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श्री महाश्रमण जी की नेपाल यात्रा नेपाल में सुख और शांति लाएगी

ashok baidya
 

अध्यात्म के शिखर पुरुष आचार्य श्री महाश्रमण की नेपाल अहिंसा यात्रा के सम्बन्ध में श्री अशोक वैद्य जी से हिमालिनी के लिए कविता दास से हुई बातचीत का संपादित अंश ः
० दिनांक ०२–०४–२०१५ से शुरु हो रही नेपाल अहिंसा यात्रा पर थोड़ा प्रकाश डालें !
—जब–जब मानवता ह्रास की ओर बढ़ने लगती है, नैतिकता का पतन होने लगता है, समाज में पारस्परिक संघर्ष की स्थिति बनने लगती है, तब

ashok baidya
श्री अशोक वैद्य

तब इस वसुधा पर कोई ना कोई पुरुष का अवतरण होता रहा है । जो अपने कर्तव्य, पुरुषार्थ और तेजोमय शौर्य से मानव मन को झंकृत करता है और उसमें चेतना का प्रवाह करता है । भगवान महावीर हों या गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द हों या महात्मा गाँधी, गुरुदेव तुलसी हो या आचार्य महाप्रज्ञ । समय समय पर एसे अनेक महापुरुषों ने समाज–कल्याण और जन–कल्याण का काम किया है । भटके हुए का मार्गदर्शन कराया है । महापुरुषों की इसी महिमामयी श्रृंखला में एक तेजोदीप्त नाम है आचार्य श्री महाश्रमण ।
नेपाल की पावन धरती को यह परम सौभाग्य हासिल हुआ है कि तेरापंथ धर्मसंथ के ११वें अनुशास्त आचार्य श्री महाश्रमण का आगमन यहाँ होने जा रहा है ।
स्वकल्याण और परकल्याण के संकल्प के साथ ३०,००० से अधिक किलोमीटर से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले आचार्य श्री महाश्रमण अहिंसा के द्वारा जनमानस को उत्प्रेरित कर मानवता के समुत्थान का पथ प्रशस्त कर रहे हैं । अहिंसा यात्रा हृदय परिवर्तन के द्वारा अंधकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान का अभियान है । यह यात्रा कुरीतियों में जकड़ी जनता और तनावग्रस्त शहरी लोगों के लिए वरदान है । जाति सम्प्रदाय, वर्ग और राष्ट्र की सीमाओं से परे इस यात्रा ने बच्चों, युवाओ. और वृद्धों के लिए अत्यन्त उपयोगी रहा । लोगों में एक नवीन उत्साह और उम्मीद का संचार होगा ऐसा मेरा विश्वास है
० इस यात्रा का उद्देश्य क्या है ?
– अहिंसा यात्रा का उद्देश्य जनकल्याण हेतु है । इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं—
सद्भावना का संप्रसार, नैतिकता का प्रचार प्रसार और नशामुक्ति का अभियान ।
किसी भी समाज में अगर ये तीन पक्ष सुदृढ़ हों तो उस समाज का स्वरूप खुद ब खुद बदल जाएगा । आज मानव मन में एक दूसरे के लिए इष्र्या, और कलुषता का भाव घर कर गया है । आपसी भाईचारा और सद्भाव की भावना में कमी आ गई है । और जब तक मानव मन में सद्भाव की भावाना नहीं होगी तब तक उसके मन में अहिंसा का भाव भी जाग्रत नहीं हो पाएगा । आपसी टकराव दूरियाँ ही नहीं बढ़ाता बल्कि वह किसी भी समाज के विकास में बाधक भी सिद्ध होता है । जाति, भाषा, वर्ण व क्षेत्र का दुराग्रह, साम्प्रदायिक उन्माद, तुच्छ स्वार्थपवृत्रि और विकृत मानसिकता पारस्परिक असद्भाव के कारण बनते हैं ।
उसी तरह बेइमानी सामाजिक स्वस्थता का बाधक तत्व है और यह तभी होता है जब व्यक्ति में नैतिकता का पतन हो जाता है । जब तक धोखा, बेइमानी और हिंसा का क्रम जारी रहेगा, कोई भी व्यक्ति सुख और शांति की साँसें नहीं ले सकता है । आज के युग में अनैतिकता एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रही है । चोरी ना करना, मिलावट ना करना, रिश्वत ना लेना, चुनाव और परीक्षा के दौरान अवैध उपायों का सहारा ना ले जैसे संकल्प अगर हर इंसान ले ले तो समाज का परिदृश्य ही बदल जाएगा लोग स्वयं सुख का अनुभव करने लगेंगे । आचार्य श्री अहिंसा यात्रा के द्वारा जन जीवन में नैतिकता को प्रतिष्ठित करने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं ।
समाज का एक सबसे दुखद पहलू है नशा जिसके चपेट में आकर युवा पीढ़ी पतन के गर्त में गिरती जा रही है । नशा एक ऐसी बुराई है जिसने अच्छे अच्छों को अर्श से फर्श पर ला दिया है । लाखों लोगों को हृदय परिवर्तन के द्वारा नशामुक्त बनाने वाले आचार्य महाश्रमण की अहिंसा यात्रा के दौरान नशामुक्ति का अभियान निरन्तर गतिमान है आचार्यश्री का मानना है कि नशा पतन के मुख्य कारणों में एक है । शारीरिक, मानसिक, व्यावसायिक, पारिवारिक, सामाजिक आदि अनेक नुकसान नशे से होते हैं । इसलिए इस बुराई के उन्मूलन में भी यह यात्रा अपना महत्व जरूर स्थापित करेगी ।
इस अहिंसा यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई है ?
– इस यात्रा का शुभारम्भ भारत की राजधानी दिल्ली से ९ नवम्बर २०१४ को हुआ । यह यात्रा भारत के विभिन्न प्रान्तों और अन्य देशों में इन्सानियत की ज्योति प्रज्ज्वलित कर रही है । यह यात्रा नेपाल, भूटान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, आसाम, मेघालय, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, झारखंड उड़ीसा आदि है ।
० तेरापंथ के सम्बन्ध में कुछ कहें ।
– तेरापंथ जैनधर्म की एक विशिष्ट शाखा है । आचार्यश्री भिक्षु ने अठारहवीं शताब्दी में धर्मक्रान्ति का शंखनाद किया जो तेरापंथ के नाम से विख्यात है । तेरापंथ धर्मसंघ की एक नेतृत्व की परम्परा में ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण की कुशल प्रशासक के रूप में विशिष्ट पहचान है । पूर्ववर्ती दस आचार्यों की आध्यात्मिक संपदा आचार्यश्री महाश्रवण को विरासत में प्राप्त है । तेरापंथ समाज की हर बुराइयों, कुरीतियों के उन्मूलन क ीओर अग्रसर है और इससे लाखों करोड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं । इस यात्रा से मुझे पूरा विश्वास है कि नेपाल की जनता भी अत्यधिक लाभान्वित होगी ।
० आचार्य श्री महाश्रमण के विषय में कुछ बताएँ ।
– आचार्य महाश्रमण तेरापंथ धर्मसंघ के ११वें अधिशास्ता है. । निस्पृहता, सनर्लिप्तता, निर्विकारता आपके व्यक्तित्व की शोभा बढ़ाते हैं । आचार्य श्री के विषय में जो भी कहा जाय कम होगा । वैसे तो आप एक धर्म सम्प्रदाय के आचार्य हैं, किन्तु आपके विचार सभी सम्प्रदायों के लिए लाभदायी हैं । आपके अथक परिश्रम से यह धर्म सम्प्रदाय अपने समाज कल्याण के पथ पर आगे बढ़ रहा है ।
० इस यात्रा में सहभागी होने हेतु क्या कोई विशेष नियम है ?
– नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । किसी भी जाति, वर्ग, सम्प्रदाय और क्षेत्र का व्यक्ति अहिंसा यात्रा में सहभागी बन सकता है । इस यात्रा से दो रूपों से जुड़ा जा सकता है ।
स्वयं अहिंसा यात्रा का संकल्प स्वीकार करके और दूसरों को अहिंसा यात्रा के संकल्प स्वीकार करने हेतु प्रेरित करके ।
० इस यात्रा का संकल्प क्या है ?
– अहिंसा यात्रा के तीन संकल्प हैं । पहला तो ये कि मैं सद्भावपूर्ण व्यवहार करने का प्रयत्न करूँगा, दूसरा मैं यथासम्भव ईमानदारी का पालन करूँगा और तीसरा ये कि मैं नशामुक्त जीवन जीऊँगा ।
सच तो यह है कि यह यात्रा पूरी तरह समाज और जनकल्याण के लिए है । किसी भी समुदाय का व्यक्ति अगर इन बातों को आत्मसात् कर ले तो उसके जीवन के साथ साथ समाज देश सबका कल्याण हो जाएगा और एक नई समाज की बुनियाद बनेगी । लोग सुख और शाँति का अनुभव करेंगे । समाज में सद्भाव और भाईचारे की भावना दृढ़ होगी । उम्मीद है कि नेपाल की जनता भी इस यात्रा का पूरा पूरा लाभ उठाएगी ।

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