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मधेश की राजनीति में एमाले की मनमानी : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी आवरण, अंक नवंबर । मधेश प्रदेश में सोनल सरकार के गिरने और नई सरकार बनाने के नवीनतम कदम ने काठमांडू तक खलबली मचा दी है । कांग्रेस से लेकर रास्वपा तक ने सरकार गठन की प्रक्रिया पर अपनी आपत्ति जताई है । संविधान के अनुच्छेद १६८(२) के तहत मुख्यमंत्री नियुक्त किए गए जितेंद्र सोनार (सोनल) के इस्तीफा देने के बाद, विभिन्न दलों में इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया था कि नया मुख्यमंत्री किस अनुच्छेद के तहत बनाया जाएगा । प्रदेशसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले सात राजनीतिक दलों, कांग्रेस, जसपा, लोसपा, माओवादी केंद्र, एकीकृत समाजवादी पार्टी, जनमत पार्टी और नागरिक उन्मुक्ति पार्टी, ने अनुच्छेद १६८(२) के अनुसार नई सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया था । प्रदेशसभा में सबसे बड़े दल ने कहा था कि सरकार बनाने की प्रक्रिया अनुच्छेद १६८(३) के अनुसार शुरू होनी चाहिए । दलों का अपना–अपना प्रयास स्वाभाविक है । हालाँकि, प्रदेश प्रमुख भंडारी के पास उन अनुच्छेदों और धाराओं के अनुसार आगे बढ़ने का विकल्प था जिन पर वह स्वयं सहमत थीं । उसके बाद, भिन्न राय रखने वाला पक्ष संवैधानिक व्याख्या के लिए अदालत जा सकता था । किन्तु ऐसा ना कर भंडारी ने मुख्यमंत्री की नियुक्ति की और एक होटल में शपथ दिलाई, जो उनके संवैधानिक दायित्वों और राजनीतिक आचरण का हनन है ।

 

एमाले ने जिस तरह होटल में हुए राजनीतिक नाटक के पक्ष में बात की, उससे पता चलता है कि उसे अभी तक अपनी गलती सुधारने का सही समय नहीं मिला है । वह अब तक जमीनी स्तर पर व्यक्त आक्रोश का आकलन नहीं कर पाई । अदालती आदेश के बाद भी, एमाले ने मधेश प्रदेश में अपनी कमजोरी स्वीकार नहीं की है । चूँकि मधेश का भूगोल या मधेश संघर्ष से उपजा संघवाद केवल वहाँ की राजनीतिक ताकतों की संपत्ति नहीं, बल्कि सभी नेपालियों की साझी विरासत बन गया है, इसलिए इस पर व्यापक सार्वजनिक बहस जारी रखना उचित होगा । मधेश प्रदेश प्रमुख भंडारी इस समय अपनी अराजनीतिक शैली के कारण आलोचनाओं के केंद्र में हैं । कुछ लोगों ने इस घटना को संघवाद पर आरोप लगाने के अवसर के रूप में लिया है । भंडारी के निर्णय की संवैधानिक समीक्षा न्यायालय द्वारा की जाएगी, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट दर्ज की गई है । पहली नजÞर में अराजनीतिक आचरण दिखाने वाली भंडारी को उनके पद से मुक्त कर दिया गया है । भंडारी के जाने से यह संदेश स्थापित हुआ है कि सरकारी अहंकार स्वीकार्य नहीं है । ऐसे संदेश को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए ।

संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों की कार्यशैली और निर्णयों में राजनीतिक समाधान और संविधान के सकारात्मक उपयोग को हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए । संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । लेकिन भंडारी की कार्यशैली उस ओर उन्मुख नहीं दिखी । वह राजनीतिक समझ और संवाद के साथ अपने निर्णय ले सकती थीं । वह अपनी मान्यताओं को सभी दलों के बीच प्रस्तुत कर सकती थीं । लेकिन गैर–जिम्मेदाराना तरीके से आगे बढ़ते हुए, मधेश प्रददेश तोड़फोड़ और आरोपों का केंद्र बन गया है ।

सर्वोच्च ने एक होटल में शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री पर लगाम कसी है । मधेश प्रदेश के नवनियुक्त मुख्यमंत्री, एमाले नेता सरोज कुमार यादव और उनकी सिफरिश पर गठित मंत्रिपरिषद को कोई भी दीर्घकालिक नीतिगत फसला न लेने का अंतरिम आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किया जाना एक ऐतिहासिक आदेश है ।

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मधेश में रोज इसका विरोध हो रहा है साथ ही वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू करने की भी मांग की जा रही है । विभिन्न दलों के द्वारा यह विवाद तब से शुरू है जब से प्रदेश प्रमुख ने सबसे बड़ी पार्टी, एमाले संसदीय दल के नेता सरोज कुमार यादव को मुख्यमंत्री नियुक्त किया है । इस निर्णय का विरोध स्वरूप सांसदों, नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री, प्रदेश प्रमुख और मंत्रालयों के कार्यालयों में तालाबंदी के साथ ही जमकर तोड़फोड़ की ।
जनमत पार्टी, नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा–माओवादी केन्द्र और नेकपा एकीकृत समाजवादी) सहित संघीय लोकतांत्रिक मोर्चा इस कदम का एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं । राजेंद्र महतो के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल भी इस निर्णय का खुलकर विरोध कर रही है और राष्ट्रपति से इस विषय में दखल करने की मांग भी कर रही है ।

कथित मुख्यमंत्री यादव के लिए आसानी से पदभार ग्रहण करना, निर्णय लेना और उन्हें लागू करना मुश्किल है । एक प्रदेश प्रमुख का राजनीतिक धोखाधड़ी का वाहक होना उचित नहीं है । सभी सात प्रदेशों के प्रमुखों को इस मुद्दे का ध्यान रखना चाहिए । संघीयता के साथ–साथ, प्रदेश सरकार भी २०७४ में प्रचलन में आई । तब से, सत्ता की राजनीति के विवादास्पद खेल चल रहे हैं । लगभग सभी प्रदेशों में, संघवाद स्वयं सत्ता की राजनीति से बदनाम हो रहा है । ऐसे में, मधेश प्रदेश पर बहुतों की निगाहें थीं । क्योंकि, मधेश प्रदेश नेपाली संघीयता का जन्मस्थान है । अन्य प्रदेशों में चाहे कुछ भी हो, संघीयता के समर्थक मधेश से संघीयता का सार निकालने की अपेक्षा करते थे । लेकिन वर्तममान में यह साबित हो रहा है कि मधेश प्रदेश संघीयता में नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष में रुचि रखता है । संघीयता के समर्थकों के लिए यह बहुत निराशाजनक स्थिति है । यदि इसे फिर से आशा में बदलना है, तो संघीयता समर्थक दलों और हितधारकों को तुरंत स्थिति को आशा में बदलने के लिए काम करना शुरू करना चाहिए । मुख्य रूप से, प्रदेशसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले दलों को प्रदेश की राजनीति को अपने नियंत्रण में रखने और अपने विवेक का उपयोग करके समाधान खोजने का विश्वास दिखाना चाहिए ।

प्रदेश में राजनीतिक उथल–पुथल का मुख्य कारण बड़ी पार्टियों के नेताओं का अत्यधिक हस्तक्षेप है । उन्होंने प्रदेश गतिविधियों में हस्तक्षेप किया है, जैसे कि किसे मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्य मंत्री, अध्यक्ष÷उपाध्यक्ष, पार्टी नेता, सचेतक का पद दिया जाएगा, कौन किसके साथ सहयोग करेगा और किस तरह के गठबंधन बनेंगे और टूटेंगे । अजीब बात यह है कि संघीय सत्ता गठबंधन की तरह ही राज्य सत्ता गठबंधन भी बना है । पार्टियों के केंद्रीय नेतृत्व ने कभी भी प्रदेशों के संसदीय दलों को अपने विवेक का इस्तेमाल करने और परिपक्व होने का मौका नहीं दिया । यही वजह है कि संघीयता का सही मर्म सामने नहीं आ रहा है और सिर्फ कुर्सी का खेल चल रहा है ।

फिलहाल नेपाल की राजनीति में एकता और गठबंधन का प्रयास शुरु हो चुका है । जेन जी आन्दोलन के बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कई पार्टी पुराने मतभेदों को भुलाकर आने वाले चुनाव के लिए एकजुट होने लगे हैं । उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल, महंत ठाकुर की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) नेपाल, रेशम चौधरी की नागरिक उन्मुक्ति पार्टी, महतो की राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी, हृदयेश त्रिपाठी की जनता प्रगतिशील पार्टी, ब्रषेश चंद्र लाल की तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी (तमलोपा) और केपी पालुंगवा की नेपाल जनमुक्ति पार्टी ने संघीय लोकतांत्रिक मोर्चा का गठन किया है ।
वहीं जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत एकबार फिर से वही राग अलाप रहे हैं, जिससे उन्होंने दूरी बना ली थी । उनके अनुसार स्वायत्त मधेश घोषित करने का अवसर आ गया है । यानि सभी उस अवसर की तलाश में जिससे सत्ता सुख की प्राप्ति हो सके ।

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मधेश प्रदेश में एमाले के नेतृत्व वाली सरकार के गठन ने क्षेत्र में ध्रुवीकरण को और भी हवा दे दी है । सभी इसी बहाने देश हित का दावा करते हुए एक ही बैनर की तले आने के लिए प्रयासरत है क्योंकि उनके अनुसार देश खतरे में है और उन्हें देश की राजनीति को स्थिर करने के लिए एकता करनी ही चाहिए । जनता इस खेल से भलीभाँति परिचित है किन्तु इस खेल को देखने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है । पिछले दिनों परिवर्तन के नाम पर जो हुआ है उससे एकबार फिर देश कई वर्ष पीछे जा चुका है और परिणाम आगे भी पूर्व की भांति शून्य की अवस्था में ही है ।
जहाँ तक मधेश की राजनीति का सवाल है तो एकबार फिर वही चेहरे, वही पार्टी एकीकृत हो रहे हैं । किसी भी लोभ में न आने की बात कर रहे हैं । देश, मधेश और संघीयता को बचाने के लिए एकता की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं । जबकि अतीत में, सत्ता संघर्ष के दौरान इन्हीं पार्टियों और सांसदों के बीच टकराव होते देखा गया है । आज भले ही ये दावा इनके द्वारा किया जा रहा है कि असंवैधानिक सत्ता संघर्ष का प्रलोभन एकता और मोर्चे को प्रभावित नहीं करेगा । किन्तु ये सारे दावे उसी समय तक अस्तित्व में होते हैं जब तक चुनाव ना हो जाए ।

फिलहाल नवगठित मोर्चे के भीतर सात दलों के प्रतिनिधियों वाला एक सचिवालय बनाया गया है जहाँ एकता, समन्वय और एकीकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा की जा रही है । वैसे इस मोर्चे से राजेंद्र श्रेष्ठ और अशोक राई के नेतृत्व वाली जसपा ने फिलहाल दूरी बना रखी है । जनमत पार्टी भी खुद को अलग रखे हुए है ।
लोसपा नेपाल के नेता सर्वेंद्रनाथ शुक्ला का कहना है कि एकीकरण के उद्देश्य से जसपा नेपाल और तमलोपा सहित अन्य दलों के साथ चर्चा चल रही है, जो सकारात्मक और संतोषजनक है । उसी तरह जसपा नेपाल के नेता मनीष सुमन के अनुसार भी उनकी पार्टी मधेश, जनजाति और आदिवासी दलों के साथ भी बातचीत कर रही है, जिनके विचार, मुद्दे और सिद्धांत समान हैं । पार्टी छोड़कर गए साथियों से भी वापस आने का अनुरोध किया जा रहा है । यानि जनता को फिर से ठगने के लिए रूठने और मनाने का दौर जारी है ।

जेन–जी आंदोलन अन्याय और कुशासन के विरुद्ध असंतोष से भड़का था, जिससे राजनीतिक दलों के पास सीखने और सुधरने के केवल दो ही विकल्प हैं–अपनी नीति और सोच में सुधार करें या फिर समाप्त हो जाएँ । देखा जाए तो इन दोनों ही स्थितियों में, देश का भला होगा । बेहतर होगा कि इतिहास और अनुभव वाली पार्टियाँ खुद को सुधारें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से नेतृत्व में आएँ और स्वीकृत हों । हालाँकि, अगर वे पुरानी शैली और सोच से चिपके रहकर, खुद को सुधारने की अनिवार्यता को नजÞरअंदाजÞ करके फिर से स्थापित होना चाहते हैं, तो बेहतर होगा कि वे समाप्त ही जाएँ । ताकि दूसरे लोग खाली जगहों का भरेंगे । एक ऐसा नेतृत्व जो अहंकारी और मूर्ख हो, जो यह सोचता हो कि, ‘मुझे परवाह नहीं कि दुनिया क्या कहती है, मैं ही सही हूँ, मेरे बिना देश बर्बाद हो जाएगा’, वर्तमान समय और पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता । ऐसे नेतृत्व और उसे स्वीकृत करने वाली पार्टी के पास केवल एक ही विकल्प होगा–समाप्त जाना ।

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समस्या को सुधारने या सुलझाने में जितनी देर होगी, देश की राजनीतिक गति और दिशा उतनी ही उलझती जाएगी । पार्टियों के पास दीर्घकालिक स्थिरता की सुविधा नहीं होती । चाहे वह केवल पिछले चुनाव में भाग लेने वाली पार्टी हो या दशकों का इतिहास रखने वाली पार्टी, यह बात सभी पर समान रूप से लागू होगी । दूसरे उन्हें खुद को सुधारने का मौका देंगे, लेकिन उन्हें खुद को और अपने भीतर से सुधारना होगा । सुधार का कोई निश्चित मॉडल या सूत्र नहीं होता है । पार्टियों को अपनी सोच और समझ के अनुसार खुद को सुधारने का प्रयास करना होगा । अन्यथा, उन्हें अपने अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ेगा ।
पुरानी पार्टियों में समय के अनुरूप संगठनात्मक तरीकों, संरचनाओं, नेतृत्व और विचारधारा का अभाव और अक्षमता देखी जाती रही है । व्यवहार में, पार्टियाँ अपना दार्शनिक आधार खो चुकी थीं । चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बनी हो, वह संबंधित पार्टी के राजनीतिक विचारों या दर्शन से निर्देशित नहीं होती थी, बल्कि केवल किसी हित समूह के लिए काम करने वाला समूह प्रतीत होती थी ।

हाल के दशकों में नागरिकों के साथ संवाद का अभाव भी पार्टियों की विफलता का एक कारण रहा है । उनके पास न तो कोई ठोस रणनीति थी, न ही अपने अच्छे कामों को लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने का कोई तरीका, और न ही यह जानने का कोई तरीका कि लोग क्या उम्मीदें और क्या सोचते हैं । जब वे सरकार में थे, तो जनता को अपनी प्रजा मानते थे । पार्टियाँ, खासकर सत्ता में आने के बाद, जुलूस–शैली की कुछ झाँकियों को जनता से संवाद का नाम देती है । जो संवाद कदापि नहीं हो सकता । नेता यह समझना ही नहीं चाहते थे कि ऐसी मौसमी झाँकियों के जÞरिए जनता से संवाद और विश्वास का रिश्ता कायम करना संभव नहीं है ।

एक और मुद्दा जिसे पार्टियों के शीर्ष नेता समझने में नाकाम रहे, वह है पीढ़ीगत हस्तांतरण । पीढ़ीगत हस्तांतरण में नेतृत्व का हस्तांतरण जÞरूरी है । हालाँकि, ऐसा लगता है कि नेता पीढ़ीगत हस्तांतरण को सिर्फ एक आवधिक घटना के रूप में समझते हैं जो आम अधिवेशन में होती है, जो पार्टियों के ‘लोकतांत्रिक’ तरीकों के आवरण में लिपटी होती है । इस बात की समझ का ही अभाव है कि पीढ़ीगत हस्तांतरण एक अवधारणा भी है । जो नेतृत्व समाज की भावनाओं को समझने में असमर्थ है, आम अपेक्षाओं की अनदेखी करता है, समय की नब्जÞ पकड़ने में असमर्थ है, और अनिर्णय की स्थिति में है, वह आने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता । इसलिए, इन सभी पहलुओं को सुधारने की आवश्यकता है तभी किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी ।
काठमांडू, नेपाल ।

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