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विवाह पंचमी के दिन मिथिला में क्यों नहीं करते बेटी का विवाह ? : कैलास दास

 


कैलास दास, जनकपुरधाम । विवाह पंचमी हिंदू सांस्कृतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण तिथि है, जो मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है । जनकपुरधाम में सदियों पहले सम्पन्न भगवान श्रीराम और माता सीता के पौराणिक विवाह की स्मृति में यह पर्व आज भी उत्साह, आस्था और सांस्कृतिक गौरव के साथ मनाया जाता है । जनकपुरधाम की गलियों में विवाहोत्सव की धुन गूंजती है, शोभायात्राएँ निकलती हैं, मंडप सजते हैं और मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा और भी प्रकाशित हो उठती है।
लेकिन इन्हीं दिनों से एक रोचक परंपरा चली आ रही है । विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटी की विवाह नहीं करते । यह प्रश्न कई लोगों के मन में जिज्ञासा जगाता है जब देव युगल ने इसी दिन दांपत्य जीवन की शुरुआत की, तो फिर मनुष्यों के लिए यही दिन अशुभ क्यों माना गया ?
धर्मशास्त्र, सांस्कृतिक इतिहास और समाजशास्त्रीय व्याख्या से देखने पर इस परंपरा के मूल में गहरे कारण मिलते हैं । इन्हीं कारणों को विश्लेषणात्मक रूप से समझना आज भी उतना ही आवश्यक है । विवाह पंचमी के दिन विवाह न करने की परंपरा केवल धार्मिक विश्वास या अंधविश्वास नहीं है । इसकी जड़ रामसीता के जीवन–यात्रा में निहित गहन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक घटनाओं से जुड़ी है । भगवान राम और माता सीता का विवाह आदर्श था, परंतु उनका वैवाहिक जीवन निरंतर संघर्ष, परीक्षाओं और पीड़ाओं से भरा दिखाई देता है ।
राम के वनवास जाने पर सीता ने अत्यंत कष्टपूर्ण दिन झेले । वन में स्वर्ण–मृग का प्रलोभन, रावण द्वारा अपहरण, लंका में कैद, युद्ध के बाद अग्नि परीक्षा, और अंत में प्रजाजन की शंकाओं के कारण पुनः वन में एकाकी जीवन इन सभी घटनाओं ने सीता पर असाधारण मानसिक बोझ डाला ।
इन घटनाओं ने रामसीता की कथा को केवल प्रेम और समर्पण की कथा नहीं रहने दिया, बल्कि समाज की कठोरता, स्त्री–पीड़ा और दांपत्य जीवन की कठोर बाधाओं का प्रतीक भी बना दिया ।
शास्त्रों के ज्ञाताओं ने विवाह पंचमी के दिन विवाह न करने का सुझाव इन्हीं कारणों से दिया । इस दिन रामसीता के पावन विवाह की स्मृति तो जुड़ी ही है, परन्तु उसी स्मृति के साथ आगे जुड़ा दुखद जीवन–पथ भी स्मरण होता है । मानव जीवन में दुख स्मृतियाँ प्रतीकात्मक प्रभाव डालती हैं । इस मान्यता के अनुसार देव–दंपती की पीड़ाओं को याद करते हुए इस दिन विवाह से परहेजÞ उचित माना गया ।
धार्मिक ग्रंथ तिथि और नक्षत्रों को केवल खगोलीय गणना तक सीमित नहीं रखते; घटनाओं से उन्हें अर्थपूर्ण बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है । विवाह पंचमी के दिन उत्सव, शोभायात्रा, पूजा और व्रत अत्यंत शुभ माने जाते हैं, पर “नए दांपत्य जीवन की शुरुआत करना” उपयुक्त नहीं माना जाता ।
ज्योतिष की दृष्टि से भी विवाह पंचमी की तिथि सामान्यतः विवाह के लिए सर्वश्रेष्ठ ‘मुहूर्त’ में नहीं आती । शुक्र ग्रह जो प्रेम, दांपत्य और सौंदर्य का कारक है इस अवधि में कमजोर स्थिति में माना जाता है । सूर्य शुक्र की स्थिति कुछ असमतल होने से ‘संस्कार’ की अपेक्षा ‘आराधना’ को श्रेष्ठ माना गया है ।
धर्मशास्त्र केवल अनुष्ठानों का संकलन नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान को समझकर बनाए गए जीवन–नियम भी हैं । लोग नई जीवन–यात्रा शुरू करते समय शांति, शुभता और संतुलन खोजते हैं । वे स्वयं को सकारात्मक प्रतीक से जोड़ना चाहते हैं । इसी कारण समाज ने विवाह पंचमी पर विवाह न करने की सांस्कृतिक सलाह दी, ताकि नए दांपत्य की शुरुआत किसी दुखद कथा या कठिन यात्रा से प्रतीकात्मक रूप में न जुड़े ।
आज की युवा पीढ़ी विवाह और संस्कार को नए दृष्टिकोण से देखती है । वे ‘दिन, तिथि और नक्षत्र’ से अधिक ‘समझदारी, प्रेम, समर्पण और व्यवहारिकता’ पर बल देते हैं । परंपराओं के गहरे अर्थ को समझने पर यह स्पष्ट होता है कि इसमें कोई कठोरता या बाध्यता नहीं; बल्कि एक प्रकार का ‘संदेश’ छिपा है । विवाह जीवन की अत्यंत जिम्मेदार यात्रा है, जिसके लिए मन, विचार और समय सभी की तैयारी आवश्यक है ।
विवाह पंचमी पर विवाह न करना केवल धार्मिक प्रतिबंध नहीं; बल्कि गहरा सामाजिक मनोविज्ञान भी है । रामसीता की कथा केवल मिथक नहीं यह संबंधों की चुनौती, समाज की कठोरता, स्त्री–व्यक्तित्व के संघर्ष और दांपत्य जीवन की गहराई का मानवीय सत्य है । विवाह जैसा निर्णय जीवन का नया अध्याय है; उसकी शुरुआत को शुभ, स्थिर और संतुलित रखने की चेतना ने ही इस परंपरा को कायम रखा है ।
यद्यपि विवाह पंचमी को विवाह के लिए अशुभ कहा गया है, फिर भी यह दिन शुभ कर्मों के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है । इस दिन रामसीता की पूजा करने से दांपत्य जीवन में सद्भाव, सहिष्णुता और समर्पण बढ़ता है ऐसी मान्यता है ।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो विवाह पंचमी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है । विवाह केवल उत्सव नहीं; परिवार, दांपत्य और भविष्य तीनों के लिए संवेदनशील चरण है । हमारी संस्कृति ने विवाह को केवल दंपती का मिलन नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संस्था माना है । इसी कारण उपयुक्त समय चुनने और कुछ विशेष तिथियों को छोड़ने की परंपरा स्वाभाविक रूप से विकसित हुई है ।

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