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“निर्बन्ध पंथ जब मिला नहीं प्रतिभा को, तब नेपाल अपने घर में हारा है।”

अजय कुमार झा
“निर्बन्ध पंथ जब मिला नहीं प्रतिभा को, तब नेपाल अपने घर में हारा है।”
ध्यान रखें, प्रतिभा (यानी सृजनशील, प्रगतिशील और नवीन सोच से सुसज्जित व्यक्तित्व, विश्व को सौंदर्य और शक्ति से भरनेवाला युवा समूह) को यदि सृजन करने के लिए स्वतंत्र मार्ग नहीं मिलता है, तो वह बंधनों, अवरोधों और अवरोधकों से विद्रोह करने लगती है। यहां ‘निर्बन्ध पंथ’ का आशय है; विचार, अभिव्यक्ति, और कार्य की पूर्ण स्वतंत्रता। बाधा रहित अवस्था। अब आप गौर कीजिए! क्या जेनजी क्रांति अपनेआप हो गई? क्या इतना बड़ा ऐतिहासिक तांडव खेल खेल में हो गया? आज से १०० वर्ष पहले भारत के राष्ट्रकवि मेरे हिसाब से (राष्ट्रऋषि) श्री रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से नेता और कर्मचारी को सचेत कराते हुए लिखते हैं:
” जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।
   दिनकर जैसे कवि यहाँ यह कहना चाहते हैं कि जब किसी युग की व्यवस्था, परंपरा या सत्ता प्रतिभा की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाती है, तब क्रांति या विद्रोह जन्म लेता है। वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सिर्फ भारत या नेपाल ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के युवा वर्ग एक नए चेतना युग से गुजर रहे हैं। यह चेतना राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी सभी स्तरों पर स्वतंत्रता और न्याय की माँग कर रही है। डिजिटल सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी प्रतिभा और विचारों को स्थापित करने के लिए एक वैश्विक पटल उपलब्ध कराया है। यह सामाजिक संजाल और आधुनिक यंत्रों ने उन्हें उनकी प्रतिभा के कारण पलभर में विश्वमंच पर सुशोभित होने का सुअवसर प्रदान किया है। इसके लिए न किसी नेताओं की पैरवी की आवश्यकता है न कृपा की। बल्कि इन युवाओं के क्षमता को प्रयोग कर ए निकम्मे बुड्ढे लोग सत्ता हथियाते और तिजोरी भरते आ रहे थे। धीरे धीरे जब उन्हें महसूस होने लगा कि आनेवाले दिनों में सोशल मीडिया और ए युवागण हमारे लिए घातक साबित होनेवाला है। तब इन भेड़ों ने आधुनिकतम और वैज्ञानिक तकनीक पर प्रतिबंध लगा दिया। क्योंकि इनकी पोल खुलती जा रही थी। ए दिन प्रतिदिन नंगे होते जा रहे थे। अपने ही कार्यकर्ताओं के नजरों में गिरते जा रहे थे। स्वाभिमान न बचने के कारण आत्मग्लानि में जीना मुश्किल होता जा रहा था। भ्रष्टाचार के अनंत कांडों के सार्वजनिक रूप से उजागर होते देख एक मनोवैज्ञानिक भय से प्रकंपित हो रहे थे। इन सभी समस्याओं से निजात पाने के लिए उन्हें सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना ही सर्वोत्तम उपाय लगा। समय की गति के विपरीत चलने की कोशिश, वह भी विदेशियों के ताकत पर! क्या संज्ञा दिया जाय!
   ध्यान रहे! आधुनिकता को दबाने का प्रयास युवा पीढ़ी के विचार में आम युवाओं को गुलामी के जंजीर में जकड़ने के लिए माहौल बनाने के समान है। इसीलिए डिजिटल विद्रोह या ऑनलाइन मूवमेंट्स जैसे आंदोलनों का जन्म हो रहा है।जब प्रतिभाशाली युवाओं को उनके कौशल और नवाचार के अनुसार जीवन यापन करने का अवसर नहीं मिलेगा तो, वो क्या करेगा? कीर्तन या क्रांति? थोड़ी भी अक्ल हो तो हम समझ सकते हैं, व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करेगा विद्रोह! अमेरिका, ईरान, चीन, भारत, नेपाल या फ्रांस, हर जगह युवा आंदोलन इसी निराशा की उपज हैं।
   वैश्विक पटल पर उपलब्ध ज्ञान और विज्ञान, विचार और तर्क, तथा समस्या और समाधान के विराट आयाम के कारण आज का युवा परंपरा को नकारना तो नहीं चाहता, लेकिन वह अंधानुकरण से मुक्त भी रहना चाहता है। वह धर्म, राजनीति, संस्कृति और लिंग की सीमाओं से ऊपर एक मानवीय पहचान खोज रहा है। वसुधैव कुटुंबकम् के महामंत्र को हृदयंगम करके वैश्विक मानव समुदाय के साथ विराट जीवन जीना चाहता है। वह कूप मंडूक नहीं महासागर में अपनी पूरी ऊर्जा के साथ तैरना चाहता है। जो कि ऊर्जाहीन, शक्तिहीन, बुद्धिहीन, जीवनहीन बुड्ढों को बर्दाश्त नहीं होता। और वो अपनी षडयंत्र शक्ति से युवा शक्ति के तूफान को रोकने का असफल प्रयास करता है। जो बाद में उसे धृतराष्ट्र के भांति अपनी ही संतानों के नजर में पतित और घृणित साबित कर देता है।
दिनकर की यह पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी।
जब तक प्रतिभा को निर्बन्ध मार्ग नहीं मिलेगा —
जब तक विचारों, रचनात्मकता और न्याय की आज़ादी सीमित रहेगी, तब तक युवा विद्रोह हर देश और हर युग में जन्म लेता रहेगा।
अर्थात्, वर्तमान विश्व का युवा उसी पुरातन सत्य की पुनरावृत्ति कर रहा है —
“बंधन तोड़ो, स्वतंत्र सोचो, और नया युग रचो।”
अजय कुमार झा

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