क्या गृहमंत्री के इस्तीफे से १९ शहीद युवा लौट आएँगे ? : कंचना झा
कंचना झा, काठमांडू, ९ सितम्बर । स्तब्ध है पूरा देश। शब्द नहीं मिल रहे उन १९ बच्चों और युवाओं के लिए जिन्हें भाद्र २३ गते पुलिस की गोलियों ने सदा के लिए उनके परिवार से छीन लिया। लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाले शासन में जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ, तब उस देश का भविष्य कौन संभालेगा? सत्ता की भूख जब इतनी बढ़ जाए कि जनता के प्राणों का कोई मूल्य न बचे, तब लोकतंत्र केवल खोखला दिखावा रह जाता है।
नेपाल के इतिहास में भाद्र २३ एक और काला दिन बनकर दर्ज हो गया। सैकड़ों युवाओं के शांतिपूर्ण आंदोलन पर पुलिस ने जिस निर्दयता से गोलियाँ बरसाईं, वह एक सवाल छोड़ गई— यह आदेश कहाँ से आया ? कौन था वह जिसने निर्णय लिया कि जनरेशन जेड को, अपने ही देश के बच्चों को, अपने ही देश के कर्णधार के सीने और सर पर गोलियाँ मारी जाएँ ?
बांग्लादेश के छात्र आंदोलन का उदाहरण सामने है, जहाँ प्रधानमंत्री के आदेश के बावजूद एक अफसर ने साफ कहा था कि वह अपने ही बच्चों पर गोली नहीं चलाएगा। लेकिन नेपाल में “प्रहरी मेरो साथी” का नारा देने वाली पुलिस ने साथी होने के बजाय हत्यारा बनने का रास्ता चुना। कहाँ है वो पुलिस जो साथी है ?
आज के ये युवा वही संतानें हैं, जिनके माता–पिता ने लोकतंत्र लाने के लिए गोलियाँ खाई थीं। और उसी लोकतंत्र में अब उनके बच्चे शहादत दे रहे हैं । सवाल उठता है—क्या लोकतंत्र में जनता की आवाज का जवाब सिर्फ गोली है ? क्या प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दलों के लिए कुर्सी इतनी अहम हो चुकी है कि उन्हें मासूम लाशें भी विचलित नहीं करतीं ? कभी मिले तो करुँ सवाल कि नींद कैसे आती है आपको रातों को ? जब इतनी लाश गिरा देते हैं ?
सरकार यह क्यों नहीं समझ रही है कि यह आंदोलन किसी अबुझ बच्चों का नहीं था। यह आंदोलन उस पीढ़ी का था, जो विश्व देख रही है, विकास की रफ्तार देख रही है, और अपने देश की ठहराव में घुटन महसूस कर रही है। उनका आक्रोश अचानक नहीं फूटा, यह उन तीन दलों की स्वार्थी राजनीति और भ्रष्टाचार का नतीजा है, जिनसे अब वे पूरी तरह निराश हो चुके हैं।
आज के युवा को “नए चेहरे चाहिए”, “नया नेपाल चाहिए”—यही नारे सड़क से संसद तक गूँज रहे थे । युवाओं का यह कहना था कि अब ओली, देउवा और प्रचण्ड से मुक्ति चाहिए। यही वजह थी कि वे संसद भवन तक पहुँचे—वह संसद जो जनता की आकांक्षाओं का प्रतीक होनी चाहिए थी, लेकिन अब घृणा का प्रतीक बन गई है ।
इतिहास गवाह है, राजतंत्र हटाने की लड़ाई में भी ऐसी बर्बरता नहीं दिखाई गई थी। आँसू गैस, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी जैसे विकल्प मौजूद थे, लेकिन सीधे गोली दागना इस सरकार की तानाशाही और निरंकुशता का प्रमाण है।
गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग तो उठी और इस्तीफा भी आया, पर सवाल यह है—क्या इससे १९ शहीद युवा लौट आएँगे ? क्या उनके परिवारों के जख्म भर पाएँगे ? नहीं। असली जवाबदेही उन तीन नेताओं की है जिन पर आज की त्रासदी का ठीकरा फूट रहा है।
इतिहास कभी माफ नहीं करेगा भाद्र २३ को । यह दिन याद रखा जाएगा कि कैसे सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए अपने ही बच्चों की बलि चढ़ा दी गई ।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनता क्या करेगी ?
क्या २०८४ के चुनाव में जिस दंभित स्वर से ओली कह रहे हैं कि वो फिर से सत्ता में आएंगे । क्या हम उन्हें ही चुनेंगे । अपने लिए तो उन्होंने रास्ता खुलवा लिया है । नया विधान बनावा लिया है । क्या हम फिर से इन नेताओं को वोट देंगे ? क्या शहीद युवाओं की आवाज भुला दी जाएगी ?
सच कहें तो आज जरूरत है कि स्वयं दल अपने भीतर आत्मचिंतन करें और इन नेताओं को चुनाव से दूर रखें । बहिष्कार करें इन तीन नेताओं का । और जनता भी यह संकल्प ले कि जिनके हाथ निर्दोष युवाओं के खून से रंगे हैं, उन्हें कभी सत्ता तक न पहुँचने दें।
क्योंकि देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है। देश उसके लोग हैं, उसके युवा हैं। अगर लोग ही नहीं बचेंगे, तो प्रधानमंत्री किस पर राज करेंगे ?
अब बारी हमारी है । जाग जनता जाग ….

कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन, www.himalini.com


