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ईद  – उल – फितर : विविधता को पोषित करने का अवसर : विनोदकुमार विमल 

 

ईद का चांद देखने के बाद ” चांद मुबारक ” या ” ईद मुबारक ” कहने की परंपरा केवल एक अभिवादन नहीं है, बल्कि सद्भावना और भाईचारे को व्यक्त करने का एक सुंदर अनुष्ठान है । ईद – उल – फितर केवल एक धार्मिक त्योहार ही नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक भी है ।

विनोदकुमार विमल, मार्च 21, काठमांडू । ईद – उल – फित्र  या ईद –  अल – फितर  का हिंदी  में अर्थ है ” रोज़ा तोड़ने का त्योहार” या “रोजा समाप्त करने का त्योहार “ या “ उपवास तोड़ने का उत्सव “ ।  इसे मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है । ईद – उल –  फितर का मतलब एक – दूसरे के साथ खुशियां बांटना भी है । यह रमज़ान के पवित्र महीने के अंत का प्रतीक एक प्रमुख इस्लामी त्योहार है, जिसमें सुबह से शाम तक रोज़ा रखा जाता है । यह उत्सव मानवीय धार्मिकता की ” स्वाभाविक ” अवस्था में वापसी का संकेत देता है और आध्यात्मिक चिंतन की पूर्णता का स्मरण कराता है । यह त्योहार आत्म-संयम, दान और वंचितों के प्रति करुणा का संदेश देता है, जो भाईचारे और शांति को बढ़ावा देता है ।

ईद का चांद देखने के बाद ” चांद मुबारक ” या ” ईद मुबारक ” कहने की परंपरा केवल एक अभिवादन नहीं है, बल्कि सद्भावना और भाईचारे को व्यक्त करने का एक सुंदर अनुष्ठान है । ईद – उल – फितर केवल एक धार्मिक त्योहार ही नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक भी है । नए कपड़े पहनने, प्रार्थना करने, एक-दूसरे को गले लगाने और अभिवादन का आदान – प्रदान करने की पारंपरिक परंपराएं सामाजिक संबंधों को मजबूत करती हैं । विशेष व्यंजन खाने की परंपरा साझा सुख की परंपरा को जीवित रखने में मदद करती है, जबकि दूसरों को देने और मदद करने की परंपरा समाज को अधिक न्यायपूर्ण और दयालु बनाने में मदद करती है । यह त्योहार हमें भाईचारे, सद्भाव और एकजुटता के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है ।

किसी भी चंद्र हिजरी  ( एक चंद्र कैलेंडर जिसमें 354 या 355 दिनों के वर्ष में 12 चंद्र महीने होते हैं, जिसका उपयोग इस्लामी छुट्टियों और अनुष्ठानों के उचित दिनों को निर्धारित करने के लिए किया जाता है, जैसे कि वार्षिक उपवास की अवधि और हज का उचित समय, आदि) महीने के प्रारंभ की तिथि विभिन्न स्थानों पर स्थानीय धार्मिक अधिकारियों द्वारा नए चंद्रमा के दर्शन के समय के आधार पर भिन्न होती है, इस प्रकार उत्सव का दिन भी स्थान के अनुसार भिन्न होता है । ईद का पर्व खुशियों का त्योहार है, वैसे तो यह मुख्य रूप से इस्लाम धर्म का त्योहार है,  परंतु आज इस त्योहार को लगभग सभी धर्मों के लोग मिल जुल कर मनाते हैं । दरअसल इस पर्व से पहले शुरू होने वाले  रमजान  के पाक महीने में इस्लाम मजहब को मानने वाले लोग पूरे एक माह रोजा  रखते हैं । रमजान महीने में इस्लाम धर्मावलम्बियों  को रोजा रखना अनिवार्य है, क्योंकि उनका ऐसा मानना है कि इससे अल्लाह प्रसन्न होते हैं । यह पर्व त्याग और अपने मजहब के प्रति समर्पण को दर्शाता है । यह बताता है कि एक इंसान को अपनी इंसानियत के लिए इच्छाओं का त्याग करना चाहिए, जिससे कि एक बेहतर समाज का निर्माण हो सके

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ईद –  अल – फितर की शुरुआत मूल रूप से इस्लामी पैगंबर मुहम्मद ने की थी । कुछ परंपराओं के अनुसार, इन त्योहारों की शुरुआत मक्का से मुहम्मद के हिजरत के बाद मदीना में हुई थी । पैगंबर के एक प्रसिद्ध साथी, अनस ने बयान किया है कि जब पैगंबर मदीना पहुंचे, तो उन्होंने लोगों को दो विशेष दिन मनाते हुए पाया, जिनमें वे मनोरंजन और आनंद में लिप्त थे l यह देखकर पैगंबर ने कहा कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने उत्सव के दो दिन निर्धारित किए हैं और वे उन दिनों से बेहतर हैं जिनका आप लोग पालन कर रहे हैं । इसलिए उन्होंने उन्हें ईद – उल -फितर और ईद – उल -अधा मनाने के लिए कहा, क्योंकि ये उत्सव मनाने के लिए बेहतर दिन थे । इस प्रकार पैगंबर के बताए अनुसार ईद – उल – फितर का उत्सव शुरू हुआ ।

रोजा के एक महीने के रोज़े के समाप्त होने से पहले, इस्लाम धर्मावलम्बी समुदाय ईदगाह पर इकट्ठा होता है और नवाज़ पढ़ता है, अल्लाह से प्रार्थना करता है कि समस्त मानव जाति सुखी रहे और किसी को भी दुख या कष्ट न सहना पड़े । इसके बाद  एक – दूसरे को गले लगाकर शुभकामनाएँ दी जाती हैं । यह त्योहार मानव जाति को ” विविधता में एकता ” का संदेश देने वाला त्योहार माना जाता है । भाईचारा बढ़ाने और सभी में परोपकार की भावना जगाने के लिए  इस त्योहार के दौरान नियमानुसार लोग जरूरतमंदों को भोजन और धन दान करते हैं । इस प्रकार  ईद के इस अवसर पर रोजा  रखकर लोग अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह इस दुनिया को सबके लिए समानता की दुनिया बनाए और अपना जीवन अल्लाह को समर्पित कर दें ।

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ईद की नमाज़ सामूहिक रूप से खुले स्थानों जैसे खेतों, सामुदायिक केंद्रों या मस्जिदों में अदा की जाती है । ईद की नमाज़ के बाद खुत्बा दिया जाता है और फिर अल्लाह से दुनिया भर के सभी प्राणियों के लिए क्षमा, दया, शांति और आशीर्वाद की दुआ की जाती है । इस उपदेश में इस्लाम धर्मावलम्बी  समुदाय को ईद के अनुष्ठान, जैसे कि ज़कात, अदा करने का निर्देश दिया जाता है । ईद का उपदेश ईद की नमाज़ के बाद दिया जाता है l  नमाज के बाद, मुस्लिम समुदाय के लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों से मिलने जाते हैं या घरों, सामुदायिक केंद्रों या किराए के हॉल में बड़े सामूहिक समारोह आयोजित करते हैं और बड़े उत्साह के साथ ईद – उल – फितर मनाते हैं ।

इस्लाम धर्म  में, ईद – उल – फितर इस बात का प्रतीक है कि धैर्य और दृढ़ता से हम महान पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं । सुबह से शाम तक एक महीने के उपवास को पूरा करने के पुरस्कार के रूप में मनाया जाने वाला ईद – उल – फितर, इस जीवन में कर्तव्यनिष्ठ रहने और अल्लाह को प्रसन्न करने वाले व्यक्ति के लिए परलोक के सुख का प्रतीक है । ईद – उल – फितर सभी अवसरों पर अल्लाह को याद करने के महत्त्व  का प्रतीक है । ईद का सबसे महत्त्वपूर्ण  अनुष्ठान ईद की नमाज़ है,  जो अपने मुस्लिम समुदाय के साथ सामूहिक रूप से अल्लाह  का शुक्र अदा करने और नेक कामों का आदेश देने के लिए की जाने वाली नमाज़ है । इस त्योहार को ईद – उल-फितर इसलिए कहा जाता है क्योंकि लोग दिल खोलकर दान करते हैं और अपनी संपत्ति गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते हैं ।  इस्लाम धर्म के अनुयायियों के पवित्र ग्रंथ कुरान में यह प्रावधान है कि इस त्योहार के दौरान मुसलमानों को अपनी बचत का ढाई प्रतिशत नकद या वस्तु के रूप में दान करना चाहिए । इस प्रकार दान की गई नकद या वस्तु गरीबों और जरूरतमंदों में वितरित की जाती है । इसे जकात कहते हैं ।

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ईद -उल – फितर के अवसर पर  प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार गेहूँ या उसके समतुल्य नकद दान करता है । इसे सत्कार फितर कहते हैं । यह नियम है कि यह दान माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी दिया जाना चाहिए । यह दान गरीबों और जरूरतमंदों को भी दिया जाता है । यह रोज़ा साल भर में किए गए गुनाहों का प्रायश्चित करने के लिए रखा जाता है । ईद – उल – फितर का स्वागत श्रद्धा और गंभीरता के साथ किया जाना चाहिए, साथ ही व्यवस्था, भाईचारा और एकता बनाए रखनी चाहिए, अतिवादी व्यवहार से बचना चाहिए और शत्रुता पैदा करने वाली चीजों से दूर रहना चाहिए ।

हिजरी 1447 – 1448  की इस ईद – उल – फितर के अवसर पर, जनता से स्वयं में सुधार लाने और एकजुटता और एकता को मजबूत करने की अपेक्षा की जाती है  । यह त्योहार सामाजिक मेलजोल बढ़ाने के साथ – साथ लोगों और राष्ट्र के बीच मतभेदों के बावजूद भाईचारे  की भावना को मजबूत करने का अवसर होना चाहिए । आप सभी को ईद – उल -फितर की दिल से हार्दिक शुभकामनाएं । यह पावन त्योहार आपके जीवन में खुशियां, शांति और समृद्धि लेकर आए । अल्लाह आपकी हर दुआ कबूल करे और आपके घर को खुशियों और बरकतों से भर दे ।

(यह लेख नेपाल के उपराष्ट्रपति माननीय रामसहाय प्रसाद यादव के  जनसंपर्क एवं समन्वय सलाहकार मंजारूल  अंसारी, गोरखापत्र के  उर्दू पृष्ठ समन्वयक डॉ. अब्दुल सलाम और महाराष्ट्र के पूना कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. शाकिर शेख के साथ हुई बातचीत पर आधारित है ।)

 

 

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