हिमालयी राष्ट्र पर महाशक्तियों की दृष्टि- अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी पत्रिका । “वर्तमान विश्व राजनीति में शक्तिशाली राष्ट्र–विशेषकर अमेरिका–अपनी वैश्विक प्रभुत्व की नीति को बनाए रखने के लिए छोटे और कमजोर देशों को रणनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं । मेरे अनुसार नेपाल, जो कभी वैदिक ज्ञान, आध्यात्मिक साधना और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है, आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जटिल चक्रव्यूह में फँसता हुआ दिखाई देता है । क्योंकि अमेरिका की विदेश नीति अक्सर प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय आर्थिक सहायता, विकास परियोजनाओं और सुरक्षा सहयोग जैसे साधनों के माध्यम से अपने प्रभाव को विस्तार देने की रणनीति पर आधारित होती है । ःऋऋ ९ःष्ििभललष्गm ऋजबििभलनभ ऋयचउयचबतष्यल० और प्रस्तावित क्एए ९क्तबतभ एबचतलभचकजष्उ एचयनचबm० को इसी नीति के उदाहरण के रूप में देखा गया है । औपचारिक रूप से इन कार्यक्रमों का उद्देश्य आर्थिक विकास, अवसंरचना निर्माण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा क्षमता को बढ़ाना बताया जाता है, किंतु आलोचनात्मक दृष्टिकोण से इन्हें अमेरिका की “सॉफ्ट पावर” या प्रभाव विस्तार की नीति का हिस्सा माना जाता है । अमेरिका की वैश्विक रणनीति का प्रमुख लक्ष्य चीन और भारत की बढ़ती शक्ति को रोकना है । इसके लिए वह ऊर्जा स्रोतों, क्षेत्रीय गठबंधनों और सामरिक साझेदारियों के माध्यम से चीन और भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है । ईरान, रूस और मध्य–पूर्व की राजनीति भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी गई है । इस संदर्भ में नेपाल जैसे हिमालयी देश का भौगोलिक महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि यह भारत और चीन के बीच स्थित एक संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र है ।
यदि नेपाल ऐसे सुरक्षा सहयोग समझौतों में गहराई से जुड़ता है, तो इससे उसकी पारंपरिक असंलग्न विदेश नीति, संप्रभुता और सांस्कृतिक स्वायत्तता पर प्रश्न उठ सकते हैं । साथ ही भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संतुलन भी प्रभावित हो सकता है । शक्तिशाली देश सहायता और सहयोग के माध्यम से धीरे–धीरे राजनीतिक और सामरिक प्रभाव स्थापित करते हैं, जिससे छोटे देशों की नीति–निर्माण प्रक्रिया पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ सकता है । अतः अंतरराष्ट्रीय सहायता और सहयोग को केवल आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, राजनीतिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अस्मिता और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए । विशेष रूप से नेपाल जैसे देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे बाहरी शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र नीति की रक्षा करते हुए संतुलित कूटनीति अपनाएँ ।”
विश्वका पहला सर्वाधिक पवित्र देश नेपाल जहां हिंदू, बौद्ध और किरात धर्म तथा संस्कृति का उद्गम हुआ । जहां से वैदिक ज्ञान और तांत्रिक सूत्रों का आविर्भाव हुआ । जहां सांसारिक जीवन के दुःख से मुक्ति का मार्ग निकला । जहां ब्रह्म से एकाकार के लिए ध्यान, योग और भक्ति के मार्ग प्रशस्त हुए । जहां ब्रह्मांड के ॐ रूपी कुंजी को खोजकर अहम ब्रह्मास्मि जैसे परम तत्व का उद्घोष हुआ । वह दिव्य विभूतियों से युक्त राष्ट्र आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति के रोमांचकारी चक्रव्यूह के अभिमन्यु बनता जा रहा है । देश को पार्टी के हाथों का कठपुतली बना दिया गया है और पार्टी के नेतृत्व विदेशियों के हाथों का कठपुतली बनने में गौरवान्वित अनुभव करते हैं । हम उन्हें अपना और देश के रक्षक मानकर सर्वाधिक सम्मान भी देते हैं । जो कि हमारी मजबूरी भी है । क्योंकि हम स्वतंत्र गुलाम होने के कारण इसके अतिरिक्त कुछ कर भी नहीं सकते । हम सब भावी भीषण खतरा को समझते हुए भी ’एमसीसी’ नहीं रोक पाएं । अमेरिकी सेना को नहीं रोक पाएं । अरे जिसने इसे पास कराने और लाने में जनता के साथ धोखा किया उसे हम चुनाव में स्वागत करने को मजबूर हो गए । न चाहते हुए भी पूरा देश जला दिया गया । बच्चों को गोलियों से भून दिया गया । सरकार को गिरा दिया गया और चुनाव करा दिया गया । इसमें कहां पर नेपाली आम जनता से सहमति ली गई थी ? लेकिन सबकुछ हो रहा है,और हम उसमें सहभागी होने को मजबूर हैं । क्या हम स्वतंत्र हैं ? क्या नेपाल स्वतंत्र है ? वर्तमान में यह अति विचारणीय विषय है ।
हम सबलोग जानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच दुनिया का बॉस बनने की जंग चल रही है । बाकी जो कुछ भी दुनिया में बदलाव दिख रहा है, वह इसी महाभारत के छोटे–छोटे हिस्से हैं । आज पूरी दुनिया को हम एक ऐसी जेल मान सकते हैं जिसका कोई एक सर्वमान्य जेलर नहीं है । सारे के सारे देश कैदियों की तरह हैं । और हर कैदी इस जेल का ‘दादा’ या जेलर बनना चाहता है, क्योंकि जो शक्तिशाली होगा, वह सबसे ज्यादा सुरक्षित रहेगा और पूरी जेल पर उसी का राज चलेगा । फिलहाल यह ताज अमेरिका के पास है, और चीन इसे छीनने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है ।
अमेरिका समझ गया है कि अब असली खतरा यूरोप या मध्य–पूर्व में नहीं, बल्कि पूर्व यानी चीन में है । इसलिए, वह अपना पूरा पैसा, हथियार और ध्यान चीन के बढ़ती ताकत को रोकने में लगाना चाहता है । लेकिन अमेरिका के पास भी असीमित ताकत नहीं है, उसे प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं कि पहले किस मोर्चे को नियंत्रण में लिया जाए ? वर्तमान में ईरानी मोर्चा उसी योजना का एक जबरदस्त अंग है । ध्यान रहे, ईरान अमेरिका का कट्टर दुश्मन है और चीन का सबसे बड़ा मददगार । ईरान पर बहुत सी पाबंदियां हैं, इसलिए वह अपना लाखों बैरल तेल चीन को भारी डिस्काउंट पर बेचता है । इस बहुत सस्ती ऊर्जा की वजह से चीन की ताकत तेजी से बढ़ रही है । बदले में ईरान, चीन से हथियार खरीदता है और रूस जैसे देशों को खतरनाक ड्रोन सप्लाई करता है । इधर अमेरिका जानता है कि चीन की सबसे बड़ी कमजोरी यही ऊर्जा है । इसलिए अमेरिका की रणनीति सीधी है कि चीन तक पहुंचने वाले इस सस्ते तेल की पाइपलाइन को काटा जाए । दुनिया भर में, जैसे वेनेजुएला और शायद आगे रूस में भी, अमेरिका जो चालें चल रहा है, उसका एक बड़ा मकसद यही है कि चीन को सस्ता तेल न मिले और अमेरिका आर्थिक रेस में उसे आसानी से पीछे छोड़ सके ।
एक ही समय में चीन, रूस और मध्य–पूर्व जैसे मोर्चों पर लड़ना अमेरिका के लिए भी असंभव है । इसलिए, चीन जैसे ’मजे हुए देश’ से भिड़ने से पहले ईरान को कब्जा में लेना ही होगा । अमेरिका चाहता है कि वह ईरान के मुद्दे को इतना शांत या कमजोर कर दे कि मध्य–पूर्व की चाभी इजरायल लगायत अपने सहयोगियों के हाथों में सौंपकर, वह पूरी तरह से चीन पर केंद्रित हो सके ।
इसके बाद चीन को घेरने के लिए नेपाल और अमेरिका के बीच प्रस्तावित क्एए ९क्तबतभ एबचतलभचकजष्उ एचयनचबm० समझौता होना है । इसी समझौता के लिए अमरीका अप्रत्यक्ष रूप से वर्तमान समय में नेपाली राजनीतिक परिदृश्य को गंभीरता के साथ दृष्टिपात करते आ रहा है ।यह समझौता नेपाल के राजनीतिक तथा सुरक्षा दृष्टि से कुछ लाभदायक हो सकते हैं, परन्तु, विशेषकर देश की स्वतंत्र नीति और सांस्कृतिक स्वायत्तता के संदर्भ में इसके कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं ।
नेपाल ऐतिहासिक रूप से असंग्लन ९ल्यल–ब्ष्निलmभलत० की नीति पर चलने वाला देश रहा है, इसलिए किसी सैन्य या सुरक्षा सहयोग कार्यक्रम से जुड़ना इसकी तटस्थ विदेश नीति पर प्रश्न खड़ा कर सकता है । इससे पड़ोसी देशों–विशेषकर चीन और भारत–के साथ कूटनीतिक संतुलन भी प्रभावित होने की संभावना है । सांस्कृतिक दृष्टि से भी कुछ लोगों को यह डर है कि ऐसे समझौते के माध्यम से बाहरी प्रभाव, पश्चिमी जीवन–शैली और मूल्य धीरे–धीरे स्थानीय परम्पराओं, सामाजिक संरचनाओं और राष्ट्रीय पहचान पर असर डाल सकते हैं । इसके अतिरिक्त, यदि सुरक्षा सहयोग के नाम पर विदेशी सैन्य उपस्थिति या प्रभाव बढ़ता है, तो जनता में यह भावना उत्पन्न हो सकती है कि देश की संप्रभुता और निर्णय–स्वतंत्रता कमजोर हो रही है । इस प्रकार क्एए जैसे समझौते केवल रणनीतिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का विषय भी बन सकते हैं, इसलिए किसी भी निर्णय से पहले राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय संतुलन और सांस्कृतिक अस्मिता को ध्यान में रखना अति आवश्यक माना जाएगा ।
नेपाल और अमेरिका के बीच क्एए ९क्तबतभ एबचतलभचकजष्उ एचयनचबm० जैसे सुरक्षा सहयोग समझौते का प्रभाव केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका मनोवैज्ञानिक–सामरिक दबाव भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों पर भी पड़ सकता है । नेपाल भौगोलिक रूप से भारत और चीन के बीच स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र है, इसलिए यहाँ किसी भी बाहरी शक्ति की सुरक्षा या सैन्य भागीदारी दोनों देशों के लिए संवेदनशील विषय बन बनना स्वाभाविक है । यदि अमेरिका नेपाल के साथ सैन्य प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन या सुरक्षा सहयोग के नाम पर अपनी उपस्थिति बढ़ाता है, तो चीन को यह आशंका हो सकती है कि उसकी सीमा के निकट अमेरिकी प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे उसकी सुरक्षा नीति प्रभावित हो सकती है । दूसरी ओर भारत भी नेपाल को अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र और रणनीतिक सुरक्षा घेरे का हिस्सा मानता है, इसलिए अमेरिका की बढ़ती भूमिका से भारत को भी क्षेत्रीय संतुलन बदलने का डर हो सकता है । परिणामस्वरूप भारत और चीन दोनों नेपाल की राजनीति, कूटनीति और सुरक्षा नीतियों में अधिक सक्रिय होने का प्रयास कर सकते हैं । इस प्रकार क्एए जैसे समझौते से दक्षिण एशिया और हिमालयी क्षेत्र में भूराजनैतिक प्रतिस्पर्धा (न्भयउयष्तिष्अब िअयmउभतष्तष्यल) बढ़ने तथा भारत–चीन–अमेरिका के बीच सामरिक संतुलन पर दबाव पड़ने की संभावना बन सकती है ।
नेपाल से जुड़े ः ःष्ििभललष्गm ऋजबििभलनभ ऋयचउयचबतष्यल और प्रस्तावित क्एए ९क्तबतभ एबचतलभचकजष्उ एचयनचबm० को लेकर क्षेत्र में कई प्रकार की राजनीतिक और रणनीतिक चर्चाएँ होती रही हैं । कुछ लोग यह आशंका व्यक्त करते हैं कि ये समझौते बड़े भू–राजनीतिक खेल का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि इनका उद्देश्य चीन से तिब्बत को मुक्त करना या भारत पर सीधा दबाव बनाना है । ःऋऋ मुख्यतः आर्थिक सहायता कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत नेपाल में बिजली प्रसारण लाइन और सड़क संरचना के विकास पर ध्यान दिया जाना है । इसका घोषित उद्देश्य आर्थिक विकास और क्षेत्रीय ऊर्जा व्यापार को बढ़ावा देना है । दूसरी ओर क्एए अमेरिकी नेशनल गार्ड के साथ साझेदारी का एक कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य सामान्यतः आपदा प्रबंधन, मानवीय सहायता, और सुरक्षा प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना बताया जाता है । हालाँकि, भू–राजनीतिक दृष्टि से अमेरिका, चीन और भारत के बीच एशिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा तीव्रता के साथ सक्रिय है । इसलिए कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों से क्षेत्र में अमेरिका की उपस्थिति और प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे चीन सतर्क हो सकता है और भारत भी क्षेत्रीय संतुलन को लेकर नेपाल प्रति के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने पर मजबूर हो सकता है । फिर भी इन समझौतों को सीधे तौर पर तिब्बत की मुक्ति या भारत को दबाव में रखने की रणनीति कहना अधिकतर विश्लेषणात्मक या राजनीतिक व्याख्या मानी जाती है, न कि प्रमाणित तथ्य ।
विकास और सुरक्षा सहयोग से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों–जैसे ःऋऋ या प्रस्तावित क्एए को लेकर दो प्रकार की व्याख्याएँ प्रचलित हैं । एक दृष्टिकोण यह है कि ये कार्यक्रम आर्थिक सहायता, संरचना विकास, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं, जिससे छोटे या विकासशील देशों को तकनीकी और वित्तीय सहयोग मिलता है । इस दृष्टि से इन्हें अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और सहयोग का माध्यम माना जाता है ।
दूसरा दृष्टिकोण अधिक आलोचनात्मक है । कुछ विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शक्तिशाली देश कभी–कभी सहायता, निवेश या सुरक्षा सहयोग के माध्यम से छोटे देशों पर राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं । इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी–कभी “सॉफ्ट पावर” या “प्रभाव विस्तार” की नीति कहा जाता है । इस प्रक्रिया में आर्थिक सहायता, सैन्य प्रशिक्षण या तकनीकी सहयोग के जरिए उस देश की नीतियों, निर्णयों और क्षेत्रीय राजनीति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव बढ़ सकता है । हालाँकि यह भी सच है कि हर समझौते का परिणाम समान नहीं होता । किसी देश की ’सार्वभौमिकता, मजबूत संस्थाएँ, पारदर्शिता और संतुलित विदेश नीति’ यह तय करती हैं कि वह ऐसे सहयोग से केवल विकासात्मक लाभ लेता है या बाहरी प्रभाव अधिक बढ़ने देता है । इसलिए ऐसे समझौतों का मूल्यांकन करते समय राष्ट्रीय हित, पारदर्शिता और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण माना जाता है । परन्तु नेपाल जैसे कमजोर देश और नेपाली नेताओं के धन लोलुप एवं पद लोलुप संस्कार होने तथा राष्ट्रीय स्वार्थ से अधिक व्यक्तिगत लाभोंमुख प्रवृति हावी रहने के कारण ऐसे समझौता से आम जनता में नकारात्मक सोच का बढ़ना स्वाभाविक ही है । ध्यान रहे! राजेंद्र महतो ने तो संसद भवन में ही बोले थे,“देश बेचुवा कौन कौन है ? इसका पता लगाना जरूरी है“ अर्थात् संसद में देश बेचुवा भी विद्यमान हैं ।
अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों के साथ किए गए विकास और सुरक्षा सहयोग समझौतों के कई उदाहरण मिलते हैं । इनमें विशेष रूप से ःष्ििभललष्गm ऋजबििभलनभ ऋयचउयचबतष्यल ९ःऋऋ० और क्तबतभ एबचतलभचकजष्उ एचयनचबm ९क्एए० महत्वपूर्ण माने जाते हैं । नेपाल में १४ सितम्बर २०१७ को ःऋऋ समझौता पर हस्ताक्षर किए गए, और २०२२ में संसद से अनुमोदन किया गया । बिजली प्रसारण लाइन और सड़क सुधार परियोजना के लिए लगभग ५०० मिलियन डॉलर सहायता प्राप्त हुआ । ऊर्जा व्यापार और संरचना विकास की संभावना बढ़ी । परन्तु यह रकम वास्तव में देश हित में लगाया गया कि देश बेचुवा के वंश हित में लगाया गया ? इसका सूक्ष्म छानबीन किए बिना आगे कदम बढ़ाना उसी परंपरा को गतिमान रखना साबित होगा । हम जानते हैं कि इस समझौते को लेकर देश के भीतर राजनीतिक विवाद और संप्रभुता को लेकर बहस निरंतर जारी है । चीन और अमेरिका के बीच भू–राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव भी स्पष्ट दिखने लगा है । जिसका खामियाजा नेपाली देशभक्त नागरिक को ही भुगतना पड़ेगा ।
इसी तरह २००२ में क्एए अमेरिका–फिलिपींस सैन्य सहयोग कार्यक्रम समझौता हुआ ।आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण और सैन्य क्षमता में वृद्धि हुई । आपदा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग में सुधार हुआ । लेकिन, विदेशी सैन्य प्रभाव बढ़ने पर स्थानीय विरोध एवं चीन के साथ दक्षिण चीन सागर विवाद में तनाव को भी जन्म दिया ।
ऐसे ही जॉर्जिया में क्एए १९९४ से अमेरिकी नेशनल गार्ड के साथ साझेदारी की गई । सेना का आधुनिकीकरण हुआ और प्रशिक्षण दिया गया । नाटो देशों के साथ सहयोग बढ़ा । परन्तु रूस के साथ संबंधों में तनाव और सुरक्षा प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी ।
इसी तरह घाना में २००६ में ःऋऋ कॉम्पैक्ट समझौता हुआ । जिसमें कृषि, सड़क और ऊर्जा क्षेत्र में विकास परियोजनाएँ लाई गई । देश की आर्थिक वृद्धि और निवेश में सुधार हुआ । लेकिन कुछ लोगों ने इसे विदेशी प्रभाव बढ़ने का माध्यम माना । एवम् आर्थिक नीतियों पर बाहरी प्रभाव की आशंका भी जताई गई । इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका के साथ ऐसे समझौते कई देशों में विकास, सुरक्षा प्रशिक्षण और अवसंरचना सुधार का अवसर देते हैं, लेकिन साथ ही राजनीतिक विवाद, भू–राजनीतिक दबाव और संप्रभुता संबंधी चिंताएँ भी उत्पन्न कर सकते हैं । किसी भी देश के लिए इन समझौतों का वास्तविक प्रभाव उसकी राष्ट्रीय नीति, कूटनीतिक संतुलन और आंतरिक राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर करता है ।


