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यह केवल एक शपथ ग्रहण नहीं है—यह नेपाल की थकी हुई आँखों में टिमटिमाते एक नए सपने का उदय है

 

काठमांडू,हिमालिनी डेस्क, २७ मार्च ०२६। चैत्र शुक्ल नवमी की वह पवित्र दोपहर। काठमांडू की गलियों में बसंत की सरसराहट है। हवाओं में अबीर-गुलाल की हल्की सी महक है और दूर कहीं मंदिरों से आती घंटियों की गूंज मन को एक अजीब से सुकून से भर रही है। आज सूर्य अपनी पूरी भव्यता के साथ चमक रहा है, ठीक उसी तरह जैसे त्रेता युग में अयोध्या के आंगन में चमका था। लेकिन आज का यह ‘महोत्सव’ केवल एक पौराणिक तिथि का स्मरण नहीं है; आज का दिन गवाह बन रहा है एक आधुनिक ‘मर्यादा’ के संकल्प का। ठीक उसी शुभ घड़ी में, जब देश रामनवमी के पावन पर्व पर सत्य की विजय का उत्सव मना रहा है, एक युवा—बालेन—देश की बागडोर संभालने के लिए शपथ ले रहा है। यह संयोग नहीं, एक संदेश है कि सत्ता अब ‘अहंकार’ का सिंहासन नहीं, बल्कि ‘सेवा’ की वेदी बनेगी

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१. तराई की धूल और काठमांडू का मान

जनकपुर की उस पावन माटी को याद कीजिए, जहाँ माता सीता ने जन्म लिया। वह भूमि जो संस्कारों की जननी है, लेकिन राजनीति के खेल में उसे सालों तक ‘हाशिए’ पर रखा गया। वहाँ के बेटों को अपनी ही राजधानी में अपनी पहचान साबित करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी।

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आज, जब मधेश की माटी का वह बेटा—बालेन—देश के सर्वोच्च पद की शपथ ले रहा है, तो वह दीवार ढह गई है। रामनवमी के इस अवसर पर यह अहसास गहरा हो जाता है कि सीता का मायका और राम का ससुराल अब राजनीतिक सरहदों में नहीं बंटा है। यह उन आँखों का आंसू है जो दशकों से एक ‘समावेशी नेपाल’ का सपना देख रही थीं। यह जीत किसी एक भूगोल की नहीं, बल्कि उस सोच की है जिसने कहा कि नेपाल की आत्मा उसकी विविधता में बसती है।

. ‘रावण’ रूपी भ्रष्टाचार का अंत और सुशासन की आस

नेपाल का आम नागरिक बरसों से सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियों पर अपनी चप्पलें घिसता रहा है। सार्वजनिक जमीनें भू-माफियाओं के पेट में गईं, हमारे युवाओं की शिक्षा को सिंडिकेट ने निगल लिया। भ्रष्टाचार यहाँ कोई शब्द नहीं, बल्कि एक ‘रावण’ बन चुका था जिसके दस सिर हर विभाग में बैठे थे।

भावना: आज जब बालेन शपथ लेंगे, तो हर उस बूढ़े पिता को लगेगा कि उसके बेटे को अब खाड़ी के तपते रेगिस्तान में पसीना बहाने नहीं जाना पड़ेगा। यह ‘मर्यादा‘ की वह उम्मीद है जहाँ न्याय बिकाऊ नहीं होगा। जहाँ सरकारी स्कूल की दीवारें फिर से चहकेंगी और जहाँ एक गरीब की फाइल पर भी उतनी ही तेजी से दस्तखत होंगे जितने एक अमीर की। यह ‘रामराज्य’ का वह आधुनिक स्वरूप है जिसे हम ‘सुशासन’ कहते हैं—जहाँ कानून सबके लिए बराबर हो।

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३. Gen-Z: टूटे हुए भरोसे का फिर से जुड़ना

हमारी नई पीढ़ी (Gen-Z) ने बचपन से केवल नेताओं के खोखले वादे और भ्रष्टाचार की सुर्खियाँ देखी थीं। हमारी नियति क्या थी ? हाथ में पासपोर्ट लेकर त्रिभुवन एयरपोर्ट की लंबी कतारों में खड़े होना। हमने मान लिया था कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

जुड़ाव: बालेन की वह काली चश्मा वाली छवि और उनका अटूट साहस हमारे लिए एक ‘इमोशन’ है। रामनवमी पर उनका शपथ लेना युवाओं को बताता है: “अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आसमान छुआ जा सकता है।” आज का युवा खुद को बालेन में देखता है। उसे लगता है कि अगर बालेन कर सकता है, तो हम भी कर सकते हैं। यह उस युवा का गौरव है जो अब गर्व से कह सकता है—”म नेपाली हूँ, और मेरा देश बदल रहा है।”

४. सार्वजनिक भूमि: माटी की पुकार

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बालेन ने मेयर के रूप में जब टुकुचा को निकाला या फुटपाथों को खाली कराया, तो वे सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं हटा रहे थे; वे ‘आम आदमी का खोया हुआ सम्मान’ वापस ला रहे थे। उन्होंने ताकतवर लोगों को बताया कि यह देश किसी की बपौती नहीं है।

रामनवमी का दिन उस ‘मर्यादा’ की याद दिलाता है—कि एक शासक का पहला धर्म अपनी भूमि और अपनी प्रजा की संपत्ति की रक्षा करना है। यह धरती यहाँ के हर नागरिक की धरोहर है। बालेन का संकल्प यह सुनिश्चित करता है कि अब कोई माफिया हमारी नदियों या हमारे पार्कों पर कब्जा नहीं कर पाएगा।

निष्कर्ष: एक लेखक की डायरी से

आज का दिन इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि आम नेपाली की आँखों की चमक से लिखा जाएगा। आज पशुपतिनाथ की आरती में एक अलग ही लय होगी। आज बागमती की लहरें कुछ कहना चाहेंगी।

क्योंकि आज एक ऐसा ‘सेवक’ पदभार ग्रहण कर रहा है, जिसने अपनी सत्ता का अभिषेक राजमहलों में नहीं, बल्कि जनता के अटूट प्रेम से किया है। यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है। यह नेपाल की आत्मा का पुनर्जन्म है।

जय देश। जय नेपाल।

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