Tue. May 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

नेपाल के बाल सुधारगृहों में अमानवीय हालात: क्षमता से चार गुना अधिक बच्चे, बुनियादी सुविधाओं का भी संकट

 

काठमांडू, 16 अप्रैल। नेपाल में बाल अपराध या कानूनी विवाद में फंसे बच्चों के सुधार के लिए स्थापित बाल सुधारगृह खुद गंभीर अव्यवस्था और मानवीय संकट का प्रतीक बनते जा रहे हैं। देश के अधिकांश सुधारगृहों में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को रखा गया है, जिसके कारण रहने, पढ़ने, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

महिला, बालबालिका तथा ज्येष्ठ नागरिक मंत्रालय के अनुसार देशभर के बाल सुधारगृहों में लगभग एक हजार बच्चे रह रहे हैं। लेकिन कई सुधारगृहों में क्षमता से तीन से चार गुना तक अधिक बच्चों को रखने के कारण स्थिति बेहद दयनीय हो गई है।


भैरहवा सुधारगृह में दोगुनी भीड़

भैरहवा स्थित बाल सुधारगृह केवल 2 कट्ठा 6 धुर क्षेत्रफल में बना है और इसकी क्षमता 50 बच्चों की है। लेकिन यहां लगभग 100 बच्चों को रखा गया है।

भीड़ के कारण बच्चों को शौचालय जाने तक के लिए लाइन लगानी पड़ती है और एक ही बिस्तर पर दो से तीन बच्चों को सोना पड़ता है।

छह वर्षों से वहां रह रहे एक बालक ने बताया कि जगह की कमी के कारण दम घुटने जैसी स्थिति बन जाती है।
सुधारगृह प्रमुख बोधराज आचार्य ने भी स्वीकार किया कि भवन छोटा होने के कारण बच्चों को व्यवस्थित करना बेहद मुश्किल हो गया है।


वीरगंज में भी क्षमता से दोगुने बच्चे

वीरगंज स्थित बाल सुधारगृह की क्षमता 50 बच्चों की है, लेकिन यहां 103 बच्चे रह रहे हैं। इनमें से केवल 21 बच्चों के मामलों का फैसला हो चुका है, जबकि बाकी सभी न्यायिक प्रक्रिया में हैं।

यह भी पढें   नेपाल में जेलेन्स्की की संभाव्यता कितना ? : कैलाश महतो 

गृह प्रमुख टीकाकृष्ण काफ्ले के अनुसार बजट की कमी के कारण भवन की मरम्मत, पंखा और बिजली जैसी सामान्य सुविधाएं भी ठीक से उपलब्ध नहीं कराई जा पा रही हैं।


कास्की और मकवानपुर में भी अव्यवस्था

कास्की के बाल सुधारगृह में 50 से 60 बच्चों की क्षमता होने के बावजूद 108 बच्चे रह रहे हैं। एक कमरे में लगभग 15 बच्चों को रखना पड़ता है।

मकवानपुर के सुधारगृह में स्थिति और भी खराब है। यहां 30 बच्चों की क्षमता वाले केंद्र में 92 बच्चे रखे गए हैं। जगह की कमी के कारण कई बच्चों को फर्श पर सोना पड़ रहा है

नियमों के अनुसार बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था अनिवार्य है, लेकिन मकवानपुर में कई बच्चे शिक्षा से भी वंचित हैं।


विराटनगर में क्षमता से चार गुना बच्चे

विराटनगर के बाल सुधारगृह में 50 बच्चों की क्षमता के स्थान पर 239 बच्चे रह रहे हैं। हालांकि यहां सुधारगृह के भीतर ही दीपज्योति स्कूल संचालित है, जहां 4 से 10 कक्षा तक पढ़ाई होती है।

लगभग 130 बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं, जबकि उच्च कक्षाओं के विद्यार्थी स्थानीय विद्यालय और कॉलेजों में अध्ययन कर रहे हैं।


बच्चों ने किया विरोध प्रदर्शन

वीरगंज स्थित बाल सुधारगृह के बच्चों ने 19 चैत को अपनी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था।

यह भी पढें   धादिङ में दो बसों की टक्कर... ३७ लोग घायल

उन्होंने प्रशासन को 22 सूत्रीय मांगपत्र सौंपकर सोलर लाइट, पंखा, शौचालय के दरवाजे, पीने के पानी, कापी-कलम और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की थी। बच्चों का कहना है कि उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

भीड़ के कारण झड़प और हिंसा

सुधारगृहों में अधिक भीड़ और विभिन्न आयु के बच्चों को एक साथ रखने के कारण झगड़े और हिंसा की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

  • विराटनगर में झड़प के दौरान पुलिस और कर्मचारी घायल हो गए थे।
  • भक्तपुर के सानो ठिमी स्थित सुधारगृह में दो समूहों के बीच झड़प के बाद आगजनी और तोड़फोड़ हुई।
  • बांके के नौबस्ता स्थित जयेंदु बाल सुधारगृह में भागने की कोशिश के दौरान पुलिस की गोलीबारी में पांच युवकों की मौत हो गई थी।

18 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे भी साथ

नियमों के अनुसार बाल सुधारगृह में केवल 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ही रखा जाना चाहिए। लेकिन कई स्थानों पर 18 वर्ष से अधिक उम्र के युवाओं को भी वहीं रखा जा रहा है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे छोटे बच्चों पर मानसिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और झगड़ों की संभावना बढ़ जाती है।


संसदीय समिति की रिपोर्ट में गंभीर टिप्पणी

संघीय संसद की कानून, न्याय तथा मानवाधिकार समिति ने 2081 में किए गए निरीक्षण में पाया था कि अधिकांश सुधारगृहों की स्थिति बेहद खराब है।

यह भी पढें   न्यायपालिका को आज्ञाकारी बनाने की कोशिश स्वीकार नहीं : कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश

रिपोर्ट में कहा गया कि कई स्थानों पर क्षमता से चार गुना अधिक बच्चे रखे गए हैं, जिससे स्वच्छता, स्वास्थ्य और भोजन की व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

समिति ने सरकार को सुझाव दिया था कि

  • बच्चों को उम्र और अपराध के आधार पर अलग-अलग रखा जाए
  • सुधारगृहों में शिक्षा, खेलकूद और मनोसामाजिक परामर्श की व्यवस्था की जाए
  • भौतिक पूर्वाधार में तत्काल सुधार किया जाए

हालांकि इन सुझावों का अब तक प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो पाया है।


सरकार का दावा

महिला, बालबालिका तथा ज्येष्ठ नागरिक मंत्रालय के प्रवक्ता चक्रबहादुर बुढा ने कहा कि सरकार सुधारगृहों की स्थिति सुधारने के लिए काम कर रही है।

उनके अनुसार क्षमता से अधिक बच्चों को अन्य सुधारगृहों में स्थानांतरित करने और कानून में संशोधन की प्रक्रिया जारी है।

सुधार केंद्र या अपराध की पाठशाला?

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जिन संस्थानों का उद्देश्य बच्चों को सुधारना था, वे धीरे-धीरे अपराध सीखने की जगह बनते जा रहे हैं।

भैरहवा के अधिवक्ता शिवप्रसाद गौंडेल के अनुसार, “कानून तो मौजूद है, लेकिन बच्चों के पक्ष में आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। उन्हें पढ़ने, खेलने और सामान्य जीवन जीने का अवसर भी नहीं मिल पा रहा।” (स्रोत: कांतिपुर)

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *