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बहुमत का परीक्षण – डा. विधुप्रकाश कायस्थ

 

विधुप्रकाश कायस्थ, हिमालिनी, अंक मई । नेपाल के राजनीति में अभी का सीन बहुत दिलचस्प और चैलेंजिंग है । हाल ही में हुए चुनावों में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) को मिला जÞबरदस्त मैंडेट सिर्फÞ एक पार्टी की जीत नहीं है, बल्कि दशकों की राजनीतिक जडता के खिलाफÞ लोगों की ‘मौन बगावत’ का भी नतीजा है । परम्परागत राजनीतिक शक्तिप्रतिकों के प्रति नफÞरत ने इस बार नई ताकतों को पावर के सेंटर में ला दिया है । एक सीरियस सवाल खड़ा हो गया है । क्या यह नई ताकत नेपाल के राजनैतिक इतिहास में बार–बार दोहराए गए ‘बहुमत के श्राप’ से उबर पाएगी ?

इतिहास का आईना – हीरो से विलेन तक

नेपाल के आधुनिक इतिहास में, नेपाली लोगों ने बड़े बदलावों के लिए बड़े मैंडेट दिए हैं । बीपी कोइराला से लेकर गिरिजा प्रसाद कोइराला, पुष्प कमल दहल (प्रचंड) और केपी शर्मा ओली तक, नेपाली लोगों ने बार–बार पॉलिटिकल पार्टियों को ‘पावरफुल’ बनाया है । हालांकि उन्होंने डेमोक्रेसी को फिर से शुरू करने, रिपब्लिक घोषित करने और संविधान बनाने जैसे युगांतकारी काम किए, लेकिन जब राज करने की बात आई, तो वे उसी ‘बहुमत के पागलपन’ में पड़ गए ।
इतिहास ने हमें सबक सिखाया है । जब किसी पार्टी को भारी बहुमत मिलता है, तो वह संस्थाओं को मजबूत करने के बजाय उन्हें कंट्रोल करने की कोशिश करती है, और अंदरूनी डेमोक्रेसी कमजोर होती है । आखिर में, पार्टियां सत्ता पाने की होड़ में बिखराव के रास्ते पर चल पड़ती हैं । इतिहास का यह आईना रास्वपा के लिए सबसे बड़ा सबक होना चाहिए ।
‘स्वतंत्र किरदार’ और नई उम्मीदें
हालात से बने बालेन शाह जैसे ‘स्वतंत्र किरदारों’ ने रास्वपा के उदय में पॉलिटिकल एनर्जी डाली है । काठमांडू से तराई के खेतों तक फैली इस नई उम्मीद ने लोगों को बताया है– “विकल्प मुमकिन हैं ।” इस एनर्जी ने पॉलिटिक्स को ‘डिलीवरी और गुड गवर्नेंस’ की गिरफ्त में डाल दिया है । सेक्युलर, प्रोपोर्शनल और सबको साथ लेकर चलने वाली पॉलिटिक्स की नई परिभाषा लिखने की जिम्मेदारी अब रास्वपा के कंधों पर है ।
रास्वपा के लिए मौजूदा जनादेश जितना उत्साह बढ़ाने वाला है, उससे जुड़े ‘सत्ता के तीन खतरनाक लालच’ भी उतने ही मुश्किल हैं । इन लालचों का डिटेल्ड एनालिसिस इस तरह हैः
१. इंस्टीट्यूशनल कब्जÞे का लालचः नई पार्टी पर सत्ता में आने का बहुत ज्यादा दबाव होता है ताकि वह ‘जल्दी नतीजे’ दिखा सके । इस जल्दबाजÞी में, सरकार के परमानेंट अंगों (सिविल सर्विस, पुलिस और संवैधानिक संस्थाएँ) को ऑटोनॉमस छोड़ने के बजाय उन्हें पॉलिटिकल डायरेक्शन और कंट्रोल में चलाने की इच्छा पैदा हो सकती है । पहले भी, दूसरी पार्टियों ने भी सुधार के नाम पर इंस्टीट्यूशनल आजÞादी में दखल दिया है और उनका राजनीतिकरण किया है, जिससे आखिर में कानून का राज कमजÞोर हुआ है । रास्वपा को यह समझना होगा कि इंस्टीट्यूशन को नैचुरली और सही तरीके से ऑटोनॉमस बनाना ही असली और टिकाऊ सुधार है । सरकार के परमानेंट अंगों को करप्शन, भाई–भतीजावाद और फेवरिटिजÞ्म के लिए डायरेक्ट और चलाना सिर्फÞ थोड़े समय का फÞायदा है ।

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२. असहमति के प्रति असहिष्णुताः ऐसे मामले जहां बड़ी बहुमत या लोकप्रियता अक्सर नेताओं के घमंड को जन्म देती है, जो कहते हैं, “मैंने जो भी किया, सही किया”, नेपाल के लिए नए नहीं हैं । इससे पार्टी के अंदर अंदरूनी लोकतंत्र और बाहरी आलोचना को दुश्मनी के तौर पर देखने और अलग विचार रखने वालों को बेरहमी से दबाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है । अगर रास्वपा के अंदर और बाहर क्रिएटिव आलोचना को दबाने की अपनी प्रवृत्ति जारी रखता है, तो यह भी ’पुरानी पार्टी का नया रूप’ बन जाएगा । यह प्रवृत्ति रास्वपा में भी है । लोकतंत्र की खूबसूरती अलग–अलग विचारों का सम्मान करने में है । पार्टी की साख बचाने के लिए अलग–अलग विचारों का सम्मान करना जÞरूरी है ।
३. पॉपुलिज्म का जालः पॉपुलिजÞ्म मुश्किल समस्याओं के लिए ‘सस्ते और जल्दी’ समाधान ढूंढता है । गंभीर स्ट्रक्चरल सुधारों को लागू करने में समय लगता है और कभी–कभी वे फैसले तुरंत अप्रिय हो सकते हैं । हालांकि, जब हम ऐसे बेअसर काम में शामिल हो जाते हैं जो सिर्फ सोशल मीडिया पर वाहवाही बटोरता है या तुरंत ‘वायरल’ हो जाता है, तो राज्य की बुनियादी समस्याएं वैसी ही रहती हैं । रास्वपा के लिए, सस्ती पॉपुलैरिटी के ‘फÞैशन’ से जÞ्यादा जÞरूरी पॉलिसी स्टेबिलिटी का ‘ग्राउंड’ होना चाहिए ।

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ये तीन लालच ‘पॉलिटिकल ट्रैप’ हैं । अगर रास्वपा इंस्टीट्यूशनल ऑटोनॉमी, इंटरनल डेमोक्रेसी और लॉन्ग–टर्म पॉलिसी को सेंटर में रखती है, तभी यह अल्टरनेटिव फÞोर्स नेपाल का पॉलिटिकल फÞ्यूचर बदल सकती है । नहीं तो, इस पार्टी को इतिहास के एक और ‘मैजोरिटी के श्राप’ में हारने का भी रिस्क है ।

रास्वपा का असली टेस्ट अब ‘स्ट्रक्चरल रिफÞॉर्म की हिम्मत’ से जुड़ा है जो उसे करनी होगी । अगर उसने अपना कैरेक्टर और ट्रेंड नहीं बदला, तो नेपाल को और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा । रास्वपा, जिसने दो–तिहाई मैजोरिटी जीती है, को नेपाल के गवर्नेंस स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव लाने की जÞरूरत है । इसके तीन मेन पिलर का एनालिसिस इस तरह किया जा सकता हैः

  • १. एक्सपर्टीजÞ–बेस्ड एग्जीक्यूटिवः सत्ता में आई पार्टियों की ‘पावर के बंटवारे की पॉलिटिक्स’ और ‘नाकाबिल मिनिस्टर’ नेपाल के डेवलपमेंट में सबसे बड़ी रुकावटें हैं । रास्वपा को संवैधानिक नियमों में जÞरूरी बदलाव और संशोधन करने चाहिए और ऐसे मंत्रियों को नियुक्त करने की हिम्मत वाली प्रैक्टिस शुरू करनी चाहिए जो संसद के सदस्य नहीं हैं, लेकिन उन्हें संबंधित क्षेत्र में अनुभव और विशेषज्ञता हासिल है । सिर्फÞ वही मंत्री जो अपने मंत्रालयों के काम को समझते हैं, ब्यूरोक्रेसी को सही दिशा दे सकते हैं । इससे मंत्री का पद सिर्फÞ ‘राजनीतिक संरक्षण’ या ‘ क्रोनी कैपिटलिजÞ्म’ का जÞरिया बनने से रुकता है । एक्सपर्ट लीडरशिप पॉलिसी–लेवल के भ्रष्टाचार को रोकती है और नतीजे देने वाले शासन की नींव रखती है । प्लानिंग कमीशन को सिर्फÞ एक रस्मी संस्था नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि इसे तुरंत और लंबे समय की योजनाओं को मंत्रिपरिषद के फÞैसलों से जोड़ने और योजनाओं को लागू करने में असरदार तालमेल की भूमिका निभाने के लिए एक्टिव किया जाना चाहिए ।
  • २. सीधे चुने गए एग्जीक्यूटिव और चुनाव सिस्टम में सुधारः रास्वपा को ‘सीधे चुने गए एग्जीक्यूटिव’ (राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) के मुद्दे को लॉजिकल नतीजे पर लाने के लिए जल्द से जल्द कानूनी पहल करनी चाहिए । इससे लोगों और शासकों के बीच की दूरी कम होगी । साथ ही, नेशनल असेंबली को ऐसी जगह बनाने के बजाय जहाँ सिर्फÞ नेता के रिश्तेदार ही मैनेज करते हैं, इसे ‘सीधे चुने गए’ और बुद्धिजीवियों की असेंबली बनाना चाहिए । ऐसा सिस्टम पॉलिटिकल स्टेबिलिटी देगा और लीडरशिप को सीधे लोगों के प्रति जवाबदेह बनाएगा ।
  • ३. टेक्नोलॉजी और ट्रांसपेरेंसी की गारंटीः करप्शन की जड़ ओपेक प्रोसेस और बोझिल एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस हैं । रास्वपा को ‘डिजिटल गवर्नेंस’ को सिर्फÞ नारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि हर सरकारी सर्विस को टेक्नोलॉजी से जोड़ना चाहिए । फेसलेस सर्विस से रिश्वत की संभावना खत्म हो जाएगी । चुनाव खर्च में ट्रांसपेरेंसी सबसे जÞरूरी है । जब तक चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ेंगे, तब तक करप्शन को रोकना नामुमकिन है । रास्वपा को ‘स्टेट फंडिंग’ या डिजिटल डोनेशन सिस्टम अपनाकर चुनाव सुधार का एक उदाहरण पेश करना चाहिए । ये सुधार सिर्फÞ टेक्निकल बदलाव नहीं हैं, बल्कि नेपाल की डेमोक्रेसी को ‘डिलीवरी’ से जोड़ने वाली कड़ी हैं । रास्वपा को इन सिस्टमिक बदलावों को इंस्टीट्यूशनल बनाने की जÞरूरत है । नहीं तो, उस पर भी ’पुरानी शराब, नई बोतल’ का आरोप लगेगा । नेपाली पॉलिटिक्स का असली ’गेम चेंजर’ साबित करने के लिए, रास्वपा को अपनी सरकार के हनीमून पीरियड में १०० प्रोग्रेसिव और क्रांतिकारी काम करके अपने वादों के प्रति ईमानदार साबित होना होगा, जैसा कि चुनाव से पहले वादा किया गया था ।
  • इस बार, नेपाल के वोटरों ने रास्वपा को सिर्फÞ ‘शासन’ करने के लिए नहीं, बल्कि ‘सिस्टम’ बदलने के लिए भी भेजा है । अगर इस जनादेश को सिर्फÞ सत्ता की सीढ़ी बनाया गया, तो इतिहास रास्वपा को एक और ‘असफल एक्सपेरिमेंट’ के तौर पर याद रखेगा । अगर इस ताकत को इंस्टीट्यूशनल सुधारों में बदला जा सका, तो यह नेपाल की डेमोक्रेसी में नई जान डाल देगा । समय की जÞरूरत है कि बिना किसी वर्चस्व की होड़ के रास्वपा के नेता डेमोक्रेसी की सफाई और मजÞबूती के लिए नतीजे देने वाले काम करें ।
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डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ, काठमांडू

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