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वर्तमान समय मे अक्षय सुहाग की सार्थकता : वाणी नित्या

 

वाणी नित्या, काठमांडू ।नस्त्री का अस्तित्व पुरुष से जुड़ा है अनादिकाल से। सम्पूर्णता के द्योतक है स्त्री और पुरुष । स्त्री का सुहाग पुरुष से है और पुरुष ही स्त्री के सौभाग्य एवम सुख का प्रतीक माना गया है । समय के साथ स्वरूप बदलता गया और पुरुष ही स्त्री के सुहाग ,सौभाग्य से बढ़कर भाग्य विधाता बन गया।यहीं से कुरीति कहें या विकृति, इसकी शुरुआत हुई।
शक्ति स्वरूप देवी की पूजा करते है हम ।हमारे देवी देवता भी पृथक अस्तित्व के साथ अपनी महत्ता रखे हुए हैं। सभी की अपनी अपनी प्रभुता है जिनके कारण वे पूजे जाते हैं।केवल देवता के कारण ही देवियाँ पूजी नही जातीं।उनका अपना एक अलग अस्तित्व है ,अपनी प्रभुता है। इसीतरह पति का पत्नी से ही सौभाग्य है और पत्नी का पति से ।दोनों की अपनी महत्ता है।

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प्राचीन काल हो या फिर आजकल का समय जब स्त्री पुरुष विवाह बंधन में बंधते है तो दोनों एक दूसरे के लिए सौभाग्य बनकर आते हैं । हमारा समाज पुरुष प्रधान है और पुरुष को स्त्री के सौभाग्य के रूप में देखता है। हमारे समाज मे सुहाग बिना स्त्री, अपना अस्तित्व खो देती है ,जैसे कि पुरुष बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नही। पुरुष आवश्यक है स्त्री के लिए पर सबकुछ नही।अनेको उदाहरण हैं हमारे समाज में जहां स्त्री पुरुष के बिना ही अपना अस्तित्व कायम रखी और विश्व मे अपना नाम किया।

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मेरे विचार अनुसार सुहाग की सार्थकता सदा से है सदा ही रहेगी।विवाह होने के पश्चात आप एक दूसरे के प्रति अनेको जिम्मेदारियों से युक्त हो जाते हैं,जिनका पालन दोनो तरफ से होना अति आवश्यक है।
जहां अशिक्षा है ,गरीबी है ,नासमझी है वहां इसकी सार्थकता के बजाय निरर्थकता ही देखने को मिलती है।प्राचीनकाल में सती प्रथा एक कुरीति ही थी जहां सुहाग के बीतने के बाद स्त्रियां सती हो जाती थीं अर्थात पति ही उनका सर्वे सर्वा था। उनके बिना स्त्री के जीवन का कोई अर्थ नही होता था।
कालांतर में स्त्रियों ने अपनी पहचान बनाई ,एक अलग अपना अस्तित्व बनाया समाज मे, देश मे ।
अतः मेरे विचार से सुहाग की सार्थकता आजकल के समय मे भी है और आनेवाले समय मे भी रहेगी बस इतना है कि स्त्री सुहाग के साथ अपनी भी सार्थकता को बरकरार रखे ,सुहाग के अस्तित्व के साथ अपने अस्तित्व की भी रक्षा कर सके ।

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वाणी नित्या
काठमांडू ,नेपाल

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