श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन प्रत्येक वर्ष मनाई जाने वाली नाग पंचमी आज परंपरानुसार नाग देवता की पूजा-अर्चना कर मनाई जा रही है।
नागों के बारह नाम बताए गए हैं, लेकिन वैदिक सनातन परंपरा के अनुसार आज के दिन आठ कुलों के आठ नागों की विशेष पूजा करने की परंपरा है। अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख—इन आठ नागों की आज ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा पूजा-अर्चना कर उनकी तस्वीर घर के मुख्य द्वार के ऊपर लगाई जाती है।
मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर नाग की तस्वीर लगाने के बाद उस दिन खेत-बारी में जुताई या खुदाई नहीं करनी चाहिए। साथ ही नाग, सर्प और अन्य रेंगने वाले जीवों को मारना भी वर्जित माना जाता है।
धार्मिक विश्वास है कि घर के मुख्य द्वार पर नाग की तस्वीर लगाकर पूजा करने से पूरे वर्ष नाग, सर्प और बिच्छू जैसे जीवों से किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। इसके अलावा अग्नि, बादल और बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के भय से भी रक्षा होती है।
वैदिक मान्यता के अनुसार नाग को सर्पों का राजा माना जाता है। धर्मशास्त्र के जानकारों के अनुसार नाग के नाराज होने से अनिष्ट हो सकता है, इसलिए नाग देवता को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।
आज सुबह से ही काठमांडू के नागपोखरी और टौदह, भक्तपुर के सिद्धपोखरी सहित देशभर के नागदह, कुंड और नाग स्थानों पर विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। श्रद्धालु नाग देवता को सम्मानपूर्वक गाय का दूध, अक्षत, दूब, खीर, रोटी आदि चढ़ा रहे हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी सर्पों का प्रकृति में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। सर्प और अन्य जीव-जंतु पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद कई हानिकारक जीवों को नियंत्रित करते हैं। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने नागों के प्रति सम्मान और पूजा की परंपरा स्थापित की होगी, ऐसी मान्यता भी व्यक्त की जाती है।
धार्मिक महत्त्व
सनातन धर्म में नाग को शक्तिशाली और पवित्र जीव माना जाता है। शेषनाग, वासुकी, तक्षक और कालिया आदि नागों से संबंधित अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं, जबकि भगवान शिव के गले में वासुकी नाग विराजमान हैं।
भगवान शिव के गले में वासुकी नाग के विराजमान होने और सावन महीने में नाग पंचमी पड़ने के कारण इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्त्व माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार राजा जनमेजय ने सर्प यज्ञ शुरू किया था। उस समय तक्षक नाग को बचाने के लिए आस्तिक ऋषि ने यज्ञ को रोक दिया था। धार्मिक मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से सर्पदंश का भय दूर होता है, कुल का कल्याण होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु और केतु के कारण बनने वाले सर्प योग या नाग दोष की शांति के लिए भी आज नाग पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि नाग पूजा करने से सर्प दोष का प्रभाव कम होता है।
सांस्कृतिक महत्त्व
नेपाली परंपरा के अनुसार नाग पंचमी के दिन घर के मुख्य द्वार पर गुरु-पुरोहित या परिवार के सदस्य स्वयं नाग की तस्वीर लगाते हैं। परिवार की सुरक्षा, सर्पदंश और अन्य आपदाओं से रक्षा की कामना करते हुए नाग देवता को दूध, अक्षत, लावा, दूब आदि अर्पित कर पूजा की जाती है।
लोकविश्वास है कि नाग पूजा करने से वर्षा अच्छी होती है और फसल बेहतर होती है। घर के प्रवेश द्वार पर नाग का प्रतीक लगाने से घर की रक्षा होती है और विपत्तियां दूर रहती हैं, ऐसी पारंपरिक मान्यता भी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में नागपांगर यानी नागों के बिल या टीले जैसी जगहों पर पूजा करने की परंपरा आज भी जीवित है। इससे नेपाली समाज की मौलिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में योगदान मिलता है। नाग पूजा के माध्यम से सनातन संस्कार, संस्कृति और परंपराओं को भी आगे बढ़ाया जाता है।
पर्यावरणीय महत्त्व
नाग पंचमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं, विशेष रूप से सरीसृपों और सर्पों के संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने वाला पर्व भी है।
सर्प पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चूहों, मेंढकों और अन्य जीवों की संख्या को नियंत्रित कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं। धार्मिक दृष्टि से सर्पों को पवित्र मानकर उन्हें न मारने का संदेश देना जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
नाग पंचमी का पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध को मजबूत करता है। यह हमें जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पर्यावरण संरक्षण की भावना का संदेश देता है।
इस प्रकार नाग पंचमी केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि धार्मिक श्रद्धा, सांस्कृतिक परंपरा और पर्यावरणीय चेतना—तीनों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। सर्प जैसे जीवों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करते हुए प्रकृति और जैव विविधता के संरक्षण में इस पर्व की महत्वपूर्ण भूमिका है।

