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जलता मधेश और मौन सरकार

 

कैलाश दास:मधेश धूँ…धूँ कर जल रहा है । एक ओर आन्दोलनकारी तो दूसरी ओर सरकार की पुलिस प्रशासन । मधेशवादी के लिए नारा जुलूस और प्रदर्शन दिनचर्या बनी तो प्रशासन उस पर बन्दूक की गोलियाँ, अश्रु गैस, लाठी प्रहार कर अपनी विवशता जाहिर कर रहे हैं । क्या यही है लोकतन्त्र ? जहाँ अधिकार की लड़ाई की बात हो तो बन्दूक की गोलियाँ खानी पड़ती हंै । निहत्थे जनता को घेराबन्दी कर प्रशासन उस पर गोलियाँ, अश्रु गैस, लाठी प्रहार कर बहादुरी दिखा रही है । इससे तो स्पष्ट होता है एक क्रुर शासन का अन्त हुआ तो दूसरी उससे भी ज्यादा क्रुर शासन का सामना मधेशी जनता को करना पड़ रहा है । चाहे वह कैलाली की घटना हो, गौर की घटना हो या जनकपुर की घटना हो । २०६४÷०६४ साल में हुए मधेश आन्दोलन से भी भयावह बनता जा रहा है २०७३ का दूसरा मधेश आन्दोलन । नेपाली—नेपाली जनता के बीच विभेद का बीजारोपण कैलाली घटना स्पष्ट करती है । देश को गलत दिशा में जाने से सरकार को  रोकने का प्रयास होना चाहिए न कि प्रशासनिक निकाय का स्टेटमेण्ट (रमेश खरेल) मधेशी और दलित कहलानेवाले आन्दोलनकारी को गोली मार दिया जाए कहकर आन्दोलन को हिंसात्मक दिशा में बढ़ने से मजबूर किया जाए ।

यही है लोकतन्त्र ? जहाँ अधिकार की लड़ाई की बात हो तो बन्दूक की गोलियाँ खानी पड़ती हंै । निहत्थे जनता को घेराबन्दी कर प्रशासन उस पर गोलियाँ, अश्रु गैस, लाठी प्रहार कर बहादुरी दिखा रही है । इससे तो स्पष्ट होता है एक क्रुर शासन का अन्त हुआ तो दूसरी उससे भी ज्यादा क्रुर शासन का सामना मधेशी जनता को करना पड़ रहा है । चाहे वह कैलाली की घटना हो, गौर की घटना हो या जनकपुर की घटना हो ।
लोकतन्त्र में जनता सर्वोपरी मानी जाती है । लेकिन सरकार ने प्रशासन के बल पर मधेशी जनता के साथ शक्ति आजमाइश की प्रतीक्षा में देखा गया, आखिर क्यो ? लोकतान्त्रिक सरकार का दायित्व होता है कि लगातार बन्द हड़ताल रोकने के लिए आन्दोलनरत दल के साथ वार्ता करें, न कि सप्तरी, कपिलवस्तु, धनुषा, वारा पर्सा, महोत्तरी सहित के जिलों में लगी आन्दोलन कीे आग को बन्दूक की गोलियाँ से दहशत फैलाबे । सरकार के दमन और मधेशी दल के आन्दोलन से कभी भी संकट समाधान सम्भव नही हुआ है । अगर सम्भव होता तो ०६४ का मधेश आन्दोलन में ५२ लोग शहादत दिए थे । करोड़ों की राष्ट्रीय सम्पति नष्ट हो गई थी उसके बावजूद भी वार्ता ही एक माध्यम निकला था ।
वार्ता के नाम पर मधेशी दल का एक सवाल है ‘वार्ता का आधार क्या होना चाहिए ? किसके विश्वास पर वार्ता किया जाए ? वार्ता के बाद हुए सम्झौता को कार्यान्वयन की जगह बच्चो का खिलौना समझे तोे अब की बार वार्ता नहीं संविधान में विगत में हुए सहमति को कार्यान्वयन किये जाने पर मात्र आन्दोलन को विराम देंगें ।’ सवाल है कि मधेशी दल क्याें आन्दोलन में है और सरकार क्याें नहीं आन्दोलन को सम्बोधन करना चाहती है ? यह असमन्जस आम जनता के लिए बड़ी ही उत्सुकता का विषय बना हुआ है । लेकिन वास्तव में संविधान में अधिकार सुनिश्चिता के लिए विगत में जो मधेशी दल के साथ समझौता किया गया है उस समझौता से सरकार के मुकर जाने की देन है यह आन्दोलन । राजतन्त्र के अन्त के पश्चात् लोकतान्त्रिक संविधान के लिए दूसरी बार चुनाव किया गया । उसके वावजूद भी इमानदारी के अभाव में संविधान उलझन में पड़ा है । प्रथम संविधान सभा चुनाव वैसे ही चला गया । लेकिन दूसरा चुनाव में सभी राजनीतिक
दल एक साथ प्रतिबद्धता जनाने के बाद भी जनता के  प्रति  भावनात्मक विभेद के कारण द्वन्द्ध में फंसा है ।
इस बार नेपाली काँग्रेस, नेकपा एमाले, एमाओवादी, फोरम लोकतान्त्रिक ने मिलकर जिस प्रकार से संविधान का मसौदा लाया है वह वास्तव में बहादुरी है । लेकिन मसौदा विभेदकारी होने के कारण जनता के समक्ष बहादुर नहीं बन सका । खासकर मधेशी जनता के लिए लाया गया मसौदा तत्पश्चात् ६ प्रदेश का सीमांकन विगत में हुआ समझौता विपरीत है । मधेश नेतृत्वकर्ता (संघीय समाजवादी फोरम नेपाल,तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी, सद्भावना पार्टी, नेपाल सद्भावना पार्टी सहित) दल के अनुसार जितनी जल्द संविधान निर्माण हो मधेशी जनता की यही चाहना है । संविधान निर्माण का बाधक मधेशी जनता नहीं है । परन्तु कानून और अन्तरिम संविधान का उल्लंघन कर संविधान निर्माण किया जाए यह कदापि स्वीकार भी नहीं है ।

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अभी जिस प्रकार प्रमुख चार दल संविधान निर्माण के क्रम में अन्तरिम संविधान कीे धज्जियाँ उड़ा रहे हंै इसके विरोध में है मधेशवादी दल । वर्तमान में मधेशवादी दलो की कोई माँग नही है । विगत में जो सम्झौता हुआ था उन्हें संविधान में समावेश करने का आन्दोलन है यह ।
मोर्चा के साथ विगत में हुआ सम्झौता १ माघ ०६४ में संघीयता के बिना अन्तरिम संविधान जारी किया गया । जिन्हें तत्कालीन मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने २ माघ ०६४ में अन्तरिम सविधान का प्रतिलिपि जलाया । यादव का मानना था कि संघीयता सहित अन्तरिम संविधान जारी किया जाए । वहीं से संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने आन्दोलन की घोषणा की थी । माघ ४ में लहान में विद्यार्थी रमेश महतो की आन्दोलन के क्रम में गोली लगकर मौत हो गयी । महतो के मौत के पश्चात मधेश आन्दोलन उग्र रूप ले लिया था । करीब १९ दिन के आन्दोलन पश्चात् बाध्य होकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने २२ माघ ०६३ में जनता के नाम से सम्बोधन किया । सम्बोधन में मधेशी जनता ने जो माँग उठायी थी उन्हें पूरा करने, पुनर्संरचना करने, गणतन्त्र को संस्थागत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की । उसके बाद तो मधेश में आन्दोलन और विस्तार रूप ले लिया । चार दिन के बाद कोइराला ने २६ माघ में दूसरा सम्बोधन किया । जिसमे स्वायत्ततता, आत्मनिर्णय का अधिकार सहित संघीय लोकतान्त्रिक राज्य की बात उल्लेख है ।
तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजा कोइराला को सम्बोधन के बाद मधेशी दल ने संविधान संशोधन की माँग करते हुए आन्दोलन जारी रखा जिनमे मधेशी सभी जनता, संघ संस्था सड़क पर आ गए थे । तत्पश्चात २०६४ भाद्र १३ गते औपचारिक वार्ता शान्ति मन्त्रालय में हुआ । जिनमे २२ बुँदे janak-mahilaसमझौता हुआ और मधेश आन्दोलन स्थगित कर दिया गया । २२ बुँदे समझौता तो हुआ लेकिन कार्यान्वयन में आनाकानी करने लगे । फिर से २२ बुँदे समझौता कार्यान्वयन नही किया गया तो आन्दोलन की चेतावनी दी गयी । उसी समय महन्थ ठाकुर नेतृत्व में तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी गठन हुआ था । २२ बुँदे समझौता कार्यान्वयन के लिए फोरम नेपाल, तमलोपा और सद्भावना पार्टी बीच संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा गठन हुआ और मोर्चा ने २०६४ फागुन १ गते दूसरा चरण का आन्दोलन घोषणा किया । यह आन्दोलन भी लम्बा चला था । पहाड़ का जनजीवन अस्तव्यस्त होने लगा था । आन्दोलनकारी ने सभी नाका बन्द कर दिया था ।  तब बाध्य होकर १५ दिन के बाद सरकार ने मधेशी मोर्चा के साथ वार्ता के लिए आह्वान किया ।  उस समय मोर्चा का मानना था अब किसी प्रकार का वार्ता नही, २२ बुँदे सम्झौता अन्तरिम संविधान में कार्यान्वयन होने पर आन्दोलन फिर्ता लिया जाऐगा । सरकार की ओर से दवाब बढ़ने पर मोर्चा और सरकार के साथ फागुन १६ गते बालुवाटार में ८ बुँदे समझौता हुआ । समझौता स्वायत मधेश एक प्रदेश, आत्मनिर्णय का अधिकार, संघीयता सहित संविधान, समावेशी, समानुपातिक सहित का बुँदा था । २०६५ साल जेठ १५ गते अन्तरिम संविधान चौथा बार संशोधन हुआ ।

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आन्दोलन क्यो ?
मधेश आन्दोलन से सबसे ज्यादा नुकसान मधेशी जनता का ही है । उसके वावजूद भी मधेश नेतृत्वकर्ता के आह्वान में किया मधेश बन्द मधेशी जनता ने सरल रूप से स्वीकार किया है । बन्दी से जनजीवन प्रभावित है, शिक्षण संस्था डूबती नजर आ रही है । इस बार धान की सिंचाई भी सूखी पड़ी है । मधेशी जनता उसके बावजूद भी देश को अन्तरिम संविधान से प्रतिगमन की ओर ले जाने की जो साजिश है, उसके विरुद्ध आन्दोलन में है । मधेश नेतृत्वकर्ता दलों का कहना है कि ८ बुँदे समझौता मधेश का ‘बटम लाइन’ है । प्रारम्भिक मसौदा और सीमाकंन सहित निर्धारण किया गया प्रदेश अलग देश की अवधारणा है, सद्भावना के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने यह आरोप भी लगाया ।
आन्दोलन का बढ़ता समर्थन सर्वप्रथम संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने मधेश आन्दोलन का आव्हान किया था जिसे सरकार ने वेवास्ता कर दिया । सरकार की निरीहता एवं गैर जिम्मेवारी के कारण आन्दोलन भयावह बनती जा रही है । आन्दोलन के क्रम में कैलाली में हुई घटना की विभिन्न निकाय ने भत्र्सना एवं आन्दोलन को समर्थन भी जनाया है । उद्योग वाणिज्य संघ, गैर सरकारी शिक्षक, एनप्याब्स, प्याब्सन, निर्माण व्यवसायी संघ, साहित्यकार, युवा क्लव, वकील, महिला अधिकारवादी, स्वास्थ्य संस्था, विद्यार्थी युनियन सहित ने आन्दोलन के समर्थन में एक्यबद्धता ¥याली भी प्रदर्शन किया है ।
फिलहाल देखा जाए तो मधेश की भूमि आन्दोलनमय बनी है । एक ओर आन्दोलन की गुञ्ज चारो ओर  है तो दूसरी ओर बेरोजगारी, अशिक्षित बनती समाज, खाद्य वस्तु का अभाव, दैनिक काम कर जीवन चलानेवाला पड़ोसी देश भारत में पलायन हो रहे हैं । सच में कहा जाए तो इस बार के आन्दोलन से सरकार बेखबर है तो आन्दोलनकारी विवशता जाहिर कर रहे हैं । इससे अगर क्षति होती है तो राष्ट्र की । लाठी जुलूस, थरुहट मधेश, स्वायत मधेश प्रदेश स्टीकर देखने को मिलता है ।
आमरण अनशसन ःलोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा ने हक अधिकार का आन्दोलन तो कर दी है लेकिन अपना स्वार्थ अभी भी छुपा है ।  उसी के विरोध में जनकपुर के जानक चौक पर आमरण अनशन किया गया । मधेश अधिकार संघर्ष समिति का सल्लाहकार इन्द्र कुमार मधेशानन्द ने मधेशी मोर्चा का सभासदां को राजिनामा तथा मधेश का हकअधिकार सुनिश्चितता को माँग करते हुए आमरण अनशन किया है । लेकिन एक मधेशी जनता मधेशवादी दल को राजिनामा को लेकर आमरण अनशन में बैठा है । यह बहुत बडा दुःख की बात की आखिरी लडाई में भी मधेशवादी दल संविधान सभा से क्यो नही अपना राजिनामा देना नही चाहता है । अगर सच्चा इमान्दार है तो कम्ती में आमरण अनशन में बैठे मधेशी युवा को इसका कारण भी बता देना चाहिए ।

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