झीलों के शहर भोपाल की एक यादगार यात्रा : विनोदकुमार विमल

विनोदकुमार विमल, जुलाई 18, काठमांडू । 1 जुलाई को मैंने अपनी यात्रा शुरू की और काठमांडू से भैरहवा के लिए शाम 5: 30 बजे बस से निकल पड़ा l जैसे – जैसे हम पहाड़ों की ओर बढ़ रहे थे, शहर का प्रदूषण और कोलाहल पीछे छूटते जा रहा था l भैरहवा पहुँचते ही ठंडी हवाओं ने मेरा स्वागत किया l 2 जुलाई की सुबह, भैरहवा में चाय और नाश्ता करने के बाद, मैं गोरखपुर के लिए निकला । भोपाल की इस यात्रा में प्रभात सागर सिंह प्रधान, राधेश्याम विश्वकर्मा, डिल्लीराम शर्मा और रेखा यादव भी मेरे साथ थे । सोनौली से गोरखपुर जाते समय सुबह का तापमान तो ठीक – ठाक था, लेकिन जब मैं गोरखनाथ मंदिर परिसर पहुँचा, तो तापमान बढ़कर लगभग 36 डिग्री सेल्सियस हो गया था । ऐसा लग रहा था जैसे आसमान से आग बरस रही हो और ज़मीन से गर्म भाप उठ रही हो । गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को झुलसा रहे थे । मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु पसीने से तर – बतर थे और गर्मी से राहत पाने के लिए बेचैन थे ।
मंदिर जाने से पहले, मैं परिसर में मौजूद एक बड़े पेड़ के पास गया । वहाँ मैंने अपनी चप्पलें उतारीं और आस-पास की जगह को देखने लगा । देखते-देखते मेरी नज़र सबसे पहले मुख्य मंदिर पर पड़ी। मंदिर का मुख्य द्वार देखते ही बनता है l सफेद संगमरमर से बनी भव्य इमारत और इसकी नक्काशी अत्यंत मनमोहक है l मंदिर में प्रवेश करते ही एक अजीब सी सकारात्मक ऊर्जा का अहसास हुआ । सबसे पहले, मैंने ` गर्भ गृह ` में स्थापित गुरू गोरखनाथ जी की पावन प्रतिमा के दर्शन किए । उसके बाद, मैंने मुख्य मंदिर परिसर में स्थित देवी दुर्गा मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, विष्णु मंदिर, काली मंदिर और विभिन्न देवी – देवताओं के छोटे मंदिरों में फूल और चढ़ावा अर्पित किया । इस दौरान मुझे मानसरोवर और भीमसरोवर के दर्शन का भी अवसर मिला । यहाँ बिताए कुछ घंटों ने मुझे जीवन की भागदौड से दूर एक नई मानसिक शांति दी l
मैंने 2 जुलाई को गोरखपुर से भोपाल के रानी कमलापति रेलवे स्टेशन तक जाने वाली स्पेशल ट्रेन में स्लीपर क्लास का टिकट बुक किया था । मुझे लगा था कि मेरा सफर आरामदायक होगा, लेकिन यह मेरे जीवन का सबसे बुरा अनुभव बन गया l ट्रेन शाम 5:30 बजे निकलने वाली थी, जबकि मैं दोपहर 3:30 बजे ही स्टेशन पहुँच गया था । हालाँकि, ट्रेन तय समय से लगभग छह घंटे देरी से आई, जिससे मुझे करीब आठ घंटे तक काफी परेशानी का सामना करना पड़ा । जब ट्रेन आई, तो मैंने देखा कि आरक्षित डिब्बे में भी कुछ अनधिकृत यात्री घुसे हुए थे l वे लोग मेरी सीट पर बैठे थे और हटने को तैयार नहीं थे l उस रात मैंने बिना कुछ खाए यात्रा की असुविधाओं के बारे में सोचते हुए गहरी नींद ली । सुबह उठकर खिड़की से बाहर देखा, तो रास्ते पूरी तरह बदल चुके थे । सफर के दौरान हमारी मुलाकत कुछ अन्य यात्रियों से भी हुई , जिनके साथ हमने चाय पीते हुए अपने अनुभव और कहानियाँ साझा कीं ।
मैं 3 जुलाई की आधी रात को रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पहुँचा । स्टेशन पहुंचते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी हवाई अड्डे पर आ गया हूँ l यहाँ प्रवेश करने और बाहर निकलने के लिए अलग – अलग रास्ते बनाए गए हैं, जिसमें यात्रियों को भीड़ का सामना नहीं करना पड़ता l एक्सेलेटर और हाई – स्पीड लिफ्ट की मदद से पलैटफ़ॉर्म तक पहुंचना बहुत आसान है l पूरा स्टेशन परिसर बहुत ही स्वच्छ और हरा – भरा देखने को मिला l स्टेशन के गेट नंबर 1 से बाहर निकलने पर, निर्दलीय प्रकाशन के प्रतिनिधि – राजकुमार शिवम जी और एम.पी. व्यास जी हमें लेने के लिए पहले से ही वहाँ मौजूद थे l थोड़ी बातचीत के बाद, वे हमें गांधी भवन ले गए । वहाँ खाना खाने के बाद हम अपने – अपने ठहरने की जगहों पर चले गए ।
4 जुलाई की सुबह, तैयार होने के बाद, मैंने गांधी भवन परिसर में मौजूद कैफ़ेटेरिया में चाय और नाश्ता किया । वहाँ मेरी मुलाक़ात निर्दलीय अख़बार के संस्थापक और संपादक कैलाश श्रीवास्तव ‘आदमी’ जी से हुई l मैं आगे बढ़ा और ‘नमस्कार’ कहकर उनका अभिवादन किया । उनकी गर्मजोशी भरी मुस्कान और प्यार भरे स्वागत- “आप कैसे हैं ?” पूछने के अंदाज़ ने तुरंत मेरी झिझक दूर कर दी । कैलाश जी की सादगी, शालीन व्यवहार और लेखन के प्रति उनके गहरे लगाव ने हमारी पहली ही मुलाकात में मेरा मन मोह लिया । उनके साथ हुई यह मुलाक़ात मेरे लिए केवल एक सामान्य बातचीत नहीं थी; यह मेरे साहित्यिक और अकादमिक सफ़र के लिए अमूल्य ऊर्जा का स्रोत और एक मार्गदर्शक प्रकाश बन गई । इसी प्रकार, राजकुमार शिवम ( भोपाल ), विमला प्रधान जोशी ( दार्जिलिंग ), चंद्रकुमार सचेतक ( सिलीगुड़ी) , सुभद्रा बमजन (दार्जिलिंग), मुक्तिनाथ शर्मा (दार्जिलिंग ) , एनपीएस निरौला (सिक्किम) , सावित्री प्रधान ( सिक्किम ), बाबूराम श्रेष्ठ (नेपाल), वाणी कर्ण (नेपाल), डॉ. चिंतन त्रिवेदी (गुजरात), डॉ. लीना त्रिवेदी (गुजरात), समर बहादुर `सरोज` (प्रयागराज), रामा निगम ( भोपाल ) सहित कवियों और लेखकों के साथ साहित्यिक विचारों का आदान – प्रदान करने का अवसर मिला ।
मेरी यात्रा की शुरुआत भोपाल की शान ` भोजताल` से हुई l राजा भोज द्वारा 11 वीं शताब्दी में निर्मित यह झील इतनी विशाल है कि इसे देखकर समुद्र का भ्रम होता है l शांत जल और चारों ओर फैले प्राकृतिक नजारे इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते है l मैं पैडल बोट से भोजताल के बीच स्थित तकिया द्वीप गया, जहाँ हज़रत शाह अली शाह की दरगाह है । लगभग आधे घंटे की बोटिंग के बाद, मैं झील के किनारे लौटा और यादगार के तौर पर तस्वीरें लीं । ये तस्वीरें मेरे लिए हमेशा यादगार रहेंगी ।
अपनी यात्रा के दौरान, मैं मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय गया । संग्रहालय में प्रवेश करते ही विभिन्न जनजातियों की समृद्ध जीवनशैली और उनके संघर्षों का सजीव चित्रण देखने को मिला । इस संग्रहालय में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सात प्रमुख जनजातियों – गोंड, भील, बैगा, सहरिया, कोरकू, कोल और भारिया की संस्कृति, जीवनशैली और कला को दिखाया गया है । यहाँ कलात्मक भित्ति – चित्र, मूर्तियाँ और ऐसी प्रदर्शनी हैं जो आदिवासियों की शादियों, त्योहारों और रीति – रिवाजों की झलक दिखाती हैं । यहाँ प्रकृति और पृथ्वी की पूजा से जुड़ी परंपराओं, लोक-कथाओं और देवी-देवताओं को समर्पित संरचनाएँ भी देखी जा सकती हैं l जनजातीय संग्रहालय भ्रमण के बाद, मैं ‘ वीथी संकुल ‘ नामक इनडोर गैलरी में गया । यहाँ मानव के जैविक विकास और भारत की विविध लोक कलाओं, शिल्पकलाओं व पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों को बहुत खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया है । यहाँ प्रदर्शित पारंपरीक पोशाकें, हस्तकला की वस्तुएँ और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले प्राचीन औजारों ने मुझे बहुत आकर्षित किया । मेरे लिए, ये दोनों ही यात्राएँ ज्ञानवर्धक और बेहद शांतिपूर्ण थीं ।
जुलाई 5 को निर्दलीय प्रकाशन की 53 वीं वर्षगांठ के जश्न के लिए गांधी भवन परिसर में कवियों, लेखकों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रोफेसरों के जुटने से वहां काफी उत्साह और चहल – पहल थी । सुबह से ही गांधी भवन परिसर में प्रतिभागियों की आवाजाही देखी जा सकती थी; कुछ प्रतिभागी एक – दूसरे से जान – पहचान कर रहे थे, तो कुछ चाय – नाश्ते का आनंद ले रहे थे, कुछ गांधी भवन को देख – परख रहे थे, जबकि कुछ प्रतिभागी तस्वीरें लेने में व्यस्त थे । मैंने कई प्रतिभागियों से मुलाक़ात और जान – पहचान की और तस्वीरें भी लीं । फिर मैं भोपाल से आए प्रतिभागियों के साथ गांधी भवन परिसर देखने निकला । इस दौरान मुझे उस जगह के बारे में काफ़ी जानकारी मिली । यहाँ गांधी जी के जीवन मूल्यों, सर्वधर्म प्रार्थना स्थल और शांतिपूर्ण परिवेश ने मन को मोह लिया । यहाँ की शांत और सादगी भरी वास्तुकला सभी धर्मों की एकता और भाईचारे का संदेश देती है । भवन के आसपास हरे – भरे बगीचे और पेड़ – पौधे हैं, जो इसे एक प्राकृतिक और आध्यात्मिक आभा प्रदान करते हैं । यह जगह इतिहास प्रेमियों, साहित्य प्रेमियों और गांधीवादी विचारधारा में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए भोपाल में घूमने के लिए एक आदर्श और ज्ञानवर्धक स्थान है ।
जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो हमें एक नई दृष्टि और ऊर्जा प्रदान करते हैं l 5 जुलाई को, मुझे गांधी भवन में ‘निर्दलीय मासिक पत्रिका` द्वारा आयोजित ‘ निर्दलीय मासिक पत्रिका सह प्रकाशन` की 53वीं वर्षगांठ के समारोह में नेपाल से एक विशेष अतिथि के तौर पर भाग लेने का अवसर मिला । यह अनुभव मेरे लिए ज्ञान और प्रेरणा का एक अद्भुत संगम था l इस समारोह में भारत के जाने माने विचारकों, प्राध्यापकों और विशेषज्ञों से मिलने और उन्हें सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ l हमने विचारों का आदान – प्रदान किया, जिससे मुझे अपने लेखन कार्य को नई दिशा देने की प्रेरणा मिली ।
इस समारोह की एक खास बात थी नेपाल और भारत के 42 सृजनधर्मियों को ‘ विश्व साहित्य सम्मान ‘ और भारत के 14 राज्यों के 62 साहित्यकारों, शिक्षाविदों और समाज सेवियों को ‘ राष्ट्रीय शिक्षर सम्मान ‘ से सम्मानित करना । एक और मुख्य आकर्षण भाषाई विविधता पर हुई चर्चा थी, जिसने मुझे सोचने का एक नया आयाम दिया । इस मौके पर, दिल्ली के ‘वात्सल्य ग्रुप’ की संस्थापक कविता मल्होत्रा के निर्देशन में प्रशिक्षित युवाओं के एक समूह ने संगीत और नृत्य की रंगारंग प्रस्तुति दी, जिसे समारोह में शामिल प्रतिभागियों ने बहुत उत्साह के साथ सराहा । दूसरे दौर में दुर्गा मिश्रा के नेतृत्व में भी संगीत व नृत्य समूह ने अपनी प्रस्तुति दी l
मुझे समारोह के उद्घाटन सत्र में एक विशेष अतिथि के तौर पर स्वागत भाषण देने, भाषाई चर्चा सत्र में विशेष अतिथि के रूप में शामिल होने और वैश्विक काव्य सम्मेलन में कविता पाठ करने का भी मौका मिला, जिसे मैं अपने जीवन की एक बड़ी उपलब्धि मानता हूँ । इसके अलावा, मुझे सम्मान समारोह सत्र में 40 से ज़्यादा लेखकों, साहित्यकारों, समाज सेवकों और विशेषज्ञों को व्यक्तिगत रूप से प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित करने का शानदार अवसर भी मिला । सम्मान समारोह के आरम्भ में निर्दलीय के संपादक प्रिंस अभिशेख ` अज्ञानी` ने अपने ओजस्वितापूर्ण उद्बोधन में निर्दलीय की प्रकाशन यात्रा के साथ सहयोगी दृष्टि जन संगठन और माधव जीवन योग केंद्र की गतिविधियों पर प्रकाश डाला l जब वे बोल रहे थे, तो ऐसा लगा मानो पूरा सभागार शांत हो गया हो । मुझे उनके हर शब्द में एक जादुई शक्ति महसूस हुई । अन्ततः यह समारोह केवल कुछ औपचारिक सत्रों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह विचारों के मंथन, नई सीख और आत्म मूल्यांकन का एक बेहतरीन मंच था l वहाँ से मिले अनुभव और यादें हमेशा मेरे जीवन और करियर का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेंगी l
6 जुलाई को मैं गांधी भवन से न्यू मार्केट गया; इसे भोपाल का ऐतिहासिक व्यापारिक केंद्र माना जाता है । यहाँ स्ट्रीट शॉपिंग के लिए बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं और यह कम कीमत पर अच्छी चीज़ें ढूंढने वालों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है । इसके बाद, मैं बैरागढ़ मार्केट गया, जहाँ लहंगे, सलवार – कमीज़ और रोज़मर्रा के कपड़े कम कीमतों पर मिलते हैं, जो काठमांडू की तुलना में काफी सस्ते हैं । इस बीच, मुझे गांधी भवन के आस – पास की जगहों, जैसे हिंदी भवन, मानस भवन, भारत भवन, सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज आदि का निरीक्षण करने का भी मौका मिला ।
भोपाल यात्रा के दौरान, मुझे 6 जुलाई को दोपहर लगभग 2:30 बजे गांधी परिसर के भीतर ‘प्रेरणा स्थल’ कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित ‘इंडियन जर्नलिस्ट्स फेडरेशन’ (भोपाल, मध्य प्रदेश इकाई) की प्रतिष्ठित बैठक में विशेष अतिथि के तौर पर शामिल होने का मौका मिला । इसका श्रेय मैं कैलाश श्रीवास्तव ` आदमी` जी को देना चाहूंगा । बैठक के दौरान, मुझे कई सीनियर पत्रकारों से मिलने और उनसे जान – पहचान करने का मौका मिला, जिनमें विमल कृष्ण थंबा (भुवनेश्वर ), डॉ. शिल्पी समद्दर ( छत्तीसगढ़) , वसंत राव भगत ( छतीसगढ़), प्रमिला राउत (महाराष्ट्र) , दाऊ पटेल (मध्य प्रदेश) , मनोज शर्मा (छतीसगढ़ ) और राजीव भाई ( गुजरात ) शामिल थे । मैंने अपनी शुभकामनाएं देते हुए एक छोटा सा भाषण दिया और फिर सभी से विदा ली । कई दोस्त मुझे छोड़ने के लिए बाहर तक आए; जैसे ही मैं बाहर निकला, बिछड़ने के गम में मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े । आँसू देखकर कैलाश जी और कई अन्य मित्र काफी भावुक हो गए । अगले साल वापस आने का आग्रह करते हुए, कैलाश जी और अन्य लोग हॉल में चले गए । मैंने भी सभी से विदा ली और गांधी भवन के गेट की ओर चल पड़ा ।
मेरी ट्रेन शाम 6:30 बजे की थी, इसलिए मैं जल्दी – जल्दी गांधी भवन परिसर से निकला, एक थ्री – व्हीलर ली और बैरागढ़ के संत हिरदाराम रेलवे स्टेशन पहुँच गया । इंदौर – पटना एक्सप्रेस समय पर आ गई । शाम के समय ट्रेन ने जब अपनी गति पकड़ी,तो खिड़की से बाहर का नजारा देखने लायक था l हरे – भरे खेत, छोटे – छोटे गांव और सूरज ढलने का मनमोहक दृश्य आंखों को बहुत सुकून दे रहा था l हवा का झोंका और रेल के पटरी की आवाज मेरे मन को आनंदित कर रही थी l अलग – अलग जगहों के यात्री अपने – अपने अनुभव साझा कर रहे थे l मैंने कुछ यात्रियों से बात की, जिससे मेरे मन में उत्साह जगा l ट्रेन के डिब्बे में सफर काफी आरामदायक था l रेल यात्रा के दौरान मिले अनुभवों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और लोगों की विविधता को समझने का मौका मिला l
मैं 7 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुँचा । वहाँ से एक ऑटो – रिक्शा लेकर मैं गांधी मैदान के पास वाले बस स्टेशन पहुँचा । रक्सौल बॉर्डर जाने वाली बस रात 9 बजे की थी, इसलिए मैंने गांधी मैदान के आस -पास के बाज़ारों को देखने में तीन – चार घंटे बिताए । गाड़ी ठीक 9 बजे पटना से रवाना हुई और मैं सुबह करीब 4 बजे भारत के बिहार राज्य की सीमा पर स्थित रक्सौल पहुँचा । इसके बाद, मैंने बॉर्डर पार किया और नेपाल की तरफ़ पहुँच गया । नेपाल बॉर्डर पर चाय और बिस्कुट लेने के बाद, मैं हाएस गाड़ी से काठमांडू के लिए निकला और ठीक सुबह 10:30 बजे काठमांडू पहुँचा । जब तक मैं अपने कमरा पहुंचा, तब तक सुबह के 11;30 बाज चुके थे ।
भोपाल को यूं ही ` झीलों का शहर ` नहीं कहा जाता । जब मैंने इस ऐतिहासिक और प्राकृतिक सुंदरता से भरपुर शहर की यात्रा की, तो हर पल एक नई कहानी कहता नजर आया l आधुनिकता और प्राचीन संस्कृति का यह अनूठा संगम किसी भी यात्रा को मंत्रमुग्ध कर सकता है l यहाँ की सड़कें आधुनिक और सुव्यवस्थित हैं, जबकि शहर की हरियाली और ऐतिहासिक झीलें इसकी प्राकृतिक सुंदरता के चार चांद लगाते हैं l भोपाल की अधिकांश सड़कों के दोनों ओर नीम, पीपल,गुलमोहर और बरगद जैसे छायादार और सजाबटी वृक्ष लगे हुए हैं, जो बढ़ते तापमान और प्रदूषण को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं l भोपाल में जुलाई का महीना मानसून का मुख्य समय है, जिसके दौरान शहर में मध्यम से भारी बारिश होती है l
भोपाल का यह सफर केवल एक अकादमिक नहीं था,बल्कि एक ऐसी याद हैं, जिसे मैं हमेशा अपने दिल से करिब रखूंगा l यहाँ का लजीज स्थानीय खाना, जैसे सुबह का पोहा और जलेबी तथा यहाँ के लोगों का आतिथ्य यात्रा के सबसे बेहतरीन हिस्से रहे l भोपाल यात्रा ने न केवल अपने प्राचीन इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता से मुझे मंत्रमुग्ध किया, बल्कि `निर्दलीय प्रकाशन` के संस्थापक सम्पादक और उनकी टीम ने भी मुझे अपनापन महसूस कराया । इस यात्रा ने मेरे भीतर एक नया आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा भर दी l प्रकृति की इस दिव्यता ने मुझे जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की सीख दी । यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे यादगार और सुकून भरी यात्राओं में से एक बन गई, जिसे मैं हमेशा याद रखूंगा ।


