“मधेश की प्यास” औपनिवेशिक विकास मॉडल का दंश : संतोष मेहता
संतोष मेहता, हिमालिनी अंक अगस्त, ०२५। नेपाल सरकार ने आधिकारिक रूप से मधेश प्रांत के सभी आठ जिलों को आपदा संकट क्षेत्र घोषित किया है, जो इस संकट की भयावहता को दर्शाता है । हालांकि इन आठ जिलों के अलावा अन्य तराई मधेश के जिला भी इस संकट से गुजर रहा हैं । नेपाल राष्ट्र बैंक की २०२४ की आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रांत राष्ट्रीय जीडीपी में अनुमानित ७०७ अरब रुपये का योगदान देता है, जिसमें कृषि का हिस्सा ३५ प्रतिशत से अधिक है । यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि मधेश का संकट केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे नेपाल की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है ।
फिलहाल मधेश में लंबे समय तक बारिश की कमी के कारण भूजल स्रोत समाप्त हो गए हैं, नदियां और नहरें सूख गई हैं, और पीने और सिंचाई के पानी की अत्यधिक कमी हो गई है । किसानों के चेहरों पर मेहनत की जगह निराशा की लकीरें हैं । पानी के एक–एक बूँद के लिए तरसते मधेशी किसान और उनके परिवार इस संकट के गवाह हैं ।
आज मधेश की धरती रो रही है । यहाँ के खेतों में फसलें नहीं, सूखे के डरावने निशान बिखरे पड़े हैं । किसानों के हाथों में हल नहीं, हार की थकान है । यहाँ का किसान पानी के लिए तरस रहा है, यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों की मानवनिर्मित तबाही है । जबकि सरकारी घोषणाएँ सिर्फÞ ‘ढोंगी सहानुभूति’ बनकर रह गई हैं ।
डीप बोरवेलः समाधान या नई तबाही ?
प्रधानमंत्री केपी ओली की ५०० डीप बोरवेल की घोषणा को सरकारी प्रचार में समाधान के रूप में पेश किया गया, लेकिन यह प्रकृति के खिलाफ एक और कदम है । डीप बोरवेल भूजल का अंधाधुंध दोहन करते हैं, जिससे जल स्तर और गहरा होता जाता है । पूर्वीय दर्शन में जल को जीवन का आधार माना गया है–जल बिना जीवन की कल्पना असंभव है । यजुर्वेद में जल को “सर्वं विश्वेन संनादति” (सब कुछ जल के साथ संनादति है) कहा गया है । लेकिन डीप बोरवेल इस प्राकृतिक संतुलन को तोड़ते हैं ।
डीप बोरिंग से भूजल स्तर और नीचे चला जाएगा, जिससे भविष्य में और भी भयानक सूखा पड़ेगा । यह घोषणा उस मरीजÞ को एस्पिरिन देने जैसी है, जिसके फेफड़ों में कैंसर फैल चुका हो । डीप बोरवेल एक आपातकालीन समाधान हो सकता है, लेकिन यह दीर्घकाल में पानी की समस्या को और बढ़ा देता है । हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर टिकाऊ जल प्रबंधन पर ध्यान देना होगा । लेकिन असली मुद्दा यह है कि मधेश का संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों और औपनिवेशिक विकास मॉडल की देन है ।
डीप बोरवेल भि प्रकृति विरुद्ध का प्रोजेक्ट हैं । एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जÞमीन के अंदर से अत्यधिक मात्रा में पानी निकाला जाता है । यह भूजल का अंधाधुंध दोहन करता है, जिससे भूजल स्तर गिरते जाता है । जितना अधिक पानी निकाला जाएगा, पानी की सतह उतनी ही गहरी होती जाएगी । भविष्य में पानी निकालना मुश्किल हो जाता है । अत्यधिक पानी निकालने से जÞमीन कमजोर हो जाती है, जिससे शहरों और गाँवों में जÞमीन धंसने (ीबलम क्गदकष्मभलअभ) की समस्या पैदा हो सकती है । एक जगह डीप बोरवेल लगाने से आसपास के कुएँ, तालाब और नलकूप सूख सकते हैं, जिससे पानी को लेकर थप सामाजिक तनाव बढ़ सकता है । गहरे भूजल में आर्सेनिक, लोहा और फ्लोराइड जैसे हानिकारक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं, जो कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं । अगर भूजल का स्तर गिरता है, तो नदियाँ, तालाब और आद्र्रभूमि सूखने लगते हैं, जिससे पशु–पक्षियों और वनस्पतियों का जीवन संकट में पड़ जाता है ।
१२ श्रावण को मसहुर अंग्रेजी अखÞबार ‘द हिमालयन टाइम्स’ ने राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल के बयान को अपना संपादकीय बनाया है । किसी पार्टी के प्रेस विज्ञप्ति को मुख्यधारा का अखÞबार संपादकीय बनाए, यह सामान्य बात नहीं है । पार्टी ने मुख्य रूप से यह सवाल उठाया है कि “यह सूखा राज्य द्वारा सृजित और औपनिवेशिक विकास मॉडल का परिणाम है ।”
क्यों यह बयान महत्वपूर्ण है ?
पार्टी का कहना है कि मधेश का सूखा प्राकृतिक नहीं, बल्कि सरकार की गÞलत नीतियों, चुरे खनन के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण विरोधी ‘विकास’ का नतीजा है । वर्तमान विकास का ढांचा पश्चिमी औपनिवेशिक सोच पर आधारित है, जो प्रकृति का शोषण करता है, जल–जंगल–जÞमीन को नष्ट करता है और स्थानीय समुदायों को उजाड़ता है । यह राज्य का दोहनकारी रवैया हैं चुकी यह औपनिवेशिक विकास मॉडल भी हैं ।
नेपाल औपनिवेशिक शासन के तहत गुलाम कभी नहीं हुआ इसके बावजूद, नेपाल पश्चिमी ज्ञान, पश्चिमी शासकीय स्वरूप और विकास का मॉडल भी वही है जो प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आधारित है । यह मॉडल निम्नलिखित सिद्धांतों पर काम करता हैः प्रकृति को केवल कच्चे माल के स्रोत के रूप में देखना, तत्काल लाभ के लिए दीर्घकालीन नुकसान को नजरअंदाज करना, स्थानीय समुदायों की आवाज को दबाना, प्राकृतिक चक्रों की अनदेखी करता है ।
इसी मोडेल तहत सन् १९५४÷५५ के आसपास तराई–मधेश में मलेरिया नियंत्रण के साथ–साथ पुनर्वास कार्यक्रम भी शुरू हुआ । उस समय नेपाल सरकार ने चितवन, नवलपरासी, हेटौंडा आदि के जंगलों को काटकर वहाँ बस्तियाँ बसाने का काम किया, जो चुरे क्षेत्र के क्षरण की शुरुआत थी । उसके बाद लगभग ३०–३२ साल पहले चुरे किनारे से पूर्व–पश्चिम राजमार्ग का निर्माण करते समय भी जंगल काटकर ही सड़क बनाई गई । उसके बाद पहाड़ी जिलों तथा अन्य स्थानों से लोग उस क्षेत्र में रहने के लिए आकर बसने लगे, बल्कि रहने बसने के लिए प्रोत्साहन किया गया । अभी राजमार्ग के आसपास बड़ी–बड़ी बस्तियाँ बन गई हैं, जो ३० साल पहले तक नहीं थीं । यह सब सुनियोजित था ।
चुरिया का विनाश हुआ जो प्राकृतिक संतुलन को ही भंग किया है । चुरे पहाड़ न केवल जल संचयन करते हैं, बल्कि मधेश की जैव–विविधता को भी बनाए रखते हैं । इनके विनाश से न केवल जल संकट पैदा हुआ, बल्कि मधेश का पारिस्थितिकी तंत्र भी खतरे में पड़ गया है ।
क्यों सूख रहा है मधेश ?
चुरे श्रृंखला, जो समुद्र तल से ६०० से १२०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और पूर्व में मेची से पश्चिम में महाकाली तक फैली हुई है, न केवल नेपाल में बल्कि दक्षिण एशिया में सबसे नाजुक पहाडि़यों में से एक है । इतना ही नही यही वह पहाड़ है जो तलहटी के लिए जल प्रभाव एवं भण्डारण करती हैं । इसका संरक्षण अत्यन्त आवश्यक हैं ।
२०१४ के चुरे वन संसाधन मूल्यांकन के अनुसार, १९९५ से २०१० तक चुरे क्षेत्र में खनन गतिविधियों, अवैध कटाई और वन अग्नि के कारण ३८ हजार हेक्टेयर से अधिक वन नष्ट हो गए । अवैध कटाई और रेत, बजरी और पत्थरों की खुदाई तथा पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखे बिना किए गए अव्यवस्थित विकास कार्य मुख्यतः चुरे परिदृश्य के क्षरण के लिए जिम्मेदार हैं । एक मूल्यांकन के अनुसार, यदि वर्तमान रुझान जारी रहा तो नेपाल केवल २०–२५ वर्षों में पूर्ण चुरे वनों की कटाई का सामना कर सकता है ।
चुरिया पहाड़, जो मधेश की जल संचयन प्रणाली की रीढ़ हैं, प्रकृति की इस देन का प्रतीक हैं । ये पहाड़ वर्षा जल को संचित करते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं, और नदियों–तालाबों को जीवित रखते हैं । लेकिन औपनिवेशिक विकास मॉडल, जो पश्चिमी औद्योगिक सोच पर आधारित है, ने चुरिया को नष्ट कर दिया ।
नेपाल सरकार के आँकड़ों के अनुसार, मधेश के ७०% चुरे पहाड़ अवैज्ञानिक खनन और अंधाधुंध दोहन के कारण उजड़ चुके हैं । चुरे की यह तबाही भूजल रिचार्ज सिस्टम के पतन का कारण बनी है । नदियाँ सूख रही हैं, कुएँ और तालाब बंजर हो रहे हैं । यह सिर्फ मधेश की समस्या नहीं है; चुरे के विनाश का असर बिहार और उत्तर प्रदेश तक फैल रहा है, जहाँ भूजल स्तर में भारी गिरावट देखी जा रही है । राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी का यह बयान केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि मधेश की पीड़ा की सच्चाई है । यदि सरकार ने अब भी गंभीरता नहीं दिखाई, तो मधेश का सूखा न केवल नेपाल, बल्कि बिहार और उत्तर भारत के लिए भी भयावह संकट बन जाएगा ।
जल प्रबंधन की विफलता
विश्व बैंक की रिपोर्ट (२०२१) के मुताबिक, मधेश की ६०% सिंचाई नहरें बर्बाद हो चुकी हैं । पुराने तालाबों और पोखरों की मरम्मत नहीं हुई, जिससे बारिश का पानी बर्बाद हो जाता है । राजस्थान जैसे रेगिस्तानी इलाके में ५००–६०० मिमी बारिश में भी पानी का प्रबंधन होता है, जबकि मधेश में १५००–२००० मिमी बारिश के बावजूद प्यास बनी हुई है ।
जलवायु परिवर्तन और राज्य की लापरवाही
जलवायु परिवर्तन सर्वेक्षण के अनुसार, देश भर में औसतन ४३ प्रतिशत परिवारों ने धाराओं के पूर्णतः सूखने की रिपोर्ट दी है और ३८ प्रतिशत ने झरनों के पूर्ण रूप से सूखने का अवलोकन किया है । पिछले १० सालों में मधेश में बारिश २०% कम हुई है । सरकार ने चुरे संरक्षण, वर्षा जल संचयन और सिंचाई व्यवस्था को मजÞबूत करने की कोई ठोस योजना नहीं बनाई । २०७४ से अब तक मधेश के लिए आवंटित बजट का सिर्फÞ ३०% ही खर्च हुआ है ।
मधेश अब ‘अन्नपूर्ण’ नहीं, ‘अन्नहीन’ बन रहा है । धनुषा, सिराहा, सप्तरी जैसे जिलों में ७०% ट्यूबवेल सूख चुके हैं । महिलाएँ रोजÞ ५–६ घंटे पानी की तलाश में बिताती हैं । हर साल ३ लाख मधेशी युवा रोजÞगार की तलाश में भारत और खाड़ी देशों को जा रहे हैं । गाँवों में सिर्फÞ बूढ़े और महिलाएँ बचे हैं । मधेश नेपाल का ‘अन्न भंडार’ हुआ करता था, लेकिन अब यहाँ के किसान खुद भूखे मरने की कगार पर हैं ।
मधेश का संकटः प्रकृति के साथ विश्वासघात
पूर्वीय दर्शन, विशेष रूप से वैदिक और बौद्ध दर्शन, प्रकृति को जीवन का आधार मानते हैं । ऋग्वेद में कहा गया है, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (पृथ्वी मेरी माता है, और मैं उसका पुत्र हूँ) । प्रकृति के साथ सामंजस्य और संतुलन को पूर्वीय दर्शन का मूल मंत्र माना गया है । वैदिक साहित्य में जल को जीवन का आधार माना गया है ।
१. ऋग्वेद में कहा गया हैः
“आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्य अयनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ।।”
अर्थात्, जल ही नारायण का निवास स्थान है । यह दर्शन स्पष्ट करता है कि जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि दिव्यता का प्रतीक है ।
२. ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मंत्र कहता हैः
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।”
यह मंत्र हमें सिखाता है कि इस संसार में सब कुछ ईश्वर का है । हमें केवल आवश्यकता के अनुसार उपभोग करना चाहिए, लालच नहीं करना चाहिए । यह सिद्धांत आज के अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधन दोहन के विपरीत है ।
३. स्कंद पुराण में कहा गया हैः
“एको वृक्षो हतो येन तस्य नरकगामिता ।
वृक्षाणां रक्षणं यः करोति स स्वर्गमाप्नुयात् ।।”
अर्थात्, जो व्यक्ति एक वृक्ष को काटता है, वह नरक में जाता है, और जो वृक्षों की रक्षा करता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है ।
४. गरुड़ पुराण के श्लोक
“कूपं वापीं तडागं वा देवायतनमेव च ।
उद्यानमण्डपं चैव कृत्वा स्वर्गे महीयते ।।”
अर्थात, जो कुआं, बावड़ी, तालाब, देवालय, बगीचा और मंडप बनवाता है, वह स्वर्ग में पूजा जाता है ।
५. ब्रह्म पुराण के श्लोक
“वृक्षो रक्षति गोत्राणि गोत्राणि रक्षति वृक्षकम् ।
तस्मात् वृक्षान् प्रयत्नेन रक्षेयुर्गोत्रिणो सदा ।।”
अर्थात “वृक्ष गोत्रों (कुलों) की रक्षा करते हैं और गोत्र वृक्षों की रक्षा करते हैं । इसलिए गोत्रजों को प्रयत्नपूर्वक वृक्षों की रक्षा करनी चाहिए ।
६. महाभारत सभा पर्व श्लोक ७८ः राजधर्म और कृषि व्यवस्था में उल्लेख हैं ।
“कच्छेद् राष्ट्रं तडागानि पूर्णानि च वृहन्ति च ।
भागश्चो विनिविष्टानि न कृषिदेवमातृका ।।७८ ।।”
अर्थात, राज्य को अपने राष्ट्र में पूर्ण और विशाल तालाब (जलाशयों) बनवाने चाहिए तथा उन्हें व्यवस्थित रूप से स्थापित करना चाहिए, ताकि कृषि केवल देवताओं और प्राकृतिक शक्तियों (वर्षा) पर निर्भर न रहे ।
यह श्लोक आज से हजारों साल पहले उस समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है जिससे आज मधेश जूझ रहा है । महाभारत के इस श्लोक में छुपा हुआ विज्ञान और राजनीति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है ।
७. कौटिल्य अर्थशास्त्र के श्लोक
“सेतुबन्धकूपवापीतडागप्रणालीकाः ।
राज्ञा कार्याः प्रजानां तु कृष्यादिष्विह जीविते ।।”
यह कौटिल्य का स्पष्ट निर्देश है कि राज्य की जिम्मेदारी है जल संरक्षण (बांध, कुएं, बावड़ी, तालाब और नहरों का निर्माण) की व्यवस्था करना । अर्थात राज्य को प्रो–एक्टिव होकर जल संचयन की व्यवस्था करनी चाहिए, रिएक्टिव होकर सूखे का इंतजार नहीं करना चाहिए । सभी श्लोक मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि मधेश का संकट शास्त्र विरुद्ध है और नेपाल–भारतीय प्राचिन ज्ञान परंपरा में इसका पूर्ण समाधान मौजूद है ।
क्या हो समाधान ?
चुरे खनन पर तुरंत प्रतिबंध, पुराने तालाबों और नहरों का जीर्णोद्धार, बावड़ी और कुंड जो भारतीय उपमहाद्वीप की समृद्ध परंपरा का उपयोग करना होगा । वर्षा जल संचयन की व्यवस्था सहित किसानों को तत्काल राहत देना होगा । मुफÞ्त बीज, उर्वरक और सिंचाई सुविधाएँ की ब्यबस्था करना होगा । रिचार्ज पिट, पेरकोलेशन टैंक और चेक डैम बनाकर भूजल को रिचार्ज किया जाना चाहीए । कुएँ, तालाब, बावड़ी और पोखरों को फिर से जीवित किया जानी चाहिए ।
चुरे और उस से उपर के जगहौं पर पहाड़ी खेती की तकनीक जो सीढ़ीदार खेती और छत वर्षा से जल संचयन ब्यापक करना होगा, चुरे क्षेत्र में देशी प्रजातियों के वृक्षारोपण करना होगा । नहरों, ड्रिप सिंचाई और पुनर्चक्रित जल (च्भअथअभिम ध्बतभच) का उपयोग किया जानी चाहीए । प्राकृतिक तरीकों से मिट्टी सुधार जैसे बायो–रेमेडिएशन करना होगा । धार्मिक भावना के साथ वैज्ञानिक तकनीक से ही संरक्षण हो सकता हैं । पूर्वीय दर्शन जो प्रकृति प्रति धार्मिक आस्था पैदा किया हैं उसको सम्बर्धन करते हुवे ही संरक्षण ठिक से होंगे ।
मधेश का जल संकट केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे विकास मॉडल, मूल्य प्रणाली और भविष्य की दृष्टि पर सवाल खड़े करता है । पूर्वीय दर्शन की गहरी शिक्षाएं हमें सिखाती हैं कि ः प्रकृति हमारी माता है, संसाधन नहीं, इसिलिए चुरे क्षेत्र को ‘चुरिया माई’ कहा जाता हैं । लेकिन आज, चुरिया माई का विनाश और पर्यावरण विरोधी नीतियाँ मधेश को रेगिस्तान की ओर धकेल रही हैं । आज चुरिया माई मधेश को बचाने में हैं, माइ का उद्धार करना हम बच्चों का परम कर्तब्य हैं ।
पूर्वीय दर्शन हमें सिखाती हैं कि संयम और संतुलन ही सच्चा विकास है, सामुदायिक कल्याण व्यक्तिगत लाभ से बड़ा है, दीर्घकालीन सोच तत्काल मुनाफे से महत्वपूर्ण है । इस संकट से उबरने के लिए हमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांत को अपनाना होगा । जब तक हम प्रकृति को अपना परिवार नहीं समझेंगे, तब तक इस तरह के संकट आते रहेंगे ।
मधेश की प्यास सिर्फÞ पानी की कमी नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा और शोषण का प्रतीक है । अगर अभी भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मधेश का सूखा पूरे नेपाल के लिए खाद्य संकट पैदा कर देगा ।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” – सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ हों । यह मंत्र केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के सभी घटकों के लिए है । मधेश को फिर से “अन्नपूर्ण“ बनाने के लिए हमें प्रकृति–केंद्रित, टिकाऊ, और पूर्वीय दर्शन पर आधारित नीतियों की आवश्यकता है ।


