मन्त्रिमण्डल की सामाजिक संरचना पर बड़ा सवाल: कौन शामिल, कौन बाहर ?
काठमांडू, 12 दिसम्बर । नेपाल में बीते कुछ दिनों से एक प्रश्न लगातार तैर रहा है
क्या समावेशिता सिर्फ भाषणों में अच्छी लगने वाली सजावटी पंक्ति है, या सत्ता की संरचना इसे गंभीरता से लेती भी है?
सरकार, Gen-Z आन्दोलन के अगुवाओं और कुछ प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों पर आरोप है कि उन्होंने “पुरानी व्यवस्था को कोसते-कोसते” वही गलतियाँ दोहरा दी हैं, जिनके खिलाफ यह आन्दोलन खड़ा हुआ था। सवाल यह है—
क्या ओली–देउबा को गाली देने से ही लोकतंत्र बदल जाता है?
या सत्ता की ठोस संरचना को बदलने का साहस चाहिए?
1. असली सवाल: क्या समावेशिता लागू करने का साहस दिखा?
नया 14 सदस्यीय मन्त्रिमण्डल कागज़ पर आधुनिक दिख सकता है,
लेकिन प्रतिनिधित्व की तस्वीर बिल्कुल असमान दिखती है।
30% जनसंख्या वाले बाहुन–क्षेत्री समुदाय का प्रतिनिधित्व 50%
यानी आधी आबादी देश चलाएगी, लेकिन आधी से कम हिस्सेदारी वाली आबादी ज्यादा कुर्सियों पर बैठी है।
यह सिर्फ आँकड़ा नहीं—सत्ता-संरचना की गहरी जड़ें हैं।
2. महिलाएँ—50% जनसंख्या, लेकिन सिर्फ 21% मंत्रालय
लगभग आधा देश महिला है,
लेकिन मन्त्रिमण्डल में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 21%।
और इससे भी बड़ा सवाल:
ग़ैर–बाहुन-क्षेत्री महिला सिर्फ 1
मधेशी, थारू, मुस्लिम, आदिवासी महिला: प्रतिनिधित्व शून्य
जब देश समावेशिता का दावा करता है,
तो यह तस्वीर उस दावे को सवालों में खड़ा करती है।
3. मधेश—20% आबादी, लेकिन प्रतिनिधित्व लगभग शून्य
मधेश को “शांत रहने” के भाषण दिए जाते हैं,
लेकिन प्रतिनिधित्व के नाम पर—
मधेशी दलित: 0
थारू/अन्य आदिवासी: 0
मुस्लिम समुदाय: 0
ऐसे में सवाल यह बनता है—
क्या मधेश को सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाता है?
या सत्ता बाँटने के समय भी उसका हिस्सा स्वीकार किया जाएगा?
4. ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय: 35–40% → सिर्फ 14% प्रतिनिधित्व
नेपाल के वंचित समूह—
मधेशी, थारू, दलित, मुस्लिम, तराईवासी आदिवासी—
कुल मिलाकर 35–40% जनसंख्या हैं।
लेकिन सत्ता में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 14%।
यह तभी और दर्दनाक दिखती है जब यह सरकार “युवा आन्दोलन” और “समावेशिता” के नाम पर बनी हो।
5. Gen-Z कोटा?—कुल 14 में सिर्फ 1 युवा (7%)
Gen-Z आन्दोलन पर देश गर्व कर रहा है।
लेकिन मन्त्रिमण्डल में—
Gen-Z प्रतिनिधि सिर्फ एक व्यक्ति (7%)
जब आन्दोलन युवाओं ने चलाया,
तो सत्ता में युवाओं का यही ‘सम्मान’ है?
6. मीडिया और समाज चुप क्यों?
सबसे कठिन सवाल यही है:
- मीडिया चर्चा नहीं कर रहा, क्यों?
- बुद्धिजीवी वर्ग असहज रूप से मौन है, क्यों?
- “समावेशिता” बोलने वाले NGO-सर्कल शांत हैं, क्यों?
- और समाज—खासकर सोशल मीडिया—इस मुद्दे पर असहज रूप से खामोश है।
क्या यह डर है?
क्या यह सत्ता–समाज की मिलीभगत है?
या फिर प्रतिनिधित्व का सवाल अब भी “जातीगत” मानकर टाल दिया जाता है?
7. असली सवाल: क्या यही है “परिपूरणीय क्षतिपूर्ति”?
Gen-Z आन्दोलन के नाम पर
- राजनीतिक पूँजी बटोरी गई,
- सत्ता बदली,
- समझौते पर हस्ताक्षर हुए,
लेकिन—
क्या यह सत्ता संरचना सच में बदली?
क्या यही है वह क्षतिपूर्ति जिसके बारे में भाषण दिए जा रहे हैं?
क्या प्रतिनिधित्व के बिना समावेशिता संभव है?
निष्कर्ष
नेपाल को सिर्फ आन्दोलन, भाषण और समझौते नहीं चाहिए।
नेपाल को सत्ता-साझेदारी चाहिए।
ऐसी संरचना चाहिए जिसमें हर समुदाय, हर भूगोल, हर वर्ग—
सम्मान के साथ प्रतिनिधित्व पाए।
आज का प्रश्न बहुत सरल है—
क्या नई सरकार यह हिम्मत दिखा सकेगी?
या फिर यह भी इतिहास की उन फाइलों में दर्ज हो जाएगा
जो बार-बार बताती हैं—
“नेपाल में परिवर्तन का वादा आसान है,
लेकिन उसे लागू करना सबसे कठिन।”


