो मगर नेपाल को चीन के इस कदम का विरोध करना चाहिए ।

राजनीतिक संपादक, हिमालिनी


