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सुप्रीम कोर्ट में बहस, वकीलों ने केपी ओली की गिरफ्तारी को बताया असंवैधानिक

 
फोटो Ratopati

काठमांडू, 30 मार्च। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी के खिलाफ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सोमवार को में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान करीब एक दर्जन वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने बहस करते हुए ओली की गिरफ्तारी को प्रथम दृष्टया असंवैधानिक बताते हुए तत्काल रिहाई की मांग की।

ओली की ओर से उनकी पत्नी राधिका शाक्य ने रविवार को याचिका दायर की थी। न्यायाधीश मेघराज पोखरेल की एकल इजलास में इस याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में कहा गया है कि भदौ 23 और 24 को हुए “जेनजी आंदोलन” से जुड़े मामले में ओली को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है।

सरकार ने आयोग की जांच रिपोर्ट के आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री ओली और पूर्व गृहमंत्री को गिरफ्तार किया था। इसके बाद काठमांडू जिला अदालत ने हत्या से जुड़े आरोपों की जांच के लिए दोनों को पाँच दिन की हिरासत में रखने की अनुमति दी है।

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गिरफ्तारी को लेकर वकीलों के तर्क

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता टीकाराम भट्टराई ने अदालत में दलील दी कि मंत्रिपरिषद का निर्णय लेकर किसी व्यक्ति को सीधे गिरफ्तार करना संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि केवल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चयनात्मक गिरफ्तारी करना कानूनसम्मत नहीं है।

नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विजयप्रसाद मिश्र ने भी गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री होने के कारण ओली हमेशा सुरक्षा घेरे में रहते हैं और उनके भागने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए “जरूरी गिरफ्तारी वारंट का इस्तेमाल अनुचित और दुरुपयोग” है।

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वरिष्ठ अधिवक्ता राधेश्याम अधिकारी ने भी यही तर्क देते हुए कहा कि आयोग केवल कार्रवाई के लिए सुझाव दे सकता है, लेकिन उसके आधार पर सीधे फौजदारी कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार ने रिपोर्ट सार्वजनिक किए बिना ही जल्दबाजी में गिरफ्तारी की।

वरिष्ठ अधिवक्ता रामनारायण बिडारी और ललित बस्नेत ने भी अदालत में कहा कि जांच में सहयोग करने की स्थिति में किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना आवश्यक नहीं होता, जबकि इस मामले में सरकार ने सीधे गिरफ्तारी का रास्ता अपनाया।

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रिहाई की मांग

पूर्व महान्यायाधिवक्ता रमेश बडाल ने अदालत से आग्रह किया कि ओली को हाजिरी जमानत पर रिहा किया जाए और विपक्षी पक्ष से 24 घंटे के भीतर लिखित जवाब मांगा जाए।

उधर, इसी मामले में गिरफ्तार पूर्व गृहमंत्री की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट में अलग इजलास में सुनवाई हुई।

इस मामले ने नेपाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है, क्योंकि एक पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं

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