करुणाशंकर उपाध्याय को हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग सर्वोच्च उपाधि साहित्य वाचस्पति प्रदत्त
प्रयागराज, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने प्रख्यात आलोचक व मुंबई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय को वर्ष 2026 के लिए अपनी सर्वोच्च उपाधि साहित्य वाचस्पति (डी. लिट. ) से दिनांक 21मार्च 2026 को श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय में सम्मानित किया । ध्यातव्य है कि इस उपाधि से सम्मानित प्रमुख साहित्यकारों में मदन मोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, ग्रियर्सन, श्यामसुन्दर दास, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, डॉ. सम्पूर्णानन्द, हजारी प्रसाद द्विवेदी शामिल, श्री विजय दत्त श्रीधर जैसी विभूतियों का समावेश है।प्रोफेसर उपाध्याय को यह उपाधि हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति और प्रख्यात विद्वान प्रो. डा सूर्य प्रसाद दीक्षित के कर-कमलों से प्राप्त हुआ।
ध्यातव्य है कि मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर और आलोचक डाॅ.करुणाशंकर उपाध्याय इस समय हिंदी के सबसे चर्चित आलोचक हैं।आप भारतीय और पाश्चात्य काव्य शास्त्र के अधिकारी विद्वान हैं। आप आलोचना की अद्यतन पद्धतियों से भी पूर्णत: विज्ञ हैं।आप भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में नूतन प्रतिमानों का निर्माण करते हैं।ध्यातव्य है कि इनकी पुस्तक’ मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ ‘ पर आयोजित परिचर्चा के अवसर पर शीर्ष साहित्यकार श्रीमती चित्रामुद्गल ने डाॅ. उपाध्याय को आज का सबसे बड़ा आलोचक कहा था।तदुपरांत हिंदी साहित्य भारती द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने इन्हें वर्तमान शती का आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डाॅ.अरविंद द्विवेदी ने उपाध्याय को अज्ञेय के बाद हिंदी का सबसे बड़ा अंत: अनुशासनिक आलोचक कहा था।इनके आलोचनात्मक लेखन पर ममता यादव ने जे.जे.टी. विश्वविद्यालय, झुंझनू, राजस्थान से पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त की है।
करुणाशंकर उपाध्याय का जन्म 15 अप्रैल 1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के घोरका तालुकदारी नामक गाँव में हुआ। आपके पिता राममनोरथ उपाध्याय विख्यात रामायणी थे और इनके दादा रामकिशुन उपाध्याय सुविख्यात वैद्य थे।
डाॅ.उपाध्याय की अब तक 20 मौलिक आलोचनात्मक पुस्तकें और 15 संपादित पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।गत वर्ष इनका आलोचना ग्रंथ ‘ जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम ‘ प्रकाशित हुआ है जो इस समय विद्वानों के मध्य मीमांसा का विषय बना हुआ है। इस पर अब तक 25 संगोष्ठियां आयोजित हो चुकी हैं। ऐसा बहुत कम होता है जब कोई आलोचना ग्रंथ हिंदी जगत का इस प्रकार स्नेहभाजन बनता है। इसे हिंदी आलोचना में नए युग का सूत्रपात करने वाला ग्रंथ कहा जा रहा है। यह आलोचना ग्रंथ आलोचना विधा के खोए हुए गौरव को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है।प्रोफेसर उपाध्याय के राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में 400 के आस-पास आलेख व शोध -लेख प्रकाशित हुए हैं। इनके कुशल निर्देशन में अब तक 37 शोधार्थी पी.एच.डी. और 55 छात्र एम.फिल. कर चुके हैं। प्रोफेसर उपाध्याय को अब तक राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दो दर्जन से अधिक सम्मान – पुरस्कार मिल चुके हैं।


