जेनजी आंदोलन के जड़ की पड़ताल : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
मुरलीमनोहर तिवारी (सीपू), बीरगंज, हिमालिनी अंक नवंबर।
नेपाल में ८ सितंबर से शुरू हुए देशव्यापी जेन–जी आंदोलन से बिगड़े हालात के बाद प्रधानमंत्री के ।पी.शर्मा ओली को आखिरकार अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा । कुछ समय के लिए राष्ट्रपति ने भी त्यागपत्र सौंप दिया था ।
वर्तमान में नेपाल की राजनीतिक स्थिति वैसी ही है जैसी कुछ समय पहले अफगानिस्तान, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश की थी, जहां राजपक्षे, इमरान खान और शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा था । ओली की पार्टी की विचारधारा एवं उनकी सरकार की चीन से काफी नजदीकियां रहीं । उनको चीन की कठपुतली भी कहा जाता रहा है । उनकी छवि भारत विरोधी रही है ।
वैसे नेपाल के लोगों का मानना है कि माओवादी एक खूनी क्रांति के माध्यम से सत्ता में आए, जिसमें करीब १७ हजार लोगों की जानें गईं और राजशाही का अंत हुआ लेकिन माओवादियों ने आम जनता से जो वादे किए, जो सपने दिखाए, वे पूरे नहीं किए और भोग–विलासिता में लग गए । नेपाल का भी वेनेजुएला जैसा हाल होता जा रहा था इसलिए युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किया और भ्रष्ट सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया ।
नेपाल में बहुतायत लोग चाहते हैं कि यहां राजशाही आए और एक बार फिर से नेपाल हिंदू राष्ट्र बन जाए । नेपाल के कुछ वर्गों द्वारा राजशाही की वापसी की मांग और उसको लेकर प्रदर्शन भी अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं ।
नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता के प्रमुख कारणों में ४ दलीय सिंडिकेट, पक्षपातपूर्ण राजनीति, बार–बार बदलते गठबंधन, कमजोर सरकारें, भ्रष्टाचार, सत्ता संघर्ष, नेताओं की अक्षमता और जनता की बढ़ती हताशा शामिल हैं । नेपाल में अक्सर सरकारें बदलती रहती हैं, जिससे स्थिरता नहीं आ पाती । २००८ से अब तक १४ सरकारें बदली जा चुकी हैं कई विश्लेषकों का ऐसा भी मानना है कि नेपाल की वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है ।
विदेशी ताकतों की बात आती है और सूत्रों की मानें तो ०८÷१२÷२०२४ पर ध्यान केंद्रित होता है, जब अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिक डोनाल्ड लू नेपाल आए थे । डोनाल्ड लू वही व्यक्ति है जो अफगानिस्तान, श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में सत्ता परिवर्तन के मुख्य योजनाकार थे । पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और बंगलादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने उनकी सरकार गिराने में डोनाल्ड लू की भूमिका सार्वजनिक तौर पर जÞाहिर कर चुके है ।
नेपाल में इनकी मुलाकात प्रोटोकॉल तोड़कर, बालेन साह, रवि लमिच्छाने, हामी नेपाल एन.जी.ओ के सुदन गुरूंग, दीपक भट्ट –ये आम्र्स डीलर है जो इटली और अन्य देशों से हतियार खरीद कराने में नेपाल सरकार से मोटा कमिशन लेते थे), डॉ. संदूक रुइत, साहिल अग्रवाल –ये शंकर ग्रुप से है और कोरोना के समय नकली थर्मामीटर बेचने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे) और अंत मे ‘प्रचंड’ से मुलाकÞात हुई ।
इसी मीटिंग में नेपाल सरकार का तख्तापलट की योजना बनी, जिसके चेहरे के रूप में सुदन गुरूंग, बालेन साह, रवि लमिच्छाने और डॉ. संदूक रुइत को रखा गया बाकी लोगो को पर्दे के पीछे से काम करना था ।
इसके लिए “हामी नेपाल” और “बारबरा फाउंडेशन” को तत्काल २१ करोड़Þ का सहयोग किया गया । जानकारी के लिए बता दे कि “बारबरा फाउण्डेशन” में डॉ. सन्दुक रूइत–चेयर पर्सन, डॉ.चन्द्रप्रसाद पोखरेल–भाइस चेयरमैन, मोहना अन्सारी–जनरल सेक्रेटरी, सिए सुदर्शनराज पाण्डे–ट्रेजरर, सञ्जय बहादुर थापा–सदस्य, प्रो ।डॉ.गोविन्दराज पोखरेल–सदस्य, डॉ.स्वर्णिम वाग्ले–सदस्य, प्रो ।गोविन्द नेपाल–सदस्य, अखिलेश उमेश उपाध्याय–सदस्य (काठमाण्डू पोष्ट के पूर्व प्रधान सम्पादक), रागिनी उपाध्याय–सदस्य, सुहृद घिमिरे–सदस्य हैं ।
सूत्रों की मानें तो तख्तापलट का समय तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली के चीन भ्रमण के ठीक बाद होने वाला था, इसके लिए योजनाकारों ने शिक्षण संस्थानों से बात करके देश भर में होने वाली परीक्षा को नियत समय से १५ दिन आगे या पीछे करवाया और देश भर से युवा–विद्यार्थियों को शिक्षण भ्रमण के नाम पर काठमांडू लाया गया । काठमांडू पहुचने से पहले जितने भी प्रहरी चेक पोस्ट है, उनकी इंट्री रजिस्टर से ये बात प्रमाणित होती है कि ८ सितम्बर से दस दिन पहले से काठमांडू में जो भी सवारी आई उनमे ९० प्रतिशत विद्यार्थी थे । इन्हें काठमांडू के सुन्धारा, गोशाला और कुछ निजी और किराए के मकानों में रखा गया । इसका रिकॉर्ड होटल के बुकिंग रजिस्टर से मिली ।
इनलोगों की योजना की भनक ओली सरकार तक पहुँच गई, ओली सरकार ये समझ गई कि ये लोग सोशल मीडिया में कुछ अफवाह उड़ा कर सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते है । सरकार ने ऐहतियातन कदम उठाते हुए आनन–फानन में सोशल मीडिया पर रोक लगा दी । इस रोक से तख्तापलट करने वालो की योजना असफल हो गई और वे काठमांडू से वापस लौटने की तैयारी करने लगे । तभी सोशल मीडिया के बन्द के खिलाफ सभी जगह से आवाज उठने लगी । तब इनलोगों ने अपने योजना में बदलाव करते हुए सोशल मीडिया में अफवाह उड़ाने के बजाए सोशल मीडिया बन्द का विरोध करने की योजना बनाई ।
इसके लिए सभी योजनाकार पर्दे के पीछे रहकर दो युवा अंकित मल्ल और खेमराज साउद द्वारा ७ सितम्बर को काठमांडू के सीडीओ से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए निवेदन देते है । इसके बाद सभी प्रदर्शनकारी को स्कूल यूनिफार्म और स्कूल बैग के साथ पहुचने का निर्देश दिया जाता है ।
८ सितम्बर को प्रदर्शन शुरू होता है । इसमें देश के विभिन्न जगहों से आए विद्यार्थियों को होटल से बानेश्वर लाने के लिए दीपक भट्ट किराए की गाड़ी का इंतजाम करता है । बानेश्वर से सिहदरबार तक पानी और नास्ते का इंतजाम साहिल अग्रवाल करता है ।
जब अत्यधिक भीड़ बानेश्वर के पास इकट्ठा हुईं तो वहाँ के डीएसपी ने सीडीओ को फोन करके हालात की जानकारी कराई । सीडीओ ने तुरंत गृहमंत्री को फोन किया, संयोग से गृहमंत्री, विदेश मंत्री आरजू देउबा और प्रधानमंत्री ओली एक साथ ही थे, सीडीओ की बात खत्म होते ही आरजू देउबा ने कहां “इन प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाओ, ये सब हमलोगों के बच्चों का वीडियो सोशल मीडिया पर डालकर उनकी बदनामी कराते है, उन्हें सीधे गोली मारों” ।
विदेश मंत्री आरजू देउबा का ये कथन आदेश की तरह था, जिसपर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ऐसा ही करने की हामी भरते है । इसके बाद प्रहरी ने गोलियां चलानी शुरू कर दी, शाम होते–होते १७ बच्चों के मरने की खÞबर आई । जो जहां था सब दुख और व्यथा में थे, सब जगह सरकार की घोर निंदा होने लगी । शाम–रात को प्रधानमंत्री ने मंत्रिपरिषद की बैठक बुलाई, बैठक में सभी ने गोली चलाने के आदेश और विदेश मंत्री आरजू देउबा का विरोध और आलोचना किया और तुरन्त सोशल मीडिया से रोक हटाने का सुझाव दिया । प्रधानमंत्री ओली ने सुझाव दिया कि “इस समय सोशल मीडिया से रोक हटाने का संदेश ये जाएगा कि सरकार डर गई, ऐसी हालत में और ज्यादा विरोध होगा । आज जिन बच्चों को गोली लगी है उसके डर से कल कोई भी अभिभावक अपने बच्चे को बाहर नहीं निकलने देगा, कल पूरी सड़क सुनसान रहेगी, उसके बाद सोशल मीडिया से रोक हटा लिया जाएगा, तत्काल के लिए गृहमंत्री अपना सांकेतिक इस्तीफा दे जिससे आक्रोश कुछ हद तक शांत हो जाएगा” ।
अगले दिन शुरुआत में लोग डरे हुए थे लेकिन जिन बच्चों को बाहर से लाया गया था उन्हें आगे करके भीड़ दिखाया गया, जनता में आक्रोश तो बहुत था, इनके पीछे अन्य लोग जुड़ते चले गए । देखते ही देखते जनसैलाब खड़ा हो गया । इस अवस्था को देखते हुए प्रधानमंत्री ओली ने सेना को कमान संभालने को कहा, लेकिन सेना ने जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया । इसके बाद ओली ने अंतरास्ट्रीय मदद मांगी जो कि तुरन्त मिलने वाली मदद होती है, वहाँ से भी दो दिन बाद मदद पहुचने को बताया गया –अमेरिकी दबाब में मदद नही मिली) । सब जगह से घिरा देखकर प्रधानमंत्री ओली ने इस्तीफा दिया और अपने मंत्रिमंडल के साथ सेना के बैरक शिवपुरी में शरण लिया ।
उस दिन युवाओं के आक्रामक आंदोलन के दौरान अंकित मल्ल और खेमराज साउद के नाम गायब हो गए और “जेन–जी” और “सुदान गुरूंग” पर्दे से बाहर आकर प्रत्यक्ष नेतृत्व करने लगे । सब जगह तोड़फोड़ और आगजनी होने लगी । कपÞm्र्यू लगे होने के बावजूद दीपक भट्ट ट्रकों पर लोगो को भरभर के नेताओं के घर जलाने के लिए पहुँचाने लगा । फिर राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल के निजी निवास में आगजनी हुई । सड़क पर वित्त मंत्री को दौड़ा–दौड़ा कर पीटा गया । पूर्व प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल की पत्नी को जिंदा जलाया गया, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी की कुटाई कर दी गई । संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, राजनैतिक दलों के दफ्तर, प्रधानमंत्री, मंत्रियों के आवास, सिंहदरबार, प्रहरी चौकियाँ समेत कई भवन को आग के हवाले कर दिया गया । कई उद्योगपति के घर और कारखाने जला दिए गए जिनका सरकार से कोई लेना देना नहीं था । काठमांडू के आसमान में धुआं–धुआं हो गया । महज २ दिन में २२ मौतें हो गईं गौरतलब है कि मृतकों में ज्यादा संख्या काठमांडू के बाहर से आए बच्चों की है ।
जेन–जी आन्दोलन में एमाले नेता के घर मे आगजनी की गई जिसमें पूर्व प्रधानमन्त्री ओली के तेह्रथुम के पुस्तैनी घर, झापा और भक्तपुर के बालकोट स्थित घर । पृथ्वीसुब्बा गुरुङ्ग, गोकुल बाँस्कोटा, महेश बस्नेत, विष्णुप्रसाद पौडेल, पदम गिरी, सुरेन्द्र पौडेल, शंकर पोखरेल, ईश्वर पोखरेल, रघुवीर महासेठ, योगेश भट्टराई, कोमल वली, सूर्य थापा, ज्वाला साह, राज कुमार गुप्ता तथा अन्य नेताओं के घर जलाए गए ।
नेपाली काँग्रेस के शेरबहादुर देउवा के बुढानिलकण्ठ स्थित घर, आरजु देउवा के कञ्चनपुरस्थित घर, पूर्णबहादुर खड्का, गगन थापा, विश्वप्रकाश शर्मा, प्रकाशमान सिंह, दिपक खड्का, रमेश लेखक, विश्व पौडेल, जनार्धन सिंह क्षेत्री, अनिल रूंगटा तथा अन्य नेताओं के घर जलाए गए ।
माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष ‘प्रचण्ड’ के खुमलटार और चितवन के शिवनगर स्थित निवास, प्रचण्ड पुत्री गंगा दाहाल का घर, नारायणकाजी श्रेष्ठ, नन्दबहादुर पुन, कृष्णबहादुर महरा, अग्निप्रसाद सापकोटा, माधव सापकोटा –सुवोध), अधिवक्ता रामनारायण बिडारी तथा अन्य नेताओं के घर जलाए गए ।
इसी प्रकार लोसपा के नेता शरदसिंह भण्डारी, मधेसी नेता महेन्द्र यादव, प्रदीप यादव, राजेशमान सिंह तथा अन्य नेताओं के घर जलाए गए । बिरगंज में नेपाली टेलिकम के गाड़ी में आगजनी । मधेश के प्रदेश सभा भवन में आगजनी । हालांकि बीरगंज के प्रदर्शन और आगजनी में जेन–जी की सहभागिता नही थी, यहाँ एक–दूसरे के विरोधी आग और लूटपाट कराते रहे ।
देउवा के लड़के के निवेश से बने हिल्टन होटल में आगजानी से पूरा होटल ध्वस्त हो गया, हालांकि यह होटल भारत के ओरिएंटल इन्सुरेंस से बीमा कराया गया था इसलिए इस क्षति की भरपाई हो जाएगी ।
इस पूरे घटनाक्रम से पता चलता है कि यह सब अमेरिका की सोची समझी साजिश के तहत हुआ जिसमें तत्कालीन असक्षम सरकार फस गई । फिर संसद भंग और अन्तरिम सरकार गठन की बात आई, सबसे ज्यादा चर्चा बालेन साह की आई, लेकिन बालेन साह अन्तरिम सरकार के बदले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनना चाहते है इसलिए उन्होंने इनकार कर दिया ।
११ सितम्बर की रात को खबर आई की रात के बारह बजे के बाद शुक्रवार को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र सत्ता पर काबिज होने वाले है । इस खबर को इस बात से भी बल मिला कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र अपना कोई भी काम शुक्रवार को करते है । उसी रात सेना की ४०–५० बख्तरबंद गाडि़यां काठमांडू जाती हुई दिखी, जिससे इस खबर को और बल मिला, रात भर सोशल मीडिया पर हलचल बनी रही । बाद में मालूम हुआ ये सारी अफवाह है और सेना की जो गाड़ी गई वे वही गाडि़यां थी, जो ओली ने यूएनओ से मदद में मांगी थी । ईस तरह की अपÞmवाहों से जेन जी समूह भी डर गया कि ज्यादा देरी करने से कहीं सारा खेल ही ना बिगड़ जाए । इसके लिए उन्होंने सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमति जताई ।
जब सुशीला कार्की का नाम आया इनके नाम पर सब सहमत हो गए, कारण ये माओवादी के कोटे से न्यायाधीश नियुक्त हुई थी, एमाले ने इनको महाभियोग से बचाया था, और इनके पति कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता है जिन्होंने कॉंग्रेस के लिए हवाई जहाज का अपहरण किया था, तो इन सब बातों से हरेक पार्टी का कुछ अपना लगाव दिखा जिससे सभी मान गए और सुशीला कार्की आगामी फागुन में चुनाव कराने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री बनी ।
बालेन साह के कानूनी सलाहकार ओम प्रकाश अर्याल गृह मंत्री बने और साथ में कानून मन्त्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी दी गई । मंत्री के रूप में रामेश्वर खनाल वित्त मंत्री, खनाल आर्थिक सुधार सुझाव आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं और वे पूर्व सचिव भी रह चुके हैं । कुलमान घिसिंग को ऊर्जा मंत्री के साथ भौतिक पूर्वाधार, यातायात व शहरी विकास मन्त्रालय की जिम्मेदारी मिली है । घिसिंग नेपाल विद्युत प्राधिकरण के पूर्व कार्यकारी निदेशक हैं । वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण प्रसाद भंडारी की बेटी सबिता भंडारी को पहली महिला महान्यायधिवक्ता बनाया गया ।
गौरतलब है कि योजनानुसार डॉ. सन्दुक रूइत को भी उनकी भूमिका का इनाम देने के लिए प्रधानमंत्री कार्की १७ सितम्बर को उनसे मिलकर उन्हें भी सरकार में शामिल होने का न्योता देकर आई ।
इन सब घटनाक्रम में भारत का रुख बेहद सकारात्मक रहा । भारत भी ये चाहता है कि नेपाल में चल रही सभी अनैतिक गतिविधियां समाप्त हो जाएं । ऐसा होना भारत के भी पक्ष में है क्योंकि पिछले कुछ सालों से नेपाल, भारत विरोधी गतिविधियों का एक बड़ा अड्डा बन गया है । भारत हमेशा नेपाल की जनता, जनअपेक्षा और लोकतंत्र के साथ रही है, इसलिए भारत ने नई सरकार का समर्थन किया । चीन भी ४ दलिए सिंडिकेट की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर तत्कालीन सरकार का समर्थन करता दिखा ।
अभी देखने पर हालात सामान्य होते हुए दिख रहे है, लेकिन पुराने राजनीतिक दल के संगठन उसी रूप में मजबूती से खड़े है, उनमे कुछ नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे है, कुछ उसी नेतृत्व के साथ खड़े है, कुछ भी हो ये तो तय है कि जैसे ही मौका मिलेगा ये हमला करने से नही चूकेंगे । दूसरी तरफ अमेरिका समर्थित सरकार बहुतों के गले की फास है, जिसका समयानुकूल विरोध होना निश्चित है । हिन्दू राष्ट्र और राजशाही चाहने वाले भी मौके के इंतजार में है, सुशीला कार्की पर चारो तरफ से कड़ी निगरानी हो रही है, अगर इनका कार्य जनता के अपेक्षा अनुरूप नही हुआ या एक भी कदम गलत पड़ा तो इससे बड़ा और खूनी आंदोलन की आशंका से इनकार नही किया जा सकता ।


