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देश में चुनाव : मधेश में दबाव -अंशुकुमारी झा

 

अंशुकुमारी झा-

अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक फरवरी ०२६।  विभिन्न उतार–चढाव के बाद फिलहाल देश चुनाव के रंग में रंगा हुआ है । समाजिक सञ्जाल में, गाँव के नुक्कड़ पर, चाय की दुकान पर, स्कूल कालेजों में, हिमाल–पहाड़ से लेकर तराई के जगह–जगह पर चुनाव के चर्चे हो रहे हैं । बच्चे, बूढ़े, वयस्क सभी की जुबान पर चुनाव की ही बात हो रही है । बड़े–बड़े दिग्गज नेता चुनावी मैदान में उतर गये हैं । जंग छिड़ गई है । सभी नेता खुद को बढि़या बोलकर जनता के समक्ष प्रस्तुत हो रहे हैं । कोई जनता का पैर पकड़ कर वोट माँग रहा है तो कोई भण्डारा खिलाकर तो कोई जनता के खेतों में जाकर फसलें काटकर जनता का मन जीतने में लगा है अर्थात् जनता को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए विभिन्न पैतरे अपना रहे हैं । परन्तु सबसे आश्चर्य की बात यह है कि अभी के चुनावी माहौल में हमारे देश के नेता लोग मधेश पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं । मधेश से इतना प्रेम दिखाने का यथार्थ कारण क्या हो सकता है ? देश के लिए मधेश का योगदान क्या है और मधेश का क्या महत्व है ? चुनाव के समय भी मधेश पर इतना दबाव क्यों है ? इस प्रकार के बहुत सारे प्रश्न मधेशियों के दिमाग में हलचल मचा सकते हैं तो आइए हम जानते हैं पहले मधेश क्या है ।
मधेश नेपाल के दक्षिणी भूभाग में फैला हुआ एक समतल हिस्सा है । इसने भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक रूप से राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । मधेश अपनी प्राकृतिक उर्वरता, जनघनत्व और सांस्कृतिक विविधता के कारण सदैव चर्चा में रहा है । इतिहास से लेकर वर्तमान तक मधेश से राज्य को बहुत सारी अपेक्षाएँ रही हैं । नेपाल का इतिहास का पन्ना पलटने के बाद पता चलता है कि मधेश हमेशा कृषि उत्पादन, व्यापार, व्यावसायिक गतिविधि, संस्कृति और ज्ञान का केन्द्र रहा है । परन्तु समय के साथ–साथ मधेश और पहाड़ के बीच बढ़ती दूरी की भी अनुभूति होती रही है । ‘मधेस’ शब्द संस्कृत भाषा के मध्यदेश से परिष्कृत हुआ है । मल्लकाल के कुछ संस्कृत तथा नेपाली अभिलेखों में ‘मध्यदेश’ का उल्लेख मिलता है । परन्तु राणाकाल से नेपाल के दक्षिणी तराई भूभाग को मधेश नाम से अभिहित किया गया । राणा शासन काल में तराई को पहाड़ से अलग समझा जाता था । उस समय तराईवासी को खुद को नेपाली प्रमाणित करने के लिए अपने ही देश में बहुत पापड़ बेलने पड़ते थे । प्रशासनिक रूप से तराई को अलग सामाजिक क्षेत्र के रूप में देखे जाने के कारण उसके भौगोलिक अर्थ में प्रयोग होने वाला शब्द ही पहचान के साथ जोड़ा गया । २००७ साल के बाद नागरिकता, भाषा और समावेशीकरण के बहस के साथ ही मधेश को पहचान मिली । २०६३÷६४ साल के मधेस आन्दोलन के बाद ‘मधेश’ राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में निर्णायक रूप में प्रवेश किया । इससे स्पष्ट होता है कि मधेश प्राचीन काल में बहुत ही समृद्ध और विस्तार था बाद में मधेश को कमजोर और संकुचित बनाया गया ।
अब बात यह है कि मधेस का इतिहास वैदिककाल तक फैला हुआ होने के बावजुद भी आज सिर्फ आठ जिलों में सीमित करने का उद्देश्य क्या हो सकता है ? वैदिक काल में विदेह अर्थात् मिथिला राज्य इसी क्षेत्र में अवस्थित था । राजा जनक के शासनकाल में दर्शन, शिक्षा और वैदिक चिन्तन उच्च उत्कर्ष में पहुँचा था । सीता, याज्ञवल्क्य, गार्गी जैसे महान ऐतिहासिक पात्रों ने मधेश को धार्मिक, दार्शनिक तथा बौद्धिक चेतना के केन्द्र के रूप में स्थापित किया है । इतने महत्वपूर्ण क्षेत्र की अभी की दुर्दशा देखकर मन विचलित होना स्वभाविक है । सबसे दुख की बात तो यह है कि जहाँ इतने प्रख्यात विद्वानों ने कभी शास्त्रार्थ किए हों वहाँ अभी कोई सही नेतृत्व करने वाला नहीं दिख रहा है । जो भी आगे बढ़ता है वह बस अपने लिए ही मधेश को चूसता है । यथार्थ तो यह है कि अभी भी मधेश में पहाड़ी समुदाय के लोग चुनाव लड़ने जाते और जीत के भी आते हैं । क्या कोई मधेशी कभी पहाड़ से जीत के आए हैं ? यह सवाल तो हर मधेशी के दिल में अवश्य उठता होगा । आश्चर्य की बात यह है कि आखिर मधेश में ऐसा क्या है जो पहाड़ के नेता भी मधेश से चुनाव लड़ना चाहते हैं ?
मधेश सच में आगे था, मिथिला संस्कृति, कला, साहित्य, लोक परम्परा और शास्त्रीय दर्शन के निरन्तर विकास ने मधेश को दक्षिण एसिया का ही एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक भूभाग में पहचान दिया है । मधेश की संस्कृति कहें या उच्च विचार कहें जिसके कारण मधेश की जनता का हृदय बहुत ही कोमल होता है । वह इतने भावुक होते हैं कि उनके क्षेत्र में जो भी आए और थोड़े प्यार से बातें कर लें, वह पिघल जाते हैं । अभी सच में चुनाव के वक्त वही हो रहा है । मधेशी भूभाग में नेतागण जाकर कोई अपने को मधेश का बेटा बोलता तो कोई अपने मधेशिया छौंड़ा बोलता है । बस इन्हीं सब बातों से मधेश की जनता पिघल रही है और वह नेतृत्व चयन के लिए भटक रही है । जिससे मधेश पर दबाव बढ़ रहा है ।
हाँ, मधेश में जनसंख्या भी पहाड़ के तुलना में अधिक है । मधेस नेपाल का सबसे अधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र है । २०७८ साल के राष्ट्रीय जनगणना अनुसार मधेश प्रदेश की जनसंख्या लगभग ६१ लाख है । यादव, कुर्मी, थारु, मुसहर, दुसाध, चमार, कोइरी, ब्राह्मण, राजपूत इत्यादि जातियों का समुदाय मधेश को सामाजिक रूप से अत्यन्त विविध बनाया है । पहाड़ी नेताओं को मधेश से लड़ने का उद्देश्य शायद मधेश की बढ़ती जनसंख्या भी हो सकती है ।
समग्र में अभी तक मधेश को वोट बैंक कहें या नेताओं की आवश्यकता के रूप में ही प्रयोग करते हुए देखा गया है । जबकि अभी का मधेश सभी दृष्टिकोण से अन्य प्रदेशों के तुलना में पीछे है । साक्षरता के हिसाब में मधेश सबसे पीछे है । जबकि समाज विकास में शिक्षा का महत्व सर्वविदित ही है । उसी प्रकार स्वास्थ्य के हिसाब से भी पीछे है । मधेश में घर में ही डिलेवरी ६० प्रतिशत, मातृ मृत्यु दर अत्यधिक, नवजात शिशु मृत्यु में भी मधेश आगे इसी प्रकार रक्त अल्पता ५१ प्रतिशत, बाल बालिका कुपोषण ४० प्रतिशत, टि.वी.कुष्ठरोग अधिक , क्यान्सर रोग में आगे, वायु प्रदूषण तथा उससे निर्मित रोग में आगे । इन तथ्यांकों से पता चलता है मधेश का स्थान कहाँ है । सिर्फ रोड ढलान, नल, ढल से ही प्रदेश का विकास नहीं मापा जा सकता है । उसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि हरेक क्षेत्र का मूल्यांकन किया जाता है । इसलिए असल नेता और नेतृत्व का चयन का ध्यान हम जनता को रखना अनिवार्य है । इसबार के चुनाव में नातेदार, जात जाति से ऊपर उठकर हमें नेता का चयन करना चाहिए ताकि समाज का सही विकास हो सके ।

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