मधेश के औरतों में लज्जा और पर्दा करना भी सभ्यता-संस्कृति का हिस्सा है
मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु) बीरगंज ,६ अगस्त | मधेश की सभ्यता, संस्कृति बहुत ही महवपूर्ण और प्रभावशाली है। मधेश को इस पर नाज़ है। औरतों में लज्जा और पर्दा करना भी सभ्यता-संस्कृती का हिस्सा है। हालांकि ये बध्यात्मक नहीं एक्छिक है। अगर जबर्दस्ती इसे थोपा जाए या उतरा जाए तो, मधेश की सभ्यता, संस्कृति और परम्परा से कुठाराघात होगा।
ये बात शुरू होती है, जिला प्रशासन कार्यालय से। वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता के लिए, सम्पूर्ण कागजात के साथ, सम्बंधित फाँट में पहुचे। सबसे पहले, अधिकृत ने फ़ोटो पर एतराज किया। उनका तर्क था, फ़ोटो में दोनों कान आने चाहिए। कुछ बहसबाज़ी करने के बाद हारकर, दूसरा फ़ोटो खिचाए जिसमे दोनों कान थे। हाकिम साहेब को फिर भी, पसंद नहीं आया। उन्हें सिर के पीछे, आँचल से ऐतराज था। मेरा धैर्य जबाब दे रहा था। उन्होंने मामला बिगड़ते देख, सहायक जिला अधिकारी के पास भेजा। उन्होंने भी पहले फ़ोटो में, कान दिखने का नियम बताया। मैंने दूसरा फ़ोटो दिखाया।
सहायक जिला अधिकारी (सजअ) – “इसमें आँचल है ये भी नहीं चलेगा”।
मैं – “साहब फ़ोटो में चेहरा दिखना चाहिए वो तो दिख ही रहा है। साथ में दोनों कान भी। क्या जिसका कान नहीं होगा वो नेपाली नागरिक नहीं हो सकता ? आँचल से चेहरे पर कोई परछाई भी नहीं है। अगर फ़ोटो ठीक नहीं था तो गाविस सचिव को सिफारिस ही नहीं करना चाहिए था। हम गांव से इतने दूर आये, हमें इतनी परेशानी तो नहीं होती। आपको इस फ़ोटो में क्या आपत्ति है”।
सजअ – “इसमें आँचल दुपटा हटाकर, कंधे तक फ़ोटो लगेगा”।
मैं – “अभी दुसरो का फ़ोटो देखे, वो तो पुरे आँचल में था”।
सजअ – “मुसलमान का हो सकता है”।
मै – “ये कैसा धर्म निरपेक्ष है। आप मधेश में हिन्दू-मुस्लिम में झगड़ा करना चाहते है”।
सजअ – “ज्यादा नेतागिरी नहीं दिखाओ”।
मैं – “ये नेतागिरी नहीं है। आप मधेश को अपमानित कर रहे है। क्या सरकार मधेश की बहु-बेटियो को नंगा देखना चाहती है”।
सजअ – “जो समझो फ़ोटो बदलना ही होगा”।
हार मानकर, अपमानित होकर, सिर झुका कर नया फ़ोटो खिचाए। ऐसा लग रहा था हम गुलाम है, हमारे पैरो में बेड़िया लगी है और अंग्रेज शासन हम पर हुकुमत कर रहे है। फिर कई फाँट के चक्कर लगाते-लगाते दुबारा सजअ के पास पत्नी को लेकर सोधपुछ के लिए पहुचे। मुझसे आगे दो परिवार और थे।
सजअ – “क्या तुम्हारे बेटे को भेज दे जेल। बुलाऊ पुलिस। बहुत पिटाई लगेगा” ।
पहले परिवार की बूढी माँ हाथ जोड़कर सजअ के पैर तक झुकते हुए – “ए हजूर ! इसबार माफ़ कर दिजिए। हमलोगो का गांव दूर है। पैसा के कमी से, इतना दिन बाद नागरिकता बनवाने आए है”।
जब सजअ को लगा की सरकार का रौब- रुआब उस परिवार के रूह तक को आतंकित कर चूका है, तब उसे छोड़ा गया। अब दूसरे परिवार की बारी आई। दोनों पति-पत्नी हाथ जोड़े खड़े थे। ऐसा लग रहा था उनलोगो के फाँसी पर फैसला होना हो। सजअ ने गौर से पत्नी को निहारा।
सजअ – नाम, उम्र, गांव-घर पूछने के बाद। “तुम्हारी शादी को चार साल हो गए, अभी तक नागरिकता नहीं बनवाया, आज क्या जरुरत पड़ गई। आज क्यों आई हो। जरूर कुछ गड़बड़ है। जल्दी बोलो”।
उस महिला को जबाब नहीं सूझ रहा था। बेचारी निरुतर हो पति को देख रही थी। पति असहाय सा खड़ा था। सजअ धौस पर धौस दिए जा रहे है। अंत में हारकर ये परिवार भी उनके तलवे के निचे नतमस्तक हुआ।
अब हमारी बारी आइ। सामान्य पूछताछ के बाद।
सजअ – “अब तक नागरिकता क्यों नहीं बना और अब क्यों बनवाना है”।
मैं – “अभी तक जरुरत नहीं पड़ी। गांव से आने में परेशानी भी होती है। अगर गांव में समय समय पर नागरिकता टोली जाती तो बन गया होता”।
सजअ – “आज हम नहीं बन्ने दे तो”।
मैं – “क्यों नहीं बन्ने देंगे”।
सजअ – “अभी सहजमींन का आदेश दे दे, तो पुलिस के चक्कर लगाते रह जाओगे”।
मैं – “सहजमींन क्यों”।
सजअ – “क्यों…? मैं सचिव के सिफारिस नहीं मानता। ये विवाह दर्ता भी नहीं मानता। ये शादी भी नहीं मानता”।
मैं – “क्यों नहीं मानता। क्या शंका है। आपके मानने या ना मानने से क्या होगा। मधेशी होने के कारण हमें बार-बार अपमानित करके, नीचा दिखाकर हमें कमजोर करने की कोशिश कभी सफल नहीं होगी। ये मुल्क हमारा है और हम इसके बाइज्जत शहरी है”।
सजअ – “अभी तुरंत सजअ से बदतमीजी के कारण सार्वजनिक अपराध में भीतर कर देंगे”।
होहल्ला सुनकर बहुत लोग अंदर आ गए। सब बोलने लगे ये गलत है, धांधली है, पत्रकार बुलाओ। बाजार बंद करो। लोगो का गुस्सा देखकर सजअ के तेवर नर्म पड़े। नागरिकता बन गया। इस पुरे घटनाक्रम में बार-बार साउथ अफ्रीका में महात्मा गांधी को चलती ट्रेन से फेकना, इमीग्रेशन रजिस्ट्रेशन एक्ट और मैरिज एक्ट की परिस्थिति याद आती रही। ऐसी घटनाएं आए दिन होती है। सरकार मधेश के भावी पीढ़ी के कंठ सिलकर उसे दब्बु और कायर बनाना चाहती है।
जब छुरी तरबूज पर गिरे, तो दोष केवल छुरी का ही नहीं होता, तरबूज का भी होता है, की वो इतना कमजोर क्यों है, जो कट जाता है। बलि भी भेड़-बकरियो की दी जाती है। बाघ और शेर के बलि की मन्नत कोई नहीं मांगता। आखिर क्यों मधेशी कौम अपने इज्जत, सम्मान, पहिचान, अधिकार के लिए लड़ नहीं सकता ? अगर अपनी भावी संतति की रक्षा के लिए क्षुद्र स्वार्थ नहीं छोड़ सकता, तो मधेशी कौम का नामोनिशान भी नहीं रहेगा। विश्व विजेता सिकन्दर का देश ग्रीस, दिवालिया हो सकता है, तो बीरो की भूमि में जन्मे कायरो को, मोहन जोदड़ो- हड़प्पा संस्कृति की तरह मिट जाना ही बेहतर होगा।

