नेपाली साहित्य और लेखकों पर प्रेमचंद का प्रभाव : विनोदकुमार विमल
“साहित्य वह मशाल है जो राजनीति से आगे चलती है ।” इसी विश्वास को अपनाते हुए धरणीधर कोइराला, युद्धप्रसाद मिश्र और युद्धबीर राणा जैसे नेपाली साहित्यकारों ने राणा शासन और पंचायत व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल किया ।
विनोदकुमार विमल, 31 जुलाई,, काठमांडू । प्रेमचंद हिंदी और उर्दू साहित्य के एक बहुत बड़े व्यक्तित्व हैं । साहित्यिक जगत में उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ और ‘कलम का सिपाही’ के नामों से जाना जाता है । नेपाली साहित्य की जानी – मानी हस्तियाँ प्रेमचंद की लेखन शैली और सामाजिक चेतना से प्रभावित थीं । प्रेमचंद का साहित्य नेपाली कथाओं में सामाजिक यथार्थवाद को लाने के लिए प्रेरणा का एक प्रमुख स्रोत रहा है । नेपाली साहित्य और प्रेमचंद का संबंध बहुत गहरा, ऐतिहासिक और पारस्परिक सम्मान का रहा है । प्रेमचंद केवल हिंदी और उर्दू के महान लेखक नहीं थे, बल्कि उन्होंने नेपाली साहित्य के विकास और यहाँ के लेखकों को प्रेरित करने में भी एक युगांतरकारी भूमिका निभाई । प्रेमचंद का साहित्य मुख्य रूप से किसानों, मजदूरों, शोषितों, महिलाओं की स्थिति और सामंतवाद के खिलाफ आवाज उठाता है । नेपाल का समाज भी लंबे समय तक कृषि प्रधान और पहाड़ी – ग्रामीण परिवेश से जुड़ा रहा है । यही कारण है कि ‘होरी’ (गोदान का मुख्य पात्र) और ‘बूढ़ी काकी’ जैसी कहानियां नेपाली समाज को अपनी खुद की कहानी जैसी लगती है l
हिंदी में प्रेमचंद द्वारा उठाए गए सामाजिक मुद्दे नेपाली साहित्य के ‘शारदा युग’ (लगभग 1991 वि.सं. ) के लेखकों के लिए मुख्य विषय बन गए l नेपाली साहित्य में बाल विवाह, बेमेल विवाह और विधवाओं की पीड़ा जैसे विषयों को उसी तरह दिखाया गया, जैसे प्रेमचंद की `निर्मला` या ` सेवासदन` में । ठीक वैसे ही, जैसे ‘गोदान’ में नेपाली समाज में ज़मींदारों, साहूकारों और गरीब किसानों के बीच वर्ग-भेद को दिखाया गया था ।
प्रेमचंद की लेखन शैली – जिसने जाति – प्रथा, दहेज प्रथा, ज़मींदारों द्वारा शोषण और समाज में व्याप्त अंधविश्वास के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, ने नेपाली प्रगतिशील साहित्य की नींव रखने में मदद की । लैनसिंह बांगदेल और हृदयचंद्र सिंह प्रधान जैसे साहित्यकारों के उपन्यासों और कहानियों में वर्ग – संघर्ष, गरीबी और सामाजिक बुराइयों के विरोध के जो विषय मिलते हैं, वे प्रेमचंद के ` गोदान` या `गबन` जैसे कालजयी रचनाओं के वैचारिक आधार से मेल खाते हैं । प्रेमचंद की रचनाएं जैसे `गोदान`, `गबन`, `निर्मला` और `पंच परमेश्वर` नेपाल में आम पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं । उनकी कई मशहूर कहानियों का नेपाली में अनुवाद किया गया है और उन्हें स्कूल और यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है l
प्रेमचंद के सामाजिक यथार्थवाद और आदर्शोन्मुख यथार्थवाद ने नेपाली कथा और उपन्यास विधाओं के विकास की नींव रखी है । प्रेमचंद से पहले, नेपाली और हिंदी साहित्य पर अलौकिक, जादुई (तिलिस्मी) और काल्पनिक कहानियों का दबदबा था । प्रेमचंद ने साहित्य को समाज का आईना बनाया और गरीबों, किसानों, दलितों और शोषित वर्गों की समस्याओं को चित्रित किया । इसी चलन से प्रभावित होकर नेपाली साहित्य में भी आम लोगों के दुख – दर्द और ग्रामीण जीवन को शामिल किया जाने लगा । नेपाली कथा के पुरोधा गुरुप्रसाद मैनाली की लेखन शैली और आदर्शों की सीधी तुलना प्रेमचंद से की जाती है । मैनाली के मशहूर संग्रह `नासो` में ग्रामीण समाज, आपसी झगड़े और अंत में भावनात्मक मेल-मिलाप (आदर्शवादी यथार्थवाद) जैसे तत्व दिखाई देते हैं, जो प्रेमचंद की रचनाओं, जैसे – `पंच परमेश्वर या `दो बैलों की कथा` की याद दिलाते हैं ।

यथार्थवाद और प्रमुख नेपाली लेखकों की साहित्यिक शैलियों के बीच कई समानताएं पाई जाती हैं । प्रेमचंद की तरह ही, नेपाली सामाजिक उपन्यासकारों, जैसे – लैनसिंह बांगदेल और भवानी भिक्षु ने भी निचले वर्ग की दुर्दशा, गरीबी और सामाजिक बुराइयों की तीखी आलोचना की है । मानवीय मन का द्वंद्व, जो प्रेमचंद की कहानियों में साफ दिखता है – विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला के मनोवैज्ञानिक उपन्यासों और कहानियों में और भी ज़्यादा गहराई से मिलता है । लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा, बालकृष्ण सम और लेखनाथ पौड्याल का सक्रिय दौर ( नेपाली साहित्य के विकास का युग) प्रेमचंद के करियर के बाद के चरण और उसके बाद के साहित्यिक माहौल के समानांतर है ।
प्रेमचंद के समकालीन नेपाली साहित्यकारों में मुख्य रूप से नेपाली साहित्य के माध्यमिक काल (शास्त्रीय / शृंगारिक धारा) और आधुनिक काल की शुरुआत के प्रमुख लेखक आते हैं, लेखनाथ पौड्याल, बालकृष्ण सम, लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा, धरणीधर कोइराला, गुरु प्रसाद मैनाली l लेखनाथ पौड्याल ( 1885 – 1995) को नेपाली साहित्य में ‘शिरोमणि’ की उपाधि दी गई है । ये प्रेमचंद के सबसे सटीक समकालीन कवि हैं । इन्होंने नेपाली कविता को मध्ययुगीन शृंगारिकता से निकालकर परिष्कृत और नैतिक चेतना की ओर मोड़ा । बालकृष्ण सम ( 1902 – 1986 ) नेपाली नाटक के इतिहास में ‘नाट्य सम्राट’ माना जाता है । जब प्रेमचंद भारत में सामाजिक यथार्थवाद पर आधारित उपन्यास और कहानियां लिख रहे थे, ठीक उसी दौर (1920–1930 के दशक) में इन्होंने नेपाली नाटक जगत में सामाजिक, दार्शनिक और आधुनिक बौद्धिक चेतना की शुरुआत की l लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (1909–1959) ने अपना लेखन 1920 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू किया था । प्रेमचंद के जीवन के अंतिम वर्षों ( जैसे 1935 में ‘गोदान’ के समय) देवकोटा का प्रसिद्ध खंडकाव्य `मुनामदन` ‘प्रकाशित हुआ था, जो समाज के गरीब वर्ग और श्रम की पीड़ा को दर्शाता है l धरणीधर कोइराला (1893–1979) प्रेमचंद की तरह ही समाज सुधार, शिक्षा और अंधविश्वास के कट्टर विरोधी थे । इनकी कृति ‘ नैवेद्य` (1920) नेपाली समाज को जगाने के लिए लिखी गई थी । सूर्यविक्रम ज्ञवाली (1898–1985) का सक्रिय काल पूरी तरह प्रेमचंद के कालखंड से मेल खाता है । आधुनिक नेपाली कहानी के जनक गुरुप्रसाद मैनाली (1900–1971) को नेपाली साहित्य का ‘प्रेमचंद’ भी कहा जा सकता है। यद्यपि इनका कहानी संग्रह ‘ नासो` प्रेमचंद के निधन के बाद लोकप्रिय हुआ, लेकिन इन्होंने अपनी कहानियों में ठीक प्रेमचंद की तरह ही ग्रामीण जीवन, सामाजिक विसंगतियों, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं का यथार्थवादी चित्रण किया l
प्रेमचंद के उपन्यास, जैसे `गोदान` और `सेवासदन` ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा किसानों के शोषण का जीवंत चित्रण करते हैं । इन रचनाओं ने नेपाल के राणा शासनकाल और उसके बाद के राजनीतिक आंदोलनों के दौरान किसान विद्रोहों, भूमि सुधार की पहलों और ` ज़मीन उसकी जो उसे जोते` जैसे राजनीतिक नारों को आकार देने के लिए वैचारिक प्रेरणा प्रदान की l प्रेमचंद के साहित्य में गांधीजी के `अहिंसक आंदोलन` और `मार्क्सवादी समाजवाद` दोनों का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है ।
नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन के अगुआ विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला जैसे नेता नेपाली राजनीति में लोकतांत्रिक समाजवाद को लाने के लिए प्रेमचंद के सामाजिक यथार्थवाद से प्रेरित थे । “साहित्य वह मशाल है जो राजनीति से आगे चलती है ।” इसी विश्वास को अपनाते हुए, धरणीधर कोइराला, युद्धप्रसाद मिश्र और युद्धबीर राणा जैसे नेपाली साहित्यकारों ने राणा शासन और पंचायत व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल किया । सिर्फ़ पढ़े – लिखे या खास लोगों की समझ में आने वाली मुश्किल भाषा के बजाय, प्रेमचंद ने ‘हिंदुस्तानी’ (आसान हिंदी / उर्दू) का इस्तेमाल किया – एक ऐसी भाषा जो आम लोगों की समझ में आती थी । इससे प्रेरित होकर नेपाली नेताओं और लेखकों ने भी जनता तक अपने राजनीतिक विचार पहुँचाने के लिए आसान और लोगों से जुड़ी नेपाली भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया । इस तरह, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रेमचंद द्वारा पैदा की गई वैचारिक लहर नेपाल पहुँची और यहाँ के क्रांतिकारियों, राजनीतिक विचारकों और बदलाव लाने वालों को समानता, सामाजिक न्याय और लोगों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने के लिए लगातार प्रेरित करती रही ।
संक्षेप में, प्रेमचंद द्वारा दिखाए गए साहित्यिक मार्ग ने नेपाली साहित्य को कल्पना और रोमांस से दूर हटाकर ठोस यथार्थ और सामाजिक परिवर्तन की ओर ले जाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । प्रेमचंद का साहित्य और नेपाली साहित्य, दोनों ही दक्षिण एशियाई साहित्यिक परंपरा के महत्त्वपूर्ण और सशक्त स्तंभ हैं । ये दोनों ही साहित्य अपने – अपने समाजों की वास्तविकताओं, जिनमें गरीबी, जाति- आधारित भेदभाव और मानवीय संवेदनाएं शामिल हैं – का जीवंत चित्रण करते हैं । चूंकि हिंदी और नेपाली दोनों ही देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं और संस्कृत से प्रभावित हैं, इसलिए प्रेमचंद की रचनाएं हमेशा से नेपाली पाठकों और लेखकों के लिए सुलभ और प्रेरणादायक रही हैं । प्रेमचंद ने भूगोल और भाषा की सीमाओं को तोड़कर नेपाली मानस को प्रभावित किया । उन्होंने नेपाली साहित्य को मध्यकालीन रूढ़ियों से निकालकर आधुनिकता और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का मार्ग दिखाया । यही कारण है कि नेपाल के साहित्यिक हलकों में आज भी प्रेमचंद को अत्यंत सम्मानजनक स्थान प्राप्त है ।
प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि । वे एक महान लेखक थे, जिन्होंने गोदान, गबन, ईदगाह और कफन जैसी अमर रचनाएँ लिखीं; होरी, धनिया और हामिद जैसे पात्रों के ज़रिए समाज की सच्चाई दिखाई; और शोषितों, वंचितों व किसानों की आवाज़ बने ।




वाब बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है सर आपने ।बधाई हो ऐसे ही अनवरत लिखते रहिए ।🙏🏼